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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

( २०४ ) बीजक कबीरदास ।
अथ सातवां शब्द ॥ ७ ॥
संतो कहौ तो को पतिआई । झूठा कहत सांच बनिआई १
लौकै रतन अवेध अमौलिक नहिं गाहक नहिं सांई ।
चिमिकि चिमिकि चमकै दृग दुहुं दिशि अरव रहा छरिआई
आपहि गुरु कृपा कछु कीन्हो निर्गुण अलख लखाई ।
सहज समाधि उनमुनी जागै सहज मिलै रघुराई ॥ ३ ॥
जहँ जहँ देखौ तहँ तहँ सोई मन माणिक वेध्यो हीरा ।
परम तत्त्व यह गुरुते पायो कह उपदेश कबीरा ॥ ४ ॥
सन्तो कहौ तो को पतिआई।झूठा कहत सांच बनि आई १
हे संतो ! झूठा जो ब्रह्महै ताको कहत कहत जीवन सांचबनि आई वही
ब्रह्मको सांच मान लियोहै अब जो मैं सांच साहबको बताउंहौं तो को पतिआय
अर्थात् कोई नहीं पतिआय है ब्रह्महींमें लगे हैं ॥ १ ॥
लौकै रतन अवेध अमौलिक नहिं गाहक नहिं साँई ।
चिमिकि चिमिकि चमकै दृग दुहुं दिशि अरव रहा छरिआई
लौ लगनको कहैं हैं सो वा ब्रह्म माही हौं या जो लौ कहेलगन ताही ज्ञानको
रतनकै अबेधित अमोलिक मानि जामें गाहक औ सांई नहीं है ( अर्थात् दूसरा
तो हंई नहीं है गाहक सांई कहांते होय ) सो वही ज्ञानको ब्रह्म मानि लियो
है । तौने ब्रह्म उनके दृगन में चमकि चमकि चमकैहै, सर्वत्र देखो परै है ।
जोकहो लोक प्रकाश ब्रह्मही देखो परै है सोनहीं अरु जो या हठ है कि, सर्वत्र
ब्रह्मही है सोईजो बरहा है सो छरिआई रह्योहै सर्वत्र ब्रह्मही देखायहै जैसे
बरहामें जलबढ़े सर्वत्र फैलिजाय है ऐसे अहंब्रह्मास्मि जो या ज्ञान सो जब
बढ्यो तब याको हठहीरूप ब्रह्मदेख्यो परैहै ॥ २ ॥

शब्द । ( २०५ )
आपुहिं गुरू कृपा कछु कीन्हो, निर्गुण अलख लखाई ।
सहज समाधिं उनमुनी जागै,सहज मिलै रघुराई ॥ ३ ॥
सो गुरुनहैं सद्गुरुते जब आपही कृपाकरैहैं तब निर्गुण जो ब्रह्महै ताको
अलख लखावै हैं कि वे कछुवस्तुही नहीं हैं अर्थात् अलख हैं धोखाहै साहब
कब मिलै जब सहज समाधि उनमुनी मुद्रा करि जो सर्वत्र ब्रह्म देखैहै तौन
उनमुनी रूप निद्राते जागै अर्थात् सहजही समाधिकै चित् अचितरूप विग्रह या
जगत साहबको है यादेखै तौ सहजहीमें परम परपुरुष जे श्रीरामचन्द्र हैं
तें मिलैं ॥ ३ ॥
जहँजहँदेखौंतहँतहँसोई, मन माणिक वेध्यो हीरा ।
परम तत्त्व यह गुरुते पायो, कह उपदेश कबीरा ॥४॥
अधेधित अमौलिक आगे कहिआये ताको तो नेतिनेति कहै हैं वामें काहूको
मनहीं नहीं बेध्यो अर्थात् धोखही है अब साधुनको मन जो माणिक है अनु-
राग पूर्वक लागे सो साहब जे हीरा हैं तिनमें बेध्यो है । ऐसे जेसाहब चित्-
अचितरूप जहांजहां देखौहौ तहांतहां सोई है यह कबीरजी कहै हैं कि यह
परम तत्त्वको उपदेश मैं गुरुते पायोहै ॥ ४ ॥
इति सातवां शब्द समाप्त ।
अथ आठवां शब्द ॥ ८ ॥
अवतारविचार ।
संतौ आवै जायसो माया ।
है प्रतिपाल काल नहिं वाके ना कहुं गया न आया ॥१॥
क्या मकसूद मच्छ कच्छ होना शंखासुर न संहारा ।
अहै दयालु द्रोह नहिं वाके कहहु कौनको मारा ॥ २ ॥
वे कर्त्ता न वराह कहावैं धरणि धरै नहिं भारा ।

( २०६ ) बीजक कबीरदास ।
ई सब काम साहबके नाहीं झूठ कहै संसारा ॥ ३ ॥
खंभ फारि जो वाहर होई ताहि पतिज सबकोई ।
हिरणाकुश नख उदर विदारे सो नहिं कर्त्ता होई ॥ ४ ॥
वावन रूप न बलिको यांचे जो यांचै सो माया ।
विना विवेक सकल जग जहड़े माया जग भरमाया ॥ ५ ॥
परशुराम क्षत्री नहिं मारा ई छल माया कीन्हा ।
सतगुरु भक्ति भेद नहिं जाने जीव अमिथ्या दीन्हा ॥ ६ ॥
सिरजनहार न व्याही सीता जल पषाण नहिं बंधा ।
वे रघुनाथ एककै सुमिरे जो सुमिरै सो अंधा ॥ ७ ॥
गोपी ग्वाल गोकुल नहिं आये करते कंस न मारा ।
है मिहरवान सबनको साहब नहिं जीता नहिं हारा ॥ ८ ॥
वे कर्त्ता नहिं बौद्धकहावैं नहीं असुरको मारा ।
ज्ञान हीन कर्त्ता के भरमें माया जग संहारा ॥ ९ ॥
वे कर्त्ता नहिं भये कलंकी नहीं कलिंगहि मारा ।
ई छल बल मायै कीन्हा यतिन सतिन सब टारा ॥ १० ॥
दश अवतार ईश्वरी माया कर्त्ताकै जिन पूजा ।
कहै कबीर सुनो हो संतौ उपजै खपै सो दूजा ॥ ११ ॥
अवतार विचार ।
अबतक सबके गुरुश्रेष्ठ परम परपुरुष श्रीरामचन्द्रको वर्णन करिआये ति-
नके द्वारमें नारायणादिक मत्स्यादिक रहे आवैहैं ते अमायिकहैं काहेते कि आवै
जायनहीं हैं तिनहीको परात्पर ब्रह्म करिकै वर्णतहैं तामें प्रमाण ॥ ( पूर्णमदः
पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदुच्यते । पूर्णस्यपूर्णमादायपूर्णमेवावशिष्यते इतिश्रुतेः ) ॥ ”
औ ई माया ते परे हैं औ बहुधा निरंजननादिक जे नारायणहैं जिनको पांच

ब्रह्ममें कहिआयेहै ते, उनकी उपासना करिकै उनको आपनेते अभेद मानि
कै उनकी शक्तिको प्राप्ति ह्वैकै जगत्के कार्य सब करैंहैं। औ जब मत्स्यादिक
अवतारलेईं हैं तब जे साकेत मत्स्यादिक हैं तिनकी अभेद भावना करिकै
उतने अवतारकी शक्ति पाइकै आपही मत्स्यादिक होइहैं ये सब साकेतमें जे
नारायणादिक सबहैं तिनके उपासक हैं उपासनामें देवको औ अपनो अभेद
मानिवो लिख्यो है ॥ “ देवोभूत्वादेवंयजेत् ” ॥ तेहिते उनकी शक्तिते ये
सबअवतार लेइहैं। जोकहो यामें कहा प्रमाणहै कि, येसब उनहींके उपास-
कहैं । तो रामनामके साहब मुखअर्थमें मकार स्वतःसिद्ध सानुनासिक है
ताको जो है मात्रा तौनेमें साहबके जे सब पार्षद हैं तिनको वर्णन करिआये
हैं । ये सब नारायणादिक रामनामहीकी उपासनाकरै हैं सो जाकी जाकी
उपासना कीन चाहै हैं ताकी ताकी उपासना रामनामहीमें ह्वै जायहै रामना-
मकी ये सब उपासनाकरै हैं तामें प्रमाण ॥ “ नारायणःस्वयंभूश्चशिवश्चेन्द्रा-
दयस्तथा । सनकाद्याश्च योगीन्द्रानारदाद्यामहर्षयः ॥ सिद्धाः शेषादयश्चैवलोम-
शाद्यामुनीश्वराः । लक्ष्म्यादिशक्तयःसर्वाःनित्यमुक्ताश्चसर्वदा ॥ मुमुक्षवश्च
मुक्ताश्चऋषयश्चशुकादयः । तत्प्रभावंपरंमत्वामंत्रराजमुपाँसैंते ॥ इतिवसिष्ठसंहि-
तायाम् ॥ ” जो कहो ये सब रामनाममें साहबमुख अर्थ तौ जान्यो मायिक
काहेभयो ? तौ बिना माया सबलित भये जगत्के कार्य नहीं ह्वै सकै हैं तेहिते
ये सब माया सबलित ह्वैकै कार्यकरै हैं । परन्तु जैसे इतर जीवनके जन्म
मरण होईहैं तैसे इन के नहीं होईहैं । जब महाप्रलयभई तब, सबजीव साहब
के लोक प्रकाशमें समष्टिरूप रहै हैं जब उत्पत्तिभई तबफिरि, कर्मकरिकै उत्प-
त्तिहोइहै । औ ये सब नारायणादिकनकी उत्पत्ति प्रलय नहीं होइ है । काहेते
कि ईश्वरहैं, जब महाप्रलयभई तब जे साकेत लोकमें नारायणादिकहैं ते,
इनके अंशीहैं उपास्यहैं तहां लीन ह्वैकै रहेजाइहैं । उत्पत्ति समयमें समष्टि जीव
व्यष्टि होन चाहैंहैं तब राम नाममें जगत् मुख अर्थको भावना करै है, तब
साकेतनिवासी जे नारायण हैं तिन्हें तिनके अंशई सब पांच ब्रह्मरूपते प्रकट
होइहैं । साकेतमें जे नारायणादिकहैं ते अमायिकहैं, औ तिनके अंश नारायणा-
दिक मत्स्यादिक अवतार लैकै आवै जाय हैं ते माया सबलित हैं । सो ये सब

( २०८ ) बीजक कबीरदास ।
मत्स्यादि अवतारनको मायिक कहिकै कबीरजी साहब को परतवदेखविहैं कि
साहब सबते भिन्नहैं ॥
संतौ आवै जाय सो माया ।
है प्रतिपाल काल नहिंवाकें नहिं कहुं गया न आया ॥१॥
हे संतौ! आवैजायहै सो तो मायाको धर्म है।जे साहब परम परपुरुष श्रीराम
चन्द्र हैं ते सबको मतिपालही भर करै हैं कहे उद्धार ई भर करैहैं औ काम
नहींकरै हैं । उनके कालनहीं है अर्थात् प्रलय आदिक नहीं होइहै । अथवा जो
कोई वे साहब को जानै है ताको कालको भय छूटिजायहै वे परमपुरुष श्रीरा-
मचन्द्र ना कहीं गये हैं न आये हैं ॥ १ ॥
क्या मकसूद मच्छ कच्छ होना शंखासुर न सँहारा ।
अहैदयालु द्रोह नहिं वाके कहौ कौनको मारा ॥ २ ॥
वे कर्त्ता न वराह कहावैं धरणि धरै नहिं भारा ।
ई सब काम साहबके नाहीं झूठ कहै संसारा ॥ ३ ॥
अरु वे उद्धारकर्त्ता परमपरपुरुष श्रीरामचन्द्रको क्या मकसूद कहे क्या
मक्सद है अर्थात् क्या प्रयोजनहै, मच्छ कच्छ होनेका । वे शंखासुरको नहीं
संहार्योहै शंखासुर उपलक्षण याते जिनको जिनको मार्यो है अवतारते सब
आइगये । अरु सो दयालु हैं सबकी रक्षाकरै हैं उनके द्रोह नहीं है कहौ कौनकों
मार्यो है ॥ २ ॥ अरु वे उद्धारकर्त्ता साहब वाराह नहीं भये औ न पृथ्वीको
भारा धर्यो सो जौन सबकोई कहै हैं कि, ई सब काम साहबहीके हैं सो यें
काम साहब के नहीं हैं यह संसार झूठई कहैहै सो साहबको बिना जाने
कहै हैं ॥ ३ ॥
खम्भ फारि जो बाहरहोई ताहि पतिज सब कोई ।
हिरणकशिपु नख उदर बिदारे सो नहिं कर्त्ता होई॥४॥

शब्द । (२०९)
बावनरूप न बलिको यांचे जो यांचे सो माया ।
बिना विवेक सकल जग जहड़े माया जग भरमाया५
औ खम्भ फारिकै बाहर है कै नरसिंह रूप है नखते हिरणकशिपुके उदरको
विदारचो है तौनेन व्यापक ब्रह्म को सबकोई पतियायहे सो वे उद्धारकर्त्ता
परमपुरुष श्रीरामचन्द्र नहीं हैं । यह सब माया कियो है ॥ ४ ॥ औ बावन-
रूप है वे साहब बलिको नहीं यांच्यो है । मांगिवो पाइबो तो सब माया है
सब जगत् के जीव बिना विवेक जहड़े कहे भुलाय गये हैं । सब जीवनको
माया भरमाइ लियो है ॥ ५ ॥
परशुराम क्षत्री नहिं मारा ई छल मायहि कीन्हा ।
सतगुरु भक्ति भेद नहिं जानै जीव अमिय्या दीन्हा॥६॥
अरु वे उद्धारकर्त्ता परमपरपुरुष श्रीरामचन्द्र परशुराम है क्षत्रिन को नहीं
मार्यो है यह सब मायाही कियोहै । सतगुरु कहे सैकरन जे गुरुवा हैं ते
साहबके भक्तिके भेदको जानै नहीं हैं । जीव को ये जे नारायण हैं औ सब जे
अवतारहैं तिनही को अमिथ्या कहे मिथ्या नहीं सांच कहिकै कि, वे सांच साहब
येई हैं तिनही की जीवन को दीक्षा देइ है । सो मिथ्या है ॥ ६ ॥
सिरजनहार न ब्याही सीता जल पषाण नहिं बंधा ।
वे रघुनाथ एककै सुमिरे जो सुमिरे सो अंधा ॥७॥
औ वे सिरजनहार कहे जाके सुरतिदियो ते, ब्रह्मा विष्णु महेश आदिक
अवतार लेइहैं औ जगत्‌की उत्पत्ति होइहै सो सीता को नहीं बिवाह्यो, औ सेतु
नहीं बांध्यो । सो वे निर्विकार उद्धारकर्त्ता रघुनाथको औ ये
सब अवतारनको एक करिकै सबकोई सुभिरै हैं । सो जो एक करिकै सुभिरै हैं
ते अंधे हैं । काहेते कि, वे तौ रघुनाथ हैं । रघु कहिये सब जीव को तिनके
नाथ हैं वे काहेको काहू के मारनको अवतार लेइँगे । वे निर्विकार औ ये
माया सबलित द्वैकै सब अवतार लेइ हैं । जो कोई आवेजात है सो मायिकहै
सो वे निर्विकार साहब औ सविकार ये सब अवतार एक कैसे होइँगे । आ
१४

( २१० ) बीजक कबीरदास ।
रघु जीवको कहै हैं ते रघुशब्दकै ( व्युत्पत्तीरंवतेलोकाल्लोकांतं गच्छंति रववो-
जीवास्तेषांनाथः ) अर्थ लोकते और लोक जाय ते जीवरघु हैं तिनके नाथजे
हैं तेई रघुनाथ हैं ॥ ७ ॥
गोपी ग्वाल गोकुल नहिं आये करते कंस न मारा ।
है मेहरवान सबनको साहब नहिं जीता नहिं हारा ॥ ८ ॥
औ गोपी ग्वाल गोकुल में कबहूं नहीं आये हैं वे उद्धारकर्त्ता साहब कंसको
करतेनहीं मारयो औ न मथुरागये काहेते कि ब्रह्म वैवर्त्तमें लिखा है। ( वृन्दावनं-
परित्यज्यपादमेकंनगच्छति ) ॥ वे साहब तो सबके ऊपर मेहरबानी करनवारे
हैं वे न काहूसों जीते हैं न हारे हैं न काहूको मारे हैं अर्थात् युद्धई नहीं कियो
वेतौ रासई करत रहे हैं ॥ ८ ॥
वे कर्त्ता नहिं बौद्ध कहावैं नहीं असुरको मारा ।
ज्ञानहीन कर्त्ता भरमे माया जग संहारा ॥ ९ ॥
वेकर्त्ता नहिं भये कलकी नहीं कलिगहि मारा ।
ई छल बल सब मायै कीन्हा यतिन सतिन सब टारा १०
अरु बौद्धरूप ह्वैकै दैत्यनको नास्तिक मतसिखै दैत्यनको संहार कराइ
डारयो है सो सबमाया कियो है बे मुक्तिकर्त्ता साहब नहीं कियो । काहेते कि
वे मुक्तिकर्त्ता साहब देवको निन्दा करिकै इनको अज्ञानी कैसे करेंगे । सो
ज्ञानहीन जे हैं भ्रमै, ते यह कहै हैं कि, यह सब उद्धार कर्त्ता जो है सोई सब
करै है सो कर्त्ता नहीं करै है यहमाया सब जगत्को संहारकरै है ॥ ९ ॥ अरु
वे उद्धारकर्त्ता परम परपुरुष श्रीरामचन्द्र कलकी अवतार नहींलियो औ न
कलिंग देशी जे म्लेक्ष हैं तिनको मारयो है यह छलबल सबमायै कियो है ।
यतिनको जो है सत्य सबताको टारिदियो है अर्थात् यती जे रहे संन्यासी
गोरखादिक तिनकर सत्य जो है साहबको जाननवारो मत तौनेको टारिदियौ
योगादिकनमें लगाइदियो ॥ १० ॥

': it's 'ह' with two slants (ai), and at the bottom there's a loop... wait, is it 'ह्वै' or 'है'?
In line 11: "साकेतई प्रकटहोइ है" -> that's 'है'.
In line 16: "साकेतई ह्वै गयो" -> in Braj/Awadhi commentary, "ह्वै गयो" (became) is standard!
Wait, look at the bottom of 'ह': there is a small 'व' subscript! It is "ह्वै गयो"!
Wait, let's check line 20: "होइहै तब प्रकटह्वै जाइहैं" - look at "प्रकटह्वै": 'ह' with 'व' subscript and 'ै'!
Line 21: "तब गुप्त ह्वैजाइ हैं" - 'ह्वै'!
Line 22: "ह्वैजाइहै कैसे ?" - 'ह्वै'!
Yes! Vishwanath Singh consistently writes "ह्वै" (ह + ्र/व + ै = ह्वै)!
Now look at line 16: "साकेतई ह्वै गयो"! Yes, it has the 'व' conjunct: "ह्वै गयो"!

Wait, look at line 16 end:
"तौ साकेतको आइबो तौ आयौ"
Wait, "आयौ" or "भयौ"?
Look at

होइहैं, सो पीछेलिखि आये हैं । जबउद्धारकर्त्ता साहब प्रकटहोइ हैं तब जे
देखन वारे सुननवारे हंसरूप में स्थित हैं तेई वहीरूपते देखैहैं सुनै हैं सच्चिदा-
नन्दात्मको (भगवान् सच्चिदानन्दात्मिका अस्यव्यक्तिः ) यह श्रुति करिकै
एकरूपताकहि आये हैं । याहीते लोकहूको व्यापक कह्यो । औ नारायण जौं
रामावतारलै अशोकवाटिका में लीला कियो सो वर्णनकरि मन बचनके परे जे
साहबहैं तिनके लीलाको व्यंजित करै हैं । सो व्यंजित तो करै हैं परन्तु मनब-
चनके परे जेसाहब हैं तिनके नामरूप लीलाधाम मनबचनके परे साकल्य करि-
कैव्यंजितऊ नहीं करिसकै हैं । सो यह बातजो कोई साहब करिकै हंसरूपपाये
हैं, सोसाहबके मनकारिकै साहबको नामादिक जानै है। औ जपै है औ साहबके दिये
रूपकी आंखीते साहबको देखै है । तामें वेदसारोपनिषत् को प्रमाण ॥ ३७॥
( जनकोहवैदेहो याज्ञवल्क्यमुपसृत्यपप्रच्छकोहवैमहान्पुरुषोयंज्ञात्वेहविमुक्तो-
भवतीति ॥ १ ॥ सहोवाचकौशल्योरघुनाथएवमहापुरुषः तस्यनामरूपधाम-
लीला मनो वचनाद्यविषयाः सपुनरुवाचेदृशं कथमहं शक्नुयां विज्ञातुंज्ञापकाज्ञा-
नादितिसपुनः प्रतिवक्ति अथैते श्लोकाभवंति ॥ विरजायाः परे पारे लोको वैकुण्ठसं-
ज्ञितः ॥ तन्मध्येराजतेयोध्या सच्चिदानन्दरूपिणी ॥ ३ ॥ तत्रलोकेचतुर्बाहु
रामोनारायणः प्रभुः ॥ अयोध्यांयादचास्य अवतारोभवेदिह ॥ ४ ॥ तदा-
स्ति रामनामेदम्भव-रविधौविभोः ॥ तन्नाम्नोनामरहितस्यान्ना तं नाम तस्यहि
॥ ५ ॥ दशकण्ठवधाद्यादिलीलाविष्णोः प्रकीर्त्तिताः ॥ सकदाचिच्च कल्पेस्मिँ-
ल्लोकेसाकेतसंज्ञिते ॥ ६ ॥ पुष्पयुद्धंरघूत्तंसः करोति सखिभिः सह॥ ७॥ कस्मिन-
न्कल्पेतुरामोसौ बाणजन्यેચ્છया.विभुः ॥ तैरेवसखिभिः सार्द्धमाविर्भूय रघूद्वहः
॥ ८ ॥ रावणादिवधैलीला यथाविष्णुः करोतिसः ॥ तथायमपितत्रैवकरोति-
विविधाः क्रियाः ॥ ९ ॥ क्रियाश्च वर्णयित्वाथ विष्णुलीलाविधानतः ॥ लीला-
निर्वचनीयत्वंततोभवतिमूचितम् ॥ १० ॥ किंचायोध्यापुरोनामसाकेतइतिसो-
च्यते ॥ इमामयोध्यामाह्वाय सायोध्यावर्ण्यतेपुनः ॥ ११ ॥ अनिर्वाच्यत्व-
मेतस्याव्यक्तमेवानुभूयते ॥ रामावतारमाधत्तेविष्णुः साकेतसंज्ञिते ॥ १२ ॥
तद्रूपंवर्णयित्वानिर्वचनीयमभोः पुनः ॥ रूपमाख्यायतेविद्भिर्महतः पुरुषस्य हि
॥ १३ ॥ इत्यथर्वणवेदेवेदसारोपनिषदिप्रथमखण्डे ) श्रीकबीरजीका यहीमतहै
कि, साकेतछोड़िकहूं नहींजायहै नित्यबिहारी हैं ॥ ११ ॥
इति आठवां शब्द समाप्त ।

शब्द। ( २१३ )
अथ नवमशब्द ॥ ९ ॥
संतौ बोले ते जग मारै ।
अन बोलेते कैसे बनिहै शब्दै कोइ न विचारै ॥ १ ॥
पहिले जन्म पूतको भयऊ बाप जनमियाँ पाछे ।
बाप पूतकी एकै माया ई अचरज को काछे ॥ २ ॥
उंदुर राजा टीका बैठे विषहर करै खवासी ।
श्वान बापुरा घरनि ठाकुरो बिल्ली घरमें दासी ॥ ३ ॥
कागज कार कारकुडू आगे बैल करै पटवारी ।
कहहि कबीर सुनौ हो संतौ भैसैं न्याउ निवारी ॥ ४ ॥
संतौ बोले ते जग मारै ।
अनबोलेते कैसे बनिहै शब्दै कोइ न विचारै ॥ १ ॥
पहिले जन्म पूतको भयऊ बाप जनमिया पाछे ।
बाप पूतकी एकै माया ई अचरज को काछे ॥ २ ॥
हे संतौ! जो बोलौहौं कहे जोमैं बताउंहौं सोतो मानै नहीं है बोलेते जगमा-
रैहै कहे शास्त्रार्थकरैहै औ जो न बोलौं तो बनैकैसे शब्दको कोई नहीं बिचारै
॥ १ ॥ अरु पहिले पूतजो जीव है ताको जन्म हैलेइहै तब पिता जोहै जीव-
को अनुमान ब्रह्म ताको जन्म होइहै । पिताजीवको काहेते कह्यो कि, जब शुद्ध
जीव एकते अनेक ब्रह्मही द्वारभयोहै वह माया सबलित ब्रह्मपूतहै औ जीव
मायाहींमें परचोहै दोनों माया सबलितहैं सो बापजोहै जीव औ पूतजोहै ब्रह्म
तिनकी महतारी एक मायाही है अर्थात् यहीते अनादिकालते दोनों प्रकटहैं
वहींमें पैरहैं। सो तैं बिचारु तौ यह अचरजको काछैहै अर्थात् तैंहीं अपने
अज्ञानते यह अचरज काछे है औ नानारूप धेरैहै ॥ २ ॥

( २१४ ) बीजक कबीरदास ।
उंदुर राजा टीकाबैठे बिषहर करै खवासी ।
इवान बापुरा धरनिठाकुरा बिल्ली घरमें दासी॥ ३ ॥
उंदुर जोहे मूस सो तौ राजा भयो टीकामें बैठ्यो औ बिषहर सर्प सो खवा-
सी करैहै औ श्वान बापुरा जो है सोधरनि ठाकुरा कहे बस्तु लैके ढांकिके धरै
है कहे भंडारीहै औ बिल्ली घरमें दासी है सो खानवालिनि है । अर्थात् उंदुरकहैं
वह साहबको ज्ञान जाको दूरकै दियो है । उंदुरमूसको संस्कृतमें कहैं हैं सो
उंदर कहे मूसतो जीवहै सो उंदुर शरीरको आपनो मानिलियो है सोई राजाम-
यो अरु वाको खानवालो जोहै सर्पसो कालहै । सो खवास भयो कहे क्षण पल
घरी पहर वाको खात बीती तो होतनायहै सो खवास ह्वैकै यहकाल वाकी
आयुर्दायको खातई जायहै । औ नाना प्रकार की जो बिषयहैं तेई बीरा है ताको
खवावत जायहै । अरु श्वानकहे वह स्वानुभावानन्द जोहै सो बापुरा जो जीव
ताकोधारिकै ढांकि लियो है कहे साहबको ज्ञान नहीं होन देइहै औ बिल्ली जो है षट्
दर्शनकी बाणी सोघरमें दासी हैरही है कहे नाना मतन में लगावैहै साहबकी
भक्ति रस जो है सोई है गोरस ताको खाइ लेइ है ॥ ३ ॥
कागज कार कारकुड आगे बैल करै पटवारी ।
कहहि कबीर सुनो हो सन्तो भैंसै न्याउ निवारी॥४ ॥
कागज कार कहे लिखो कागज कार कुड जो बैलहै ताको आगे धरो है ।
सोई बैल पटवारी करैहै । सो कारो कागज कहे लिखो काजग जो गुरुवा
लोगनकी बनाई पोथी तिनको आगेधरिके बैलजे गुरुवा लोगन के चेलाहैं ते
पटवारी करैं हैं । अर्थात् कायानगरी के बसैया जे मन बुद्धि चित्त अहंकार
पृथ्वी अपू तेज वायु आकाश दशौ इन्द्रिय तिनको बिचारिके कि, कौन काके-
आधीनहै ज्ञानरूपी द्रव्य तहसील करैहै । वा पटवारीकैकै द्रव्य राजाके इहां
लेजाइहै । या ज्ञानरूपी द्रव्य आत्मा में राख्यो आइ अर्थात् काया नगरीकें
बसैया सब जीवात्मैते चैतन्यहैं याते आत्मै मालिकहै । यह निश्चयकियो ।
सो कबीरजी कहैं हैं हे संतो ! तुम सुनो वहां भैंसा जो है सोई न्याउ निबा-
रैहै, इहां भैंसाकहे गुरुवालोग जो हैं सोआपचहलामें परैहैं औ चहलामें परोजो

शब्द । ( २१५ )

जीव ताहीको मालिक बतावैं हैं । और चेला जे हैं तिनहूं को मायाके चहलामें
ढोरहैं ऐसो न्याउ निबोरैंहैं । भाव यहहै कि, भैंसा यमकी असवारी है सो
यमही पुर को लैजाइगो । तहां जब यमके लट्ठा लगैंगे तब गुरुवाई निकसि
आवैगी ॥ ४ ॥
इति नवमशब्द समाप्त ।
अथ दशवां शब्द ॥ १० ॥
( मजहब )
सन्तो राह दुनों हम डीठा ।
हिन्दू तुरुक हटा नहिं मानैं स्वाद सबनको मीठा ॥ १ ॥
हिन्दू व्रत एकादशी साधैं दूध सिंघाड़ा सेती ।
अनको त्यागैं मन नहिं हटकैं पारन करे सगोती ॥ २ ॥
तुरुक रोजा नमाज गुजारैं बिसमिल बाँग पुकारैं ।
उनकी भिंइत कहांते होइ है सांझै मुर्गी मारै ॥ ३ ॥
हिन्दूकि दया मेहर तुरुकनकी दूनों घटसों त्यागी ।
वै हलाल वै झटका मारैं आगि दुनों घर लागी ॥ ४ ॥
हिन्दू तुरुक कि एक राहहै सद्गुरु इहै बताई ।
कहहि कबीर सुनौ हो संतो राम न कहेउ खोदाई ॥ ५ ॥
सन्तो राह दुनों हम डीठा ।
हिन्दू तुरुक हटा नहिं मानैं स्वाद सबन को मीठा ॥ १ ॥
हे संतो! हम दुनोंकी राह डीठा कहे देखी दुनोंकी एकई राह है सो हमारो
हटको कोई नहीं मानै है । हम सबको समुझावते हैं कि विषयनको छोड़िकै
देखो तो दुनोंकी राह एकई है सो दुनों दीनको विषयनको स्वाद मीठो लग्यो
है यहीके मिलनकी उपाय करैं हैं साहबको नहीं खोजैं हैं ॥ १ ॥

( २१६ ) बीजक कबीरदास ।
हिन्दू ब्रत एकादशि साधैं दूध सिंघाड़ा सेती ।
अनको त्यागैं मन नहिं हटकैं पार न करें सगोती ॥ २ ॥
तुरुक रोजा नमाज गुजारैं विसमिल बाँँग पुकारैं ।
उनकी भिश्त कहांते होइहै सांझै मुर्ग़ीमारैं ॥ ३ ॥
हिन्दू जे हैं ते अन्नको त्यागिकै एकादशी व्रत साधै हैं कहे उपासे रहै हैं
औ फलाहार करै हैं । औ बिहान भये नानाप्रकारके व्यंजन बनाइकै सगे जे हैं
गोतीभाई तिनको लैके पारण करै हैं औ मनको नहीं हटकै हैं कहेदशौ इन्द्रिय
ग्यारहौं मनको नहीं हटकै हैं अर्थात् यह एकादशी नहीं करै हैं । अथवा जैसे
सगोतीमें कहे सगाई में अर्थात् जैसे बिवाहमें जाफतमें खाय हैं तैसे पारण
करै हैं ॥२॥ औ मुसल्मान रोजा रहै हैं औ नमाज गुजारैहैं औ बिसमिल्लाको
बांग दैके पुकारैं हैं औ सांझको मुर्गी मारिके पोलाव बनाइ खाय हैं सो कहोतो
उनकी भिश्त कैसे होइगी ॥ ३ ॥
हिन्दू किं दया मेहर तुरुकनकी दूनों घट सों त्यागी ।
वे हलाल वे झटका मारैं आगि दुनों घर लागी ॥ ४ ॥
हिन्दूकी दया तुरुककी मिहर है जो हिन्दू दया करत तौ यम ते छूटत
अरु जो मुसल्मान मिहर करत तौ यमते छूटत । सो ये दोऊ दया औ मिहर-
को आपने घटते त्यागि दियो है मुसल्मान कहैं हैं कि गलेकी रगसेभी अल्लाह
नगीचहै औ घट घट में मौजूदहै औ गला काटतई हैं सो गौ सेइकै गला
काटते हैं औ हिन्दू कहैं हैं कि ब्रह्मसर्वत्र पूर्ण है औ झटका मारैं हैं कहैं मूड़
काटिडारै हैं सोऊ ब्रह्म की ही गलाकाटै हैं या प्रकार ते कबीर जी कहै हैं कि
दूनों घरमें आगिलगी है यह अज्ञानरूपी आगि दूनों की बुद्धिको दाहे
डारै है ॥ ४ ॥
हिंदू तुरुक कि एक राह है सतगुरु इहै बताई ।
कहहि कबीर सुनो हो संतो राम न कहौ खोदाई ॥ ५ ॥
हिन्दू मुसल्मानकी एकै राहहै राम न कह्यो खोदाइ कह्यो खुदा न कह्यो
राम कह्यो । नाम सब वही बादशाहके हैं सो वह बादशाहको हिन्दू तुरुककी

शब्द। (२१७)
एतीबड़ी गुस्ताखी कव नीक लगेगी। अथवा हिन्दू तुरुक की एक राहहै कहै
एक रामनाम लियेते उद्धार होईहै सो कर्मते निवृत्त ह्वैकै न हिंदू राम कहैं न
मुस्लमान खोदा कहैं आपने आपने कर्म में सब लगे हैं तेहिते माया कैसे छूटै।
अथवा न नारायणराम कह्यो कि तुम झटका मारौ न खोदा इकह्यो कि तुम
हलाल करौ ये दोऊ अपने अज्ञानते बनाइ लियो है ॥ ५ ॥
इति दशवां शब्द समाप्त ।
अथ ग्यारहवां शब्द ॥ ११ ॥
( ब्राह्मण )
संतो पांडे निपुण कसाई ।
बकरा मारि भैंसाको धावै दिलमें दर्द न आई ॥ १ ॥
करि स्नान तिलक करि बैठे विधिसों देवि पुजाई ।
आतम राम पलकमो विनशे रुधिरकी नदी बहाई ॥ २ ॥
अतिपुनीत ऊंचेकुल कहिये सभा माहिं अधिकाई ।
इनते दीक्षा सबकोई मांगै हँसि आवै मोहिं भाई ॥ ३ ॥
पाप कटनको कथा सुनावैं कर्म करावैं नीचा ।
बूड़त दोउ परस्पर देखा गहे हाथ यम घींचा ॥ ४ ॥
गाय बधै तेहि तुरुका कहिये उनते वैका छोटे ।
कहहि कबीर सुनौहौ संतो कलिके ब्राह्मण खोटे ॥ ५ ॥
संतो पांडे निपुण कसाई ।
बकरा मारि भैंसाको धावै दिलमें दर्द न आई ॥ १ ॥
करि स्नान तिलक करि बैठे विधिसों देवि पुजाई ।
आतमराम पलकमो विनशे रुधिरकी नदी बहाई॥२॥

( २१८ ) बीजक कबीरदास ।
हेसंतो ! पांडे निपुण कसाई हैं काहेते कि, कसाई अविधिते मारै है वह
विधिते मारै है याते निपुण है । बकराको मारिके भैंसाके बलिदान दीबेकों
धावै है ॥ १ ॥ स्नान करिके रक्तचंदनके बड़ेबड़े तिलक दैके बैठे हैं औ
विधिसों देवीको पुजावै है अरु यह कहै है अंतर्यामी सर्वत्र है, औ बकरा मैं-
साको मूड़काटि डारै है, रुधिरकी नदी बहनलगै है तबवह आतमारामजो है
जीव ( कहे आत्माजो है शरीरतेहि बिषे है आरामजाको ) सो बिनशि जायहै
कहे शरीरते जुदा ह्रैजाय है ॥ २ ॥
अति पुनीत ऊंचे कुल कहिये सभा माहँ अधिकाई ।
इनते दीक्षा सब कोउ मांगै हँसि आवै मोहिं भाई ॥३॥
सो ऐसे ऐसे दुष्ट कसायनको अति पुनीत ऊंचे कुलके कहै हैं । अरुसभामें
उनहींकी अधिकाई है कहे शास्त्रार्थ करिके सभामें आपनिन अधिकाई राखै
है । तेहिते सबकोई दीक्षामांगै हैं कि, हमको दीक्षादै संसारते उबारिलेउ ।
सो यह देखिकै मोको हँसी आवै है कि, आपई नरकमें जाइ है तौ और
कों नरकते कैसे उबारि है अर्थात् तोहूको वही नरकमें डारिदेई है ॥ ३ ॥
पाप कटन को कथा सुनावै कर्म करावै नीचा ।
बूड़त दोउ परस्पर देखा गहे हाथ यम घींचा ॥ ४ ॥
वोई गुरुवालोग पापकटनको तो कथा सुनावै हैं रामायणादिक औ वही
कथामें वर्णन है कि, रघुनाथजी शिकार खेलै हैं । सो गुरुवालोग कहै हैं कि
तुमहूंशिकारखेलो । यहनहीं जानै हैं कि रघुनाथजी तिर्यग्योनि वालेन परदया
करी कि, ई ज्ञानभक्ति बैराग्यकैसे करेंगे याते मारिकै मुक्तिकरिदेइ हैं और हम
इनको मारेंगे तो पाप ते हमई दोऊ नरकै जायँगे । याहीते दोऊगुरु चेलाकों
परस्परनरकमें बूड़त देख्यो है तिनको नरकमें डारिबेको यमघींचही धरै हैं ।
नरकमें डारिदेहिं गे तब नरकमें गुहमूत्र खाइगो औ मारो जाइगो । औ जों
जीवनको मारिकै मांस खायो है तेई वाके मांसको खायेंगे। औ अपने २ सींगन
ते खुरनते मारेंगे । याते मांस खायो है वै जीवतही मांस खायेंगे । इहांतें
जो जीवन को वह मारचो तिनको क्षणमात्रको क्लेश है औ वहां वे जीक

शब्द । ( २१९ )
वाको बारंबार मारेंगे । मरणको क्लेश क्षणमें होइगो औ यातना शरीर लाख-
नवर्ष न छूटैगो या कथा गरुड़ पुराणादिक में प्रसिद्ध है ॥ ४ ॥
गाय बधै तेहि तुरुका कहिये उनते वैका छोटा ।
कहहि कबीर सुनो हो संतो कलिके ब्राह्मण खोटा ॥ ५ ॥
जे गायको मारै हैं ते मुसल्मान कहावै हैं सो इनते वै का छोटे हैं । तुरुक
गायमारै हैं अरु वै भेड़ा भैंसा मारै हैं । आत्मातो सब एक हीहै । सो कबी-
रजी कहै हैं कि, हेसंतो ! कलिके ब्राह्मण बहुत खोट हैं काहे ते कि, जे शास्त्र
को नहीं समझैं तेतो मूढ़ही हैं, वे खोटकर्म करोई चाहैं परन्तु जे शास्त्रको
समझै हैं तिनहूंको समुझाइकै खोटकर्ममें लगाइ देइ हैं अपनी पाण्डित्यकें
बलते । ब्राह्मण जो कह्यो ताको या अर्थ है सबको यही समुझावै है को काको
मारै है सर्वत्रतो एकई ब्रह्म है औ कोई या समुझावै है कि बलिदानदै देवीको
प्रसन्नकरो तुमको ब्रह्मज्ञान दै ब्रह्मबनाइ देगी ॥ ५ ॥
इति ग्यारहवां शब्द समाप्त ।
अथ बारहवां शब्द ॥ १२ ॥
संतो मतेमात जनरंगी ।
पीवत प्याला प्रेमसुधारस मतवाले सतसंगी ॥ १ ॥
अर्धऊर्ध्वलै भाठी रोपी ब्रह्म अगिनि उद्गारी ।
मूंदे मदन कर्म कटि कसमल संतत चुवै अगारी ॥ २ ॥
गोरख दत्त वशिष्ठ व्यासकवि नारद शुक मुनि जोरी ।
सभा बैठि शंभू सनकादिक तहँ फिरि अधर कटोरी ॥ ३ ॥
अंबरीषऔ याग जनक जड़ शेष सहस मुख पाना ।
कहँलौं गनों अनंत कोटि लै अमहल महल दिवाना ॥ ४ ॥

( २२० ) बीजक कबीरदास ।
ध्रुव प्रह्लाद विभीषण माते माती शिवकी नारी ।
सगुण ब्रह्म माते वृन्दावन अजहुं न छूटी खुमारी ॥ ५ ॥
सुर नर मुनि जेते पीर औलिया जिन रे पिया तिनजाना।
कहै कबीर गूंगेकी शक्कर क्यों कर करै वखाना ॥ ६ ॥
संतो मते मात जन रंगी ।
पीवत प्याला प्रेम सुधारस मतवाले सतसंगी ॥ १ ॥
संतो मतेकहे संतनके जेमतहैं जिनमें रंगेजे जनहैं तेईमात कहे मातिरहे हैं ।
“रंगच्छतीतिरंगः रंगोस्यास्तिगुरुत्वेनेतिरंगी” रकार बीजको जो कोई प्राप्त होइ
है सो रंग कहावैसो रकार बीज रामोपासकनके होइहैते रामोपासक जाके गुरुहोइ
सोकहावैरंगी । अथवा सुरति कमल बैठे जे परम गुरुहैं ते रकार बीजको उच्चार
करै हैं, सो रकार बीजको जो कोई वहां जाइकै सुने सो रंगीहै।सोई रंगी संतनके
मतमें माते है । औ कबीरऊ रकारई बीजको जपत रहेहैं सोवंशावलीमें लिख्यो
है। श्रीराजारामसिंह बाबाकबीरजीते पूछ्यो कि आपका कौन सिद्धांतहै तब कबी-
रजी कह्यो ॥ “रा अक्षर घट रम्यो कबीरा।निज घर मेरो साधु शरीरा” ॥
सो पीछे लिखिआये हैं । अरु सुधाको मादकधर्म है सो श्रीरामचन्द्र के प्रेम-
रूपी प्यालामें भरचो जो है सुधारसरूपा भक्ति ताको जे पानकरै हैं तिनके
सत्संगी जे हैं तेऊ मतवाले हैनायेहैं कहेपरम सिद्धांतवालो जो मत है तेहि तें
युक्त हैंजाइहैं । अथवा रसरूपा भक्तिको नशा चढ़ोरहै दिनराति अर्थात् रस
आनन्दको कहै हैं सो आनन्दमें निमग्नरहैं तामें प्रमाण ॥ “रसोवैसःरसं-
ह्येवायंलब्ध्वानन्दीभवति ॥” इतिश्रुतेः इहां सुधारस को कह्यो ताको हेतु यह
है कि जे सुधारसको पीते हैं तेई जनन मरण छोड़िकै अमर होयहैं औरनको
जनन मरण नहीं छूटै है अरु वह रसरूपा भक्ति मधि उत्तत्ति भयो है ताको
रूपक करिके समुझावै हैं ॥ १ ॥
अर्ध ऊर्ध्व लै भाठी रोपी ब्रह्मअगिनि उदगारी ।
मूँदे मदन कर्म काटि कसमल सतत चुवै अगारी ॥ २ ॥

उहां समेटिकै कहिआयेहैं अबइहां रसरूपा भक्तिको मदको रूपककरिकै
कहैं हैं । अध कहे नीचेके लोक ऊर्ध्वकहे ऊंचेके लोक पर्यंत जो सारासारकों
विचार ( सारकहे चित् अचितरूप साहबको या जगत् मानिबो औ असार कहें
नानात्व जगत् मानिबो या जो विचार ) सोई भाठी रोपतभये । औ तेहिते-
भयो जो यथार्थज्ञान कि, सब सच्चिदानन्द स्वरूपहै काहेते चितौँ अचित साह-
बको रूपहै यहिहेतु ते सोई ब्रह्म अग्नि उद्गारीकहे बारत भये । महुवा नरमें
धरैहै इहांमदन जोमनोज तौनैजोहै शरीरनर अर्थात् वीर्य्यते शरीर होइहै सो
अंतःकरण में मूंदे । जे साहबकी अनेक प्रकारकी जो लीला तिनके जे ज्ञान
ध्यान तेई महुवादिक द्रव्यहैं, तिन्हें जोकर्मनकी बरोबरि मानिबो जो या भ्रम
सोई जो कर्मरूप कसमल ताको काटिडारचो, तब निश्चयात्मक बुद्धिने पात्र
तामें रसरूपाभक्ति रूपजो अगारी सो निरंतर चुवनलागी ॥ २ ॥
गोरख दत्त वशिष्ठ व्यास कवि नारद शुकमुनि जोरी।
सभा बैठि शंभू सनकादिक तहँ फिरि अधर कटोरी ॥३॥
गोरख दत्तात्रेय बशिष्ठ व्यास कबि कहे शुक नारद शुकमुनि कहे शुकाचार्य
तेई सब जोरि जोरि इकट्ठाकरि धरतभये । औ सभाके बैठैया जे हैं शंभु सन-
कादिक तहां रसरूपा भक्ति जो सुधा रस तेहि करिके भरी जो है प्रेम रूपी
कटोरी सो तिनके अधरहैं कहे मनकरिके न कोई धरिसकैहै अर्थात् न मनमें
आवै न वचनमें आवै वाके पानकरतमें छकि सब जायहैं । रसवाच्यमें नहीं
आँवैहै यहसर्वत्र ग्रंथनमें प्रसिद्धहै ॥ ३ ॥
अंबरीष औ याज्ञ जनक जड़ शेष सहस मुख पाना ।
कहँलों गनों अनंत कोटिलै अमहल महल देवाना ॥ ४॥
अंबरीष औ याज्ञवल्क्य औ जड़भरत औ शेषकहे संकर्षण औ सहसमुख
कहे शेषनाग ते पान करतभये । सो कहांलों मैं गनों परम परपुरुष श्रीरामचन्द्र
के जे अमहल महल अनंत कोटि हैं ताहीमें लीनभये औदिवाना होतभये कहे
मत्तहोतभये । इहां अमहलमहल जोकह्यो सोऊ जे अयोध्याजीके महलहैं
अमहलहैं कहे महल नहीं हैं अर्थात् प्राकृत पांचभौतिक नहीं हैं । अरु महल

( २२२ ) बीजक कबीरदास ।
जो कह्यो ताते आनन्दरूप वे महल बर्त्तमान बने हैं । अमहल कह्यो याते
निर्गुणधर्म आयो औ महलकह्यो याते सगुणधर्म आयो । सगुणनिर्गुण में नहीं
होयहै । निर्गुण सगुणमें नहीं होयहै उन में दोनों धर्म बने हैं ताते वे निर्गुण
सगुणके परे विलक्षण महलमें हैं । तिनमें जायके दिवाने भये । माया ब्रह्ममें जो
दिवानेरहे सो छोड़ि दिये । अमहलमें दिवाना ह्वै गये महलन में साहबकी अनेक
प्रकारकी लीलनको ध्यान कैकै हंसरूप में स्थित ह्वैकै रसरूपाभक्ति पानकैकै
छकिरहे । रसरूपाभक्ति शांतशतक के तीसरे खंड में औ रामायणादिकमें
हमलिखे हैं सो देखिलेहु ॥ ४ ॥
ध्रुव प्रह्लाद विभीषण माते माती शिवकी नारी ।
सगुण ब्रह्म माते वृन्दावन अजहुं न छूटि खुमारी ॥५॥
औ ध्रुव प्रह्लाद विभीषण औ पार्वती मतिगई औ सगुण ब्रह्म जे साक्षात
नारायण श्रीकृष्ण हैं तेऊ वृन्दावन में मतिगये । अबहूं भरखुमारी नहीं छूटी
की भाव यहहै कि, जिनके शरीर छूटे तेतो साकेतहींमें जाय दिवानेभये कहे
प्रेम में छके । ओ जिनके शरीर बनेहैं तिनहूंकी खुमारी नहीं छुटी कहे अबहूं
भर श्रीरामचन्द्रहीकी उपासना करेहैं तामें प्रमाण ॥ ( पूजितोनंदगोपाद्यैःश्री-
कृष्णेनापिपूजितः । भद्रयामहिशीभिश्चपूजितोरघुपुङ्गवः ॥ ) यह ब्रह्मवैवर्त्त
को प्रमाण है जौने को प्रमाण सब आचार्य दियो है ॥ ५ ॥
सुर नर मुनि जेते पीर औलिया जिनरे पिया तिन जाना।
कहै कबीर गूं गे को शक्कर क्यों करि करे बखाना ॥ ६ ॥
औ सुर नर मुनि जेते पीर औलिया हैं तिन में जे श्रीरामचन्द्र की उपासना
कियेहैं तेई रसभरी प्रेमकटोरी पियो है औ तेई मन बचनके परैहैं । जे साहब-
के नामरूप लीलाधाम तिनको जान्यो है । सो जिनजान्यो है तिनको वर्णन
करिवेको वह गूंगे को शक्कर है काहेते वह मन बचनकेपरे है, जब वहीभांति
उन्हौहै जाय तब बाको स्वाद पावै । काहू सों वाको कोई बखान नहीं करि
सकैहै । सो कबीरजी कहैहैं । जो कोई कहै यहअर्थ नहीं है वह प्रेमको पियाला
जो कबीरजी ब्रह्मको कहिआयेहैं वहीको पीपीकै सब मतवार ह्वैगये हैं,सांचपदार्थ

शब्द । (२२३)
नहींजान्यो, तौ हम यहकहैं हैं कि, जिनको कबीरंजी आगे वर्णन करिआंयेहैं
तेई नहीं जान्यो तौ तुम्हीं कैसेजान्यो ? जो कहोहम अपने गुरुवनके बताये
जान्यो तो गुरुवनको कह्यो वाणीको कह्यो तो तुमही झूठकहौहो । जो कहो
पारिख करिकेजान्यो तो पारिखकिये तौ मन बचनके परे औ निर्गुण सगुणके
परे जे शुद्ध जीवात्मा सदा रघुनाथजीके निकटवर्त्तीते औरश्रीरामचन्द्र येई
आवैहैं वेद शास्त्रमें प्रमाण मिलै हैं तुमपारिखकहिके मनबचनके परेकौन पदार्थ-
राख्यो है । जोकहो हमजीवात्माको मानैं हैं औ कोई ब्रह्मको मानैहैं तौ आत्मा
औ ब्रह्म येहू नामहै बचनमें आयगयो । औ तुम जो विचारकरौहो सो मन में
आयगयो । जो कहो तुम्हीं कैसे श्रीरामचन्द्रको मनबचनके परे कहौहौ
वोऊतो मन बचनमें आय जायहैं; तौ हम पूर्व लिखिआये हैं कि, नारायण
राम अवतार लेइँहें तिनके नामरूप लीला धामके वर्णन करिके, वे जे परमप-
रुषश्रीरामचन्द्रहैं तिनको सपरिकर लक्षितकरैं हैं। वे मन बचनके परेहैं
औ यहूआगे लिखिआये हैं कि ॥ (ऐसी भांति जो मोकहँ ध्यावै। छठयें मास दर-
शं सो पावै ) ॥ सो अपनी इन्द्रियहै आपैदेखेपरे हैं जो कोई उनके प्रसन्नकरिबेको
उपायकरै है सो साहिबैके जनाये जानै है । तामें प्रमाण कबीरजी की साखी
सागरकी चौपाई ॥ (जौनैसो जोमहीं जनाऊं । बांह पकारिलोकै लैआऊं )॥
बीजकमेंलिखी है साखी ॥ (बहुबंधनतेबांधिया एकबिचाराजीव । काबलछूटै
आपनो जो न छुड़ावैपीव ) ॥ उनको वर्णन कोई जीवनहीं करिसकै है, ते-
हिते जो पारिख हम कियो सोई सांचहै जो तुम पारिखकरौहौ सोझूठहै । तुम
श्रीकबीरजीको अर्थजानते नहींहो भ्रममें लगेहो अनामा उन्हीं को नामहै अरु
वोई हैं तामें प्रमाण ॥ ( अनामासोऽप्रसिद्धत्वादरूपो भूतवर्जनात् ॥ इति
वायुपुराणे ) ॥ ६ ॥
इति बारहवांशब्द समाप्त ।
अथ तेरहवांशब्द ॥ १३ ॥
राम तेरी माया दुन्दि मच्चावै ।
गति मति वाकी समझिपरै नहीं सुर नर मुनिहिं नचावै॥१॥