कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्द । (२३५)
एकादशी व्रतौ नहिं जानै भूत प्रेत हठि हृदय धरै ।
तजि कपूर गांठी विष बांधे ज्ञान गमाये मुगुध फिरै ४
छीजै शाहू चोर प्रतिपालै संत जननकी कूटकरै ।
कहै कबीर जिह्वाके लंपट यहि विधि प्राणी नरक परै ५
राम गाइ औरन समुझावै हरि जाने बिन विकल फिरै॥१॥
जा मुख वेद गायत्री उचरै तासु वचन संसार तरै ।
जाके पाँव जगत उठि लागै सो ब्राह्मण जिउ वद्ध करै॥२॥
श्रीरामचन्द्रको गावै हैं औ औरनको समुझावै हैं औ सबके क्लेश हरन-
वारे जे साहब हैं तिनको नहीं जानै कि, येई क्लेश हार हैं हरि येई हैं । सौं
या नाना देवता नाना उपासना खोजत विकल फिरैं हैं॥१॥अरु जाके मुखते वेद
गायत्री जों वचनहैं सो उचरै हैं वहीको तात्पर्यार्थ जे श्रीरामचन्द्रहैं तिन्हैं जानि-
संसार तरैहै ताको अर्थ न जानते कि वेदगायत्री तात्पर्यार्थ ते श्रीरामचन्द्र-
हीको कहै हैं तामें प्रमाण ॥ “सर्वेवेदाः सघोषाश्च सर्वेवर्णाः स्वरा अपि ।
समात्रास्तुविसर्गाश्चसानुस्वाराः पदानिच । गुणसांद्रेमहाविष्णौ महातात्पर्य्य-
गौरवात्” ॥ इतिमहाभारते ॥ जेब्रह्मादिकनमें विष्णु हैं त विष्णुहैं औ महा
विष्णु श्रीरामचन्द्रही कहावै हैं तिनको तो नहीं जानै हैं । वेद गायत्री पढ़े हैं
औ वही मुखते हिंसा शिष्यनते प्रतिपादन करै हैं समुझावै हैं । औ आपहू
हिंसा करै हैं । तिन्हीं के पांव सब जगत् उठिलागै हैं अरु वाहीको कहा
सब सुनै हैं ॥ २ ॥
अपना ऊंचनीचघर भोजन घ्रीण कर्म करि उदर भरै ।
ग्रहण अमावस ढुकिढुकिमाँगे करदीपक लियेकूपपरै॥३॥
आपतौ जातिमें ऊंचे हैं परंतु नीचके घर भोजन करै है औ जौन कर्म
अपने को उचितनहीं है तौन घिनहा कम कैकै पेट भरै है । औ ग्रहणमें अमा-
वसमें ढुकिढुकिमाँगे है कि, यहकुदान आन न लैजाय, हमैं लेईं । औ राम-
नाममुंहते कहै हैं सो नाम रूपी दीपक लीन्हे भ्रम कूपमें परे हैं ॥ ३ ॥