कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजबलोकको शोकस्रब त्यागिया हंसको रूपसतगुरु बनाई । भृंगज्यौंकीटको
पलटिभृङ्गैकिया आपसमरङ्गदै लैउड़ाई । छोड़ि नासूतमलकूतको पहुंचिया
विष्णुकी ठकुरीदीखजाई । इंद्रकुम्बेरजहँ रंभको नृत्यहै देवतेंतीस कोटिक र-
हाई॥ १॥ छोड़िवैकुंठको हंसआगे चला शून्यमें ज्योतिजगमग जगाई।ज्योति परका-
शमें निरखि निस्तत्त्वको आपनिर्भयहुआ भयमिटाई । अलखनिर्गुण जेहिवेद स्तुति
करै तीनहूं देवकोहै पिताई।भगवान तिनकेपरे श्वेत मूरतिधरे भागको आन
तिनकोरहाई ॥ २ ॥ चारमुकामपरखंडसोरहकहें अंडको छोर ह्यांतेरहाई।अंडके-
परे स्थान आचिंत को निरखिया हंसजब उहांजाई । सहस औद्वादशै रूहहैं सङ्गमें
करतकल्लोल अनहद बनाई । तासुके बदनकी कौनमहिमाकहौं भासती देह
अति नूरछाई ॥ ३ ॥ महल कंचनबने माणिकतार्मेजड़े बैठतहँ कलशअखंड
छाजै । आचिंतकेपरे स्थान सोहंगका हंस छत्तीसतहँवां बिराजै । नूरकामहल
औ नूरकाभुम्य है तहांआनंद सो द्वन्दभाजै । करतकल्लोल बहुभांतिसे संगयक
हंससोहंगके जो समाजै ॥ ४ ॥ हंसजब जात षट्चक्रकोबेधिकै सातमुका-
ममें नजरफेरा । सोहंगके परे सुरति इच्छाकही सहसबामन जहँहंसहेरा ।
रूपकी राशितेरूप उनको बना नहीं उपमा इन्दुजीनिवेरा । सुरतिसे भेटिकै
शब्दको टेकिचढ़ि देखि मुकामअंकूरकेरा ॥ ५ ॥ शून्यकेबीचमें विमल बैठक
जहाँ सहज स्थान है गैब केरा । नवो मुकामयहहंसजब पहुंचिया पलकबिलंबह्वॉँ
कियोडेरा । तहाँसे डोरिमक्रतारज्यों लागिया ताहिचढ़िहंसगो दै दरेरा ॥ ६ ॥
भयेआनन्दसे फंदसब छोड़िया पहुंचिया जहाँ सतलोकमेरा । हंसिनीहंस सब-
गायबज्जायकै साजिकै कलश वहिलेन आये । युगनयुगबीछुरेमिलेतुम आइकै
प्रेमकरि अंगसों अंगलगाये । पुरुषनेदर्शनजबदीन्हियाहंसको तपनिवहु जन-
मकी तवनशाये । पलटिकैरूप जबएकसेकीन्हियामनहुं तवभानु षोडशउगाये
॥ ७ ॥ पुहुपकेदीप पीयूष भोजन करै शब्दकी देहजबहंसपाई । पुहुपके से-
हरा हंसऔहंसिनीसच्चिदानन्द शिरछत्रछाई । दिपैंबहुदामिनी दमकबहुभांति
की जहाँ घनशब्दको घुमड़लाई । लेगेजहँवरषने गरजघनघेरकैकै उठततहँ शब्द
धुनिअति सोहाई ॥ ८ ॥ सुनैसोई हंसतहँ यूथकेयूथह्वै एकहीनूरयकरङ्गरागै ।
करतबीहार मनभामिनी मुक्तिमै कर्म औ भर्मसबदूरिभागै ॥ रङ्कऔभूप कोइपर-