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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 296

( २४६ ) बीजक कबीरदास ।
ऐसें ब्रह्महु में लीनहै अठईं अवस्थाको प्राप्तभये तब न जीवत्वरह्यो न मूलाज्ञान
रह्यो ऐसैहूबये तथापि साहबको बिना जाने मच्छ जो काल है सो खायलेइहै,
फिरि संसारमें परै है तामें प्रमाण॥"येऽन्येऽरविंदाक्षविमुक्तमानिनस्त्वय्यस्तभावाद्वि-
शुद्धबुद्धयः। आरुह्यकृच्छ्रेणपरंपदंततःपतन्त्यधोनादृतयुष्मदंघ्रयः॥" इतिभा-
गवते ॥ कबीरजीकोप्रमाण ॥ "कोटि करम कटपलमें, जोराचै यक नाम । अने-
क जन्म जो पुन्य करै, नहीं नाम बिनु धाम ॥ ३ ॥
कहै कबीर सुनो हो संतो, जो यह पद निरधारै ॥
जो यह पदको गाइ बिचारै आपु तरै अरु तारै ॥ ४ ॥
सो कबीरजी कहैहैं कि, हेसंतो ! जो यह पदको निराधारै कहे सारासार
बिचारकरै औ जौन ब्रह्मपद कहियाये तौनेको गाइ बिचारै कहे माया बिचारै
सों आपु तरै है और आनहूको तारै है अर्थात् साहबको बा जानै औ औरहूकौं
जनाइ देइ ॥ ४ ॥
इति उन्नीसवां शब्द समाप्त ।
अथ बीसवां शब्द ॥ २० ॥
कोइ राम रसिक रस पियहुगे । पियहुगे सुख जिय हुगे ॥१॥
फल अमृतै बीज नहिं बोकला शुकपक्षी रस खाई ।
चुवै न बुन्द अंग नहिं भीजै दास भँवर सँगलाई ॥ २ ॥
निगमरसाल चारि फल लागे तामें तीनि समाई ।
एक है दूरि चहै सब कोई यतन यतन कोइ पाई ॥ ३ ॥
गयउ वसंत ग्रीष्म ऋतु आई बहुरि न तरुवर आवै ।
कहै कबीर स्वामी सुख सागर राम मगन है पावै ॥ ४ ॥