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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 286

( २३६ ) बीजक कबीरदास ।
एकादशीव्रतौ नहिं जान भूत प्रेत हठि हृदय धरै ।
तजि कपूर गाँठी विष बांधै ज्ञान गमाये मुग्ध फिरै ॥४॥
औ एकादशीव्रत उपलक्षणै है अर्थात् साढ़े अट्ठाईस जे व्रत हैं चौबीस
एकादशी औ रामनवमी, कृष्णाष्टमी, बामनद्वादशी, नरसिंहचतुर्दशी और
आधाअनन्त । येजे वैष्णवीब्रतहैं तिनको नहीं जानै हैं अर्थात् वैष्णवी
उपासना नहींकरैं औ मुंहते रामरामकहै हैं । औ भूत प्रेत यक्षिणी आदि जे
उपासनाहैं तिनको करै हैं तामें प्रमाण॥ “अंतः शैवाबहि शक्ताः सभामध्येच
वैष्णवाः । नानारूपधराः कौला विचरन्तिमहीतले” ॥ सो रामनाम जो कपूर
है ताको छोड़िकै नाना पाखंड मत जो विषयहैं ताको धारण कीन्हे ज्ञान गमा-
यके मूर्खचारों ओर फिरै हैं ॥ ४ ॥
छीजै शाहु चोर प्रतिपालै सन्त जननकी कूटकरै ।
कहे कबीर जिह्वाके लंपट यहि विधि प्राणी नरकपरै ॥५॥
तेहिते शाहु जो आत्मा परमपुरुष पर श्रीरामचन्द्रको अंश सदाको दास
या जीवको स्वरूपहैं सो जेहैं ते छीजैहैं । अर्थात् वह ज्ञान वाको भूलिजायहै ।
गुरुवनके बताये जेनाना पाखंडमत तेई चोरहैं तिनको प्रतिपाल कियो कहेसंग
कियो तेईज्ञानको चोरायलेयहैं । औ जे साहबके ज्ञानके बतैया जे संतहैं तिन-
हींकी कूट करै हैं कि, ये मुड़ियनको मत वेदशास्त्रके बहिरे हैं । सो कबीरजी
कहै हैं ऐसे जिह्वाके लंपट प्राणी हैं ते नरकहीमें परै हैं ॥ ५ ॥
इति सत्रहवां शब्द समाप्त ।
अथ अठारहवां शब्द ॥ १८ ॥
राम गुण न्यारो न्यारो न्यारो ।
अबुझा लोग कहांलौं बूझ बूझनहार विचारो ॥ १ ॥
केते रामचन्द्र तपसीसों जिन यह जग विटमाया ।
केते कान्ह भये मुरलीधर तिनभी अंत न पाया ॥ २ ॥