कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २४४ ) बीजक कबीरदास ।
डाइन डारे सोनहा डोरे सिंह रहे वन घेरे ।
पांच कुटुंब मिलि जूझन लागे बाजन वाज घनेरे ॥ २ ॥
रोह मृगा संशय बन हाँकै पारथ वाना मेलै ।
सायर जरै सकल बन डाहै मक्ष अहेरा खेलै ॥ ३ ॥
कहै कबीर सुनो हो संतो जो यह पद निरधारै ।
जो यहि पदको गाय विचारै आप तरै अरुतारै ॥ ४ ॥
एतत राम जपोहो प्राणी तुम बूझौ अकथ कहानी ।
जाको भाव होत हरि ऊपर जागत रैनि बिहानी ॥ १ ॥
एतत कहे ई जे निर्गुण सगुणके परे परमपुरुष श्रीरामचन्द्रहैं तिनको जपो।
कैसे जपो कि, अकथ कहानी कहे मनबचनके परे जाह रामनाम सो बूझ
अर्थात् रामनाममें साहबमुख अर्थ बूझिकै जपो । श्रीरघुनाथ जीके ऊपर जाकों
भाव होय है ताको यहसंसाररूपी जो है निशा बिहानई है जायहै; सोवंततें
जागिउठैहै । ताते यह ध्वनित होय है जाकौ रघुनाथजी के ऊपर भाव नहीं हैं
ताको यह संसार रूपी निशा बनी रहैहै बिहान नहीं होयहै; जागै नहीं है;
कहे ज्ञाननहीं होयहै; भ्रमरूपी निशामें सोवैते रहै है । यहीसंसारमें जीव कैसे
घेरे रहते हैं सो कहै हैं ॥ १ ॥
डाइन डोरे सोनहा डोरे सिंह रहे बन घेरे ।
पांच कुटुंब मिलि जूझन लागे बाजन वाज घनेरे ॥२॥
डाइनि जेहैं गुरुवालोग छालाके डारनेवाले ने वाके कानमें अपनी विद्या-
डारिदियो । इहां गुरुवालोग डाइनैं हैं ने सिंहको मंत्रते बाँधि देयहैं वा
बनत्यागि और बननहीं जायहैं । औ सोनहा जोहै सो हंसमंत्र तौनेमों
डौंरा बांध्यो अर्थात् यह कहो कि; तूहींब्रह्महै और कहां खोजहै, तैंवा है। यह-
मंत्रको अर्थबतायो सो सिंह जो है जीव या सामर्थ है सो उनही बाणीरूप बन-
में घेरि रह्यो कहे बँधिरह्यो तबपांचौ जे ज्ञानेन्द्रियहैं पांचौ जे कर्मेन्द्रियहैं अथवा