कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्द । ( २४५ )
पाचौ जे प्राणहैं प्राण अपान समान उदान व्यान तैई कुटुम्ब हैं तिनमें मिलिकै
जूझैलाग पांच कुटुम्ब सिंहके पंचआनन जब सिंहको मारन जाय है तब झुनका
बाजा बजावै है तैसे यहां गुरुवालोग अनहद सुननकी युक्ति बतावनलगे सों
दशौ अनहदकी धुनि सुननलग्यो तेई बाजा हैं ॥ २ ॥
रोह मृगा संशय वन हांकै पारथ बाना मेलै ।
सायरजरै सकल वन डाहे मच्छ अहेराखेलै ॥ ३ ॥
रोह कौनकहावै कि, जो कमरीमें आगीबारत जायहै झुनका बजावत जायहै
तामें मृगा मोहि जायहैं सो वाहीकी छाया में पीछे धनुष बाणकी बांसकी बंदूकादि
आयुध लिये खड़े रहै है शिकारी सोई मारैहै यही रोहहै. सो मृगराज जोहै जीव
ताको गुरुवालोग जब योगाभ्यास कैकै धोखा ब्रह्मको मकाश बतायो तामें-
रहिगयो कहे मोहिगयो जो कहौ हाँकि कौन लायो? तौ संशय रूप हँकबैया है
जैसे आगी बरत देखिकै वा बाजा सुनिकै टेममें मोहिकै मृग मृगराज जायहै या
कैसो बाजा बाजै है या कैसी टेमहै या संशयजो है ज्ञानमिलनकी चाह सो याकों
हाँकिले आयों ऐसे गुरुवा लोगनकी जोबताई बाणीबनहै जौन अनहद सुनिबेकी युक्ति
बतायो तौन अनहदकी धुनिसुनिकै औ जौन ज्योति बतायो सोऊ योगाभ्यास
करिकै ज्योतिरूप ब्रह्म देखिकै जीव या संशय कैकै निकट जायहै औ याबिचा-
चारै है कि, याः ज्योतिरूप ब्रह्ममैंहीं हौं कि, मोते भिन्नहै तब शिकारी जैसे
ढुको रहैहै ऐसो मूलाज्ञान रूप शिकारी अहं ब्रह्मास्मि वृत्तिरूप बाण मारि वा
जीवको अनुभव कराय देयँ कि, महीं ब्रह्महौं वाके जीवत्वको नाश कै देयहै
यहीमारिबौहै ॥ औ जैसे बाण लागे मृग राजको अंतःकरण जर उठै है अधि-
क कोपै है बनमें जोई आगे वृक्ष परैहै तौने पर चोटँ करैहै, जो मारनवालेकों
देखै है तो वाहूको चीर खायहै ऐसे जब आपनेको ब्रह्ममान्यो तबसायर जो
संसारहै सो जरैहै अर्थात् संसार याको मिथ्या जानि परैहै औ वन डाहैहै कहे
वा दशामें बाणीरूप बन सोऊ भूलिजायहै । ऐसे बधिक मारयो बधिककों बाघ
मारयो वधिकको जबमारिकै दोऊ गलिकै नदी में मिल्यो तब मछरी खायो ।
अथवा मारिकै दोऊ बहैरहै कीड़ापरे जब बाढ़को जलआयो तबमछरी खायों