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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

भिमानहै तबलग शीतउष्णहैआत्माको नहीं लगैहै साहब कहैंहैं । कि वह जोहैं
आत्मामेरी घराणि कहे स्त्री अर्थात् जीवरूपा मेरीशक्ति सो मैं जो हौं याकों
खसमताको नहीं चीन्हहै त्यहिते बौरीकहे बौरायगई ॥ ३ ॥ साँझ सकार
दियालैबारैहै कहे समाधिलगायकै ज्योति को बारिकै कुंडलिनी उठाइ आत्माकों
लैजाइकैकै वही ज्योतिमें मिलाये है औ याको मैं खसमहौं सो मोको छोड़िकै
लगवार जोहै धोखा ब्रह्म ताको सुमरै है ॥ ४ ॥
वाहिकेसँगमेंनिशिंदिनराँची । पियसोंवातकहै नहिंसाँची ५
सोवतछांड़िचली पियअपना । ईदुखअवधौंकहवक्याहिसना
सुरतिरुपी नारीजो है दूती ताहीके साथद्वैकै वहीधोखा ब्रह्म में निशिदिन
रचिरही है कहे प्रीतिकरिरही है पियजोमैं हौं तासों सांचीबात नहींकहैहै सांची
बात कहाहै कि मैं तिहारोहौं यहनो कहै तौ मैं जीवरूपा शक्तिको छोड़ाइलेउँ
साहबकी यह प्रतिज्ञा है जो मोको जानै मोकोगोहरावै तौमेंसंसारते छुड़ाइलेउँ तामें
प्रमाण॥ "अबहूंलेउँ छुड़ाय काल ते जोवटसुरति सम्होरै" ॥५॥ सो जीवरू-
पाशक्ति मोको न जान्यो मोको न गोहरायो सोवत रहि गई जागत न भई
सोवतमें मोकोछोड़ि स्वप्न देखनवाली संसारीद्वैगई अर्थात् मोहरूपी निद्रा जब
प्राप्तभई तब संसार में परि कै नाना दुःखपावैहै सो यहदुःख अपनो कासों
कहै सांच जो मैं ताको तौ जानै नहीं है अरु और सब स्वप्नते झूठे हैं ॥६॥
साखी ॥ अपनीजाँघउघारिकै, अपनी कही न जाइ ॥
कीजानै चितआपना, कीमेरो जन गाइ ॥ ७ ॥
साहब कहै हैं कि यहिभांति मेरी जीवरूपाशक्ति मोकोछोड़ि कै संसारीद्वै
गई सो अपनीजंघा जो उघारिहोइ तौ कोई कहां अपनोगिल्ला करै है नहीं
करैहै ऐसे मेरी शक्ति यह जीव सो जो और और लगवार जोहैं सो यह दुःख
का मोसों कहिजाइहै नहीं कहिजाइहै कि तो मेरो दिल जानैहै याको उद्धार द्वै
जाइ याही चाहौंहौं औ कि मेरेजन जेहैं ते मेरो सौशील्य दया बात्सल्यादिक
गुणगान करिकै जानै हैं कि साहबमें निर्दोष सौशील्यादिक गुणहैं जीवको उद्धार

( १६८ ) बीजक कबीरदास ।
चाहै हैं और तो अज्ञानी जीव अपनो भूल न जानेंगे याहीजानेंगे कि जो साहब
सबको मालिकहै सब करिवेको समर्थहै ताकी जो इच्छा होती तौ हमसब जीवके
बंध ते तामेंप्रमाण॥ “सोपरंतु दुखपावत शिर धुनिधुनिपछिताय। कालहि कर्महि
ईश्वरहि मिथ्यादोष लगाय” ॥ ७ ॥
इति तिहत्तरवीं रमैनी समाप्त ।
अथ चौहत्तरवीं रमैनीं ।
चौपाई ।
तहिया गुप्त थूलनाहिं काया। ताके सोग न ताके माया॥१॥
कमल पत्र तरंग यकमाहीं। सङ्गहिरहै लित पै नाहीं ॥२॥
आश ओस अंडनमँह रहइ। अगणित अंड न कोईकहई॥३॥
निराधार आधार लैजानी । रामनाम लैउचरी वानी॥४॥
धर्मकहै सब पानी अहई । जातीके मन वानी रहई॥ ५ ॥
ढोर पतंग सरै धरिआरा। तेहि पानी सब करै अचारा॥६॥
फंद छोड़ि जो बाहर होई । बहुरि पंथनाहिं जोहै सोई ॥७॥
साखी ॥ भर्मक बांधल ईजगत, कोइ न किया विचार ॥
हरिकि भक्तिजानेविना, भवबूडि मुवासंसार॥८॥
तहियागुप्त थूलनाहिंकाया । ताकेसोगनताके माया ॥ १ ॥
कमलपत्र तरंगयक माहीं । संगहिरहै लितपै नाहीं ॥ २ ॥
आशओसअंडनमँहरहई । अगणितअंडनकोईकहई ॥३॥
निराधारआधार लैजानी । रामनाम लैउचरीबानी ॥ ४ ॥

जबजीव भूल्यो है तहिया कहे तब स्थूल शरीर नहीं रह्यो औ गुप्तकहे
सूक्ष्म कारण महाकारण येशरीर नहीं रहेहैं औ न तेहिजीवके सोगरह्यो औ
न मायारहीहै ॥१॥ जैसेकमल पत्रमेंजल रहैहै पै कमलपत्र म लिप्त नहीं रहै
है तैसेयह आत्मामें माया ब्रह्म यद्यपि सब कारण रहै हैं । परन्तु माया ब्रह्ममें
आत्मालिप्त न रह्यो ॥ २ ॥ ब्रह्मह्वैबेकी जो आशाहै ताईपियासह्रै सो ओसचाटे
कहूं पियास जाइहै ओसके समजौहै ब्रह्मानंद सो जीवरूपजैहैं अंड तिनमें
रहैहै अर्थात् कारणरूपते जीवमें बनो रहैहै जब समष्टिजीवरह्योहै तब रहैतौ
अगणितहैं अंड परंतु सब मिलि एकई कहावत रह्योहै अगणित कोई नहीं कहत
रह्यो ॥ ३ ॥ निराधार जो निराकार ब्रह्महै जामें सबजीव भेरैहैं ताको आधा-
रलै जानिये कि साहबके लोक में है अर्थात् साहेबके लोकको प्रकाशहै तबतो
समष्टिरही याही रामनाम लैकैबाणी उचरीकहे प्रकटभई इहां रामनाम लैकै
बाणीप्रगटभई ताकोहेतु यहहै कि बाणीमें जगत प्रगटकरिबेकी शक्ति नहीं रही
रामनामको जगत् मुख अथ लैकैबाणी उचरीहै पांचोब्रह्म समत जगत् उत्पत्ति-
कियोहै सोई इहां सिद्धांत करै है ॥ ४ ॥
धर्मकहै सब पानी अहई । जातीके मन वानी रहई ॥५॥
ढोरपतंगसरै घरिआरा । तेहिपानीसबकरै अचारा ॥ ६ ॥
फन्दछोड़िजो बाहरहोई । बहुरिपन्थ नहिं जोहैसोई ॥ ७ ॥
वेदशास्त्रमें आत्माको धर्म कहै हैं कि आत्माचितहै याते चित धर्महै जैसे
जलमें जलमिलै तो एकई होजाइहै ऐसेचिन्मात्र जो ब्रह्महै तामें मिलिकै चित्त-
जोहै जीव सोएकई ह्वैजाय काहेते कि दुहुनको चितधर्म एकईहै औ जातीकहे
सब जाति जेजीवहैं ते आपने स्वस्वरूपको चीन्हें हैं कि मैं साहबको अंशहौं जाति
कारिकै वहींहौं कछु स्वरूप करके नहींहौं भेद बनोई है बह सर्बज्ञहै मैं अल्पज्ञहौं
वह बिभुहै मैं अणुहौं वहस्वतंत्र है मैं परतंत्र हौं यह जो कहैहैं कि आत्मा
ब्रह्मई है सोतौ बाणीको बिस्तारहै सामान्यधर्मलैकै कहैंहैं ॥ ५ ॥ ढोर पतंग
घरिआर आदिक जामें सरै हैं ताही जलमें सब आचार करै हैं अर्थात् जौनी-

( १७० ) बीजक कबीरदास ।
बाणी में सब मरि मरि समाइ है और पुनि वहीते उत्पत्ति होइहै औ जोन
सबजीवको फंडायेहै तौनीही बाणीमें कहे सब आचारकरैहैं अथवा वही बाणीकों
आचरणकरै है अपनेको ब्रह्ममानैहै काहूको आचार ठीक नहीं है ॥ ६ ॥ यह
बाणीके फंदते बाहरह्वैकै परमपुरुष जे श्रीरामचन्द्रहैं तिनमें जो लागै तो पुनि
जगतके पन्थको न जोहै अर्थात् फिरि न जगतमें आवै ॥ ७ ॥
साखी ॥ भर्मकवांधलईजगत, कोइनाहिंकियाविचार ॥
हरिकीभक्तिजानेबिना, भवबूड़िमुवासंसार ॥८॥
यहि भांति भर्म जोमाया सबलित ब्रह्म त्यौहिकरिकैबँध्यो जो यह संसारहैं
ताको कोई नहीं बिचार कियो हरि कहे सबके कलेश हरनहारे वेद तात्पर्यार्थ
जे श्रीरामचन्द्रहैं तिनकी भक्ति के बिनाजाने भर्मके समुद्रमें संसार बूड़ि मुवा
कहे संसारीजीव बूड़ि मुयो ॥ ८ ॥
इति चौहत्तरवीं रमैनी समाप्त ।
अथ पचहत्तरवीं रमैनी ।
चौपाई ।
तेहिसाहवके लागोसाथा । दुइ दुखमेटिंकै होहुसनाथा॥१॥
दशरथकुलअँवतरिनहिंआया।नहिंलंकाकेरायसताया॥२॥
नहिं देवकिक गर्भहिआया।नहींयशोदा गोद खेलाया॥३॥
पृथ्वीरमनदमननहिंकारिया ।पैठिपतालनहींवलिछलिया४
नहिंवलिरायसोमांडीरारी । नहिंहिरणाकुशबधलपछारी५
वराहरूपधरणीनहिंधरिया।क्षत्रीमारि निक्षत्रनकरिया॥६॥
नहिंगोवर्द्धनकरतेधरिया । नहींग्वालसँगबनबनफिरिया ७
गण्डकशालग्रामनशीला।मत्स्यकच्छह्वैनहिंजलहीला॥८॥
द्वारावती शरीर न छांड़ा।लै जगनाथ पिंड नहिं गाड़ा॥९॥

रमैनी । ( १७१ )
साखी ॥ कहाहिं कबीर पुकारिकै, वा पन्थे मतभूल ॥
जेहिराखे अनुमानकरि, सो थूलनहीं स्थूल ॥१०॥
तेहिसाहबकेलागोसाथा । दुइदुखमेटिकेहोहुसनाथा ॥ १ ॥
जिनको पूर्व कहि आयेहैं ते हरि कहे रक्षक मन वचनके परे परमपुरुष जे
श्रीरामचन्द्र है तिनके साथमें लागो दूनों जे दुःख हैं निर्गुण और सगुण
तनका मेटिकै सनाथ होउकहे नाथ जे साहबहैं तिनते सहित वह साहब कै-
सोहै कि धोखाब्रह्महै नहीं है औ कौन्यो अवतारमें नहीं है अर्थात् निर्गुण सगु-
णके परे हित वह साहब कैसो है कि धोखाब्रह्महै नहीं है औ कौन्यो अवतार
में नहीं है अर्थात् निर्गुण सगुणके परे है कबहूं जब कौन्योकल्प में बाणनके
युद्धकी इच्छा होइहै तब आपही प्रकट हैकै प्रतापी नामको रावणहोइहै तासों
बाणनको युद्ध करैहै औ फिर शरीर सहित को चले जाइहै औ बहुधा जे अव-
तार होइहैं ते नारायणै अवतार लेइहैं ॥ १ ॥
दशरथकुलअवतरिनहिंआया। नहिंलङ्काकेरायसताया॥२॥
नहिंदेवकिकेगर्भहिआया। नहिंयशोदागोदखेलाया ॥ ३ ॥
पृथ्वीरमनदमननहिंकरिया।पैठिपताल नहिंवलिछलिया ४
श्रीकबीर जी कहे हैं कि, वे श्रीरामचन्द्र कौन्यो अवतार में नहीं हैं दश-
रथ के यहां अवतार नहीं लियो दशरथ के यहां अवतारलै नारायणै रावणको
मारै हैं ॥ २ ॥ अरु वे साहब देवकी के गर्भ में नहीं आयो अरु वाको
यशोदा गोदमें नहीं खेलायो ॥ ३ ॥ अरु वे साहब पृथ्वी रमण है कै म्ले-
च्छनको दमन अर्थात् बामन रूप नहीं धरयो ॥ ४ ॥
नहिंवलिरायसोंमाड़ीरारी। नहिंहिरणाकुशवधलपछारी ५॥
बराहरूपधरणीनहिंधरिया । क्षत्रीमारिनिक्षत्रनकारिया॥ ६॥
नहिंगोवर्द्धनकरगहिधरिया। नहिंग्वालसँगवनवनफिरिया७
अरु वे साहब बलिरायसों रारि नहींमांड्यो कहे मोहनीअवतारलै देवतनको
अमृत पिआय दैत्यनको बारुणीपिआय बलिसों युद्धकरि दैत्यनको विष्णुरूप है

( १७२ ) बीजक कबीरदास ।
नहीं मार्यो औ हिरण्यकश्यप को पछारिकै नहीं बाघ्यो कहेनहीं बघ्यो अर्थात्
नृसिंह रूप नहीं धर्यो ॥ ५ ॥ अरु वे साहब बाराहरूप धरिकै डाढ़में
धरणी नहींधर्यो औ क्षत्रिनको मारिकै निक्षत्र नहीं कियो अर्थात् परशुरामकों
अवतार नहीं लियो ॥ ६ ॥ अरु वे साहब करते गोवर्द्धनको नहीं धर्यो
अर्थात् गोविंदरूप नहीं धर्यो औ न ग्वालके सङ्ग बन बनमें फिरचो है याते
हलधर रूपनहीं धर्यो ॥ ७ ॥
गंडकशालग्रामनशीला। मत्स्यकच्छहै नहिंजलहीला॥८॥
द्वारावतीशरीरनछाड़ा। लैजगन्नाथपिंडनहिंगाड़ा ॥ ९ ॥
अरु वे साहब गण्डक म शालग्राम का शिला नहीं भये औ न मत्स्य
कच्छ हैके जलमें परे हैं ॥ ८ ॥ अरु वे साहब द्वारावती में शरीर नहींछो-
ड़ेहै अर्थात् कालस्वरूप नहीं धारण कियो जौनजौन फिरि द्वारावताम छोड़्यो
है औ जगन्नाथ के उदर म ब्रह्म जो इधा में तेजराख्यो है सो वे साहब को
तेज नहीं है यहि तरहते सगुण जे नारायण हैं औ सब अवतार हैं ते वे
नहीं हैं ॥ ९ ॥
साखी ॥ कहहिंकबीर पुकारिकै, वा पंथेमति भूल ॥
ज्यहिराखे अनुमानकरि, सो थूलनहीं अस्थूल ॥१०॥
श्रीकबीरजी पुकारिकै कहै हैं कि, वा पंथेमतिभूलकहे न जाउ ज्यहि राखें
अनुमानकारि कहे अनुमानकरि राख्यो है ब्रह्मको सोऊ वे साहब नहीं हैं औ
स्थूलनहीं स्थूलकहे न थूलहोइ सो स्थूल कहावै अर्थात् निराकार नहीं है ताते
सगुण निर्गुण साकार निकारके परे श्रीरामचन्द्र हैं यह बतायो दशरथके इहां
नारायण अवतारलेइ हैं तिनको रामनाम होइ है तिनहीं रामरूपते सगुण निर्गु
णके परे हैं ॥ १० ॥
इति पचहत्तरवीं रमैनी समाप्त ।

रमैनी । ( १७३ )
अथ छिहत्तरवीं रमैनी ।
चौपाई ।
मायामोह कठिनसंसारा । यहैबिचार न काहु विचारा ॥ १ ॥
मायामोह कठिनहै फंदा । होय विवेकी सो जन बंदा ॥ २ ॥
रामनाम लै बेरा धारा । सो तैं लै संसारहि पारा ॥ ३ ॥
साखी ॥ रामनाम अति दुर्लभै अवरे से नहिंकाम ॥
आदि अंत औ युगयुगै रामहिंते संग्राम ॥ ४ ॥
मायामोह कठिनसंसारा । यहै बिचारनकाहुविचारा ॥ १ ॥
मायामोह रूपते संसारको देखै है कहे नानापदार्थ भिन्नदेखै है याहीतें
संसार कठिन है यामें व्यङ्ग यह है कि, जो संसारकोभगवतचिदचिद् विग्रह-
रूप करिके देखै तो संसार उतरिजायबे को सरलै है सो यह बिचार कोई न
बिचारय ॥ १ ॥
मायामोह कठिनहै फंदा । होय विवेकी सोजनबंदा ॥ २ ॥
अरु कह संसारमें मायामोहरूप कठिन फन्दा है जो संसारमें सब भिन्न
भिन्न पदार्थ देखै है तौने संसार कोई भगवत्चिदचिद् विग्रहरूप देखै औ विवेकी
होइ सोई जन साहबको बन्दा है ॥ २ ॥
राम नामलै बेरा धारा । सो तैं लै संसारहि पारा ॥ ३ ॥
औ रामनाम जो है बेरा ताको आधारलैके जो कोई साहबको जान्यो है
ताको उबार ह्वैगयो है सो तैंहूं रामनामजोहै बेरा ताको आधारले कहे रामना-
ममें आरूढ़हो साहबको जानु तौ तैं संसार समुद्रको पार ह्वैजाय ॥ ३ ॥
साखी ॥ रामनाम अति दुर्लभै, अवरेसे नहिं काम ॥
आदि अंत औ युग युगै, रामहिंते संग्राम ॥ ४ ॥
श्रीकबीरजी कहैं हैं कि यह रामनाम अतिदुलभहै मोकोऔरे से काम नहीं

( १७४ ) बीजक कबीरदास ।
है आदि अन्तमें औ युगयुगमें मोसों रामैते संग्राम कहाहै कि शास्त्रार्थ करिकै
रामनाम में जो जगतमुख अर्थ है ताकोखण्डन करिकै अतिदुर्लभ जो साहब
मुख अर्थ ताकोग्रहणकरौं हैं अर्थात् जबजगतकी उत्पत्ति नहीं भईहै तब औ
युगयुगन में कहे मध्यमें अन्तम कहे जब मुक्तह्वैगयो तबहूं रामनामहीते संग्रा-
मकियो है अर्थात् रामनामको बिचार करत रहौंहौं ॥ ४ ॥
इति छिहत्तरवीं रमैनी समाप्त ।
अथ सतहत्तरवीं रमैनी ।
चौपाई ।
एकैकाल सकल संसारा । एकै नामहै जगत पियारा ॥१॥
तियापुरुषकछुकथो न जाई । सर्वरूप जग रहा समाई॥२॥
रूपअरूपजाय नहिंबोली। हलुकागरुआजाय न तोली॥३॥
भूखनलृषाधूप नहिंछाहीं। दुखसुखरहित रहैत्यहिमाहीं॥४॥
साखी ॥ अपरम परम रूपमगुरंगी, नहिंत्यहि संख्याआहि॥
कहहिं कबीर पुकारिकै, अद्भुत कहिये ताहि ॥५॥
एकै काल सकल संसारा।एकै नामहै जगतपियारा ॥ १ ॥
एक जोहै लोकप्रकाश ब्रह्म ताको अनुभव करिकै जोब्राह्मण मानिलेइहै
सोई माया सबलित ह्वैबोहै सोई काल सकल संसारमें है सो जगत को पियार
एक जोहै रामनाम ताको बिनाजाने याही ते जन्ममरण होइहै ॥ १ ॥
तियापुरुषकछुकथौनजाई । सर्वरूप जग रहा समाई ॥२॥
रूपअरूपजायनहिंबोली।हलुकागरुआजायनतोली ॥३॥
भूखनलृषाधूपनहिंछाहीं। दुखसुखरहितरहैत्यहिमाहीं ॥४॥
वह माया सबलित ब्रह्मको स्त्री न कहिसकै न पुरुषकहिसकै सर्वरूप ह्वैकै
संसार में समाइ रह्यो है॥२॥ वाको न रूप कहिसकै औ न वह हलका गरुवा

रमैनी । ( १७५ )
तौलि जाइहै कि हलुकै गरुहै अर्थात् अहंब्रह्म मानिबो तो धोखाहै जो कछु-
होइ तोकहिजाइ औतोलि जाइ ॥३॥ जौनेलोकमें न भूखह न तृषाहै न धूपहै
न छांहीं है न दुःखहै न सुखहै तौने साहबके लोकमें प्रकाशरूप ब्रह्मरहैहै॥४॥
साखी ॥ अपरमपरअरूपमगुरंगी, नहिंतेहिसंख्याआहि ॥
कहहिंकबीर पुकारिकै, अद्भुत कहिये ताहि ॥५॥
वह साहबको लोक परमरूपहै ताको प्रकाश जो है वह ब्रह्म सो परमपुरुष
है कहे परम नहीं है तौनेको आपनेहीको मानिबो जो है कि वह ब्रह्महमीं हैं
सो धोखाहै तौनेके मगमरगे जीवहैं तिनकी संख्या नहीं है अर्थात् वही प्रका-
शमें भरेरहे जे समष्टि जीवह ते व्यष्टि ह्वैगये हैं तिनकी संख्या नहीं है सो
कबीर जी पुकारिकै कहै हैं कि आपही कल्पना करिकै वह प्रकाश रूप ब्रह्म
कोमान्यो कि वह ब्रह्ममैं हौं सो वह तो लोकप्रकाशहै हे जीव! वहप्रकाशब्रह्म नहीं
ह्वैसकैहै यही धोखाम जीव बूड़ो जाइ है यह बड़ो आश्चर्य हैं औ जोयह
पाठहोइ ॥ अपरमपारै परमगुरु ज्ञानरूप बहुआहि ॥ तौ यह अर्थ है अपरम
जोहै प्रकाशरूप ब्रह्म ताहू के पारजोहै परमलोक जाको प्रकाश वह ब्रह्महै
ताको परमश्रेष्ठकहेमालिक जे परमपुरुष श्रीरामचन्द्रहैं तिनको न जान्यो वहजो
है प्रकाशब्रह्म ताको जोज्ञान कियो कि ब्रह्ममहौं वहै जो है धोखा ब्रह्म तेहिते
बहुआहि कहे जीव बहुत ह्वैगये काहेते कि ज्ञानबहुतहै ज्ञानीज्ञान करिकै ब्रह्म
मानैं हैं औ योगी जेहैं ते ज्योतिरूप में आत्माको मिलाइकै ब्रह्म मानै हैं
इत्यादिक नानारूप करिकै ऐक्यमानै हैं औ और सगुण उपासनावारे कोई
चतुर्भुज कोई अष्टभुज कोई देबी कोई गणेश कोई सर्य इत्यादिकनमें ऐक्य-
मानैं हैं ज्ञानकरिकै तेहिते ज्ञाननाना हैं औ साहब तो मनबचनके परे वह लोक
में एकही बनो है ॥ ५ ॥
इति सतहत्तरवीं रमैनी समाप्त ।

( १७६ ) बीजक कबीरदास ।
अथ अठहत्तरवीं रमैनी ।
चौपाई ।
मानुष मन्म चूकेजगमाझी । यहितनकेर बहुतहैं साझी ॥ १ ॥
तातजननिकहै हमरोवाला । स्वारथलागि कीन्हप्रतिपाला २
कामिनिकहै मोर पिय आही।वाघिनिरूप गरासै चाही॥ ३॥
पुत्र कलत्र रहैं लवलाये । जंबुक नाईं रह मुँहवाये ॥ ४ ॥
काकगीध दोउ मरण विचारैं। शूकरश्वान दोउ पंथनिहारैं ५
धरती कहै मोहिं मिलिजाई । पवन कहै मैं लेब उड़ाई ॥६॥
अग्नि कहै मैं ई तन जारौं।सो न कहै जो जरत उबारौं॥७॥
ज्यहि घर को घरकहै गवारे । सो बैरी है गले तुम्हारे ॥ ८ ॥
सो तन तुम आपनकैकजानी।विषयस्वरूप भुले अज्ञानी॥९॥
साखी ॥ यतने तनके साझिया, जन्मोभरि दुखपाय ॥
चेतत नाहीं बावरे, मोर मोर गोहराय ॥ १० ॥
मानुष जन्म चुकेजगमाझी । यहितनकेरबहुतहसाझी ॥ १ ॥
तातजननिकहैहमरोवाला । स्वारथलागिकीन्हप्रतिपाला २
कामिनिकहैमोरपियआही। वाघिनिरूपगरासैचाही ॥ ३ ॥
हे जीव ! तैं मानुष जन्मजगतके बीच में पायक चूकिगयो साहब को भजन
न कियो या तनके साझिया बहुत हैं ॥ १ ॥ औमाता पिता कहैं हैं हमारों
पुत्रह आपने अर्थ में लगिकै प्रतिपालकरै है ॥ २ ॥ औ कामिनि जो परस्त्री
है सो कहै है हमारो बड़ो प्यारो पति है बाघिनिरूप रति समय में गरासि-
बोई चाहै है अथवा वाके संगते मूड़हू काटो जायहै ॥ ३ ॥

रमैनी । ( १७७ )
पुत्र कलत्र रहें लवलाये । जम्बुकनाई रहमुहबाये ॥ ४ ॥
कागगीधदोउमरणविचारै । शूकरश्वानदोउपंथनिहारै ॥५॥
धरतीकहै मोहिंमिलि जाई। पवन कहै मैलेव उड़ाई ॥ ६ ॥
अगनिकहै मैं ई तन जारों । सोनकहै जोजरतउवारों ॥७॥
पुत्र कलत्र जो घरकी स्त्री को लालच लगाये रहे हैं धनलेवे की औ वाको
उनकी चिंता म मांससुखान जात है जैसे सियार मांस खावेको मुंहफारे रहे है
तैसे वोऊहैं ॥४॥ औकाग जेहैं गीधजे हैं शूकर जेहैं श्वान जेहैं ते मरनको पंथ
तेरो निहारै हैंया विचारै हैं कि जो मरै तौ हम मांसखायँ॥ ५॥औधरती कहै है
कि मोहिं में मिलिजाइ पवन कहै है कि याकी खाक मैं उड़ाय लैजाउँ॥ ६॥औ
अग्नि चाहै है कि याके तनको जारिडारों सो या बात कोई नहीं कहै है जाते
जरत में उबार होई बचिजाय ॥ ७ ॥
जेहिघरको घरकहै गवारे । सो वैरी है गले तुम्हारे ॥ ८ ॥
सोतनतुमआपन कै जानी विषयस्वरूपभुलेअज्ञानी ॥६॥
साखी । यतने तनके साझिया, जन्मो भरिदुखपाय ॥
चेतत नाहीं बावरे मोर, मोर गोहराय ॥ १० ॥
जेहि घरको शरीरको तू कहै है कि मेरो है सोघरशरीर तेरेगले की बेरीकहै
फांसीहै अथवा बैरी है यमके यहां गलाकटावेंगे ॥८॥ हे अज्ञानी ! तौनेशरीरको
तू आपनो मानिकै विषयनमें परिकैभूलि गयो है ॥९॥ सो यतने जेतने कहिआयें
ते यहि तनके साझी हैं तिन तेजन्म भरि तैं दुःखपायकै हेबावरे ! कहे मूढ
मोरमोर तैं गोहरावै है कि यातनमेरो है अजहूं चेतनहीं करै है कि यातनैमोकां
फांसेहै ॥ १० ॥
इति अठहत्तरवीं रमैनी समाप्त ।
१२

( १७८ ) बीजक कबीरदास ।
अथ उन्नासिवीं रमैनी ।
चौपाई ।
बढ़वतवाढ़ि घटावत छोटी । परखतखर परखावतखोटी १
केतिक कहौं कहांलों कही । औरौ कहौं परै जो सही॥२॥
कहे विनामोहिं रहो न जाई। बेरंहि लैलै कूकुर खाई ॥ ३॥
साखी ॥ खाते खाते युगगया, अजहुं न चेतो जाय ॥
कहहिं कबीर पुकारि कै, जीव अचेतै जाय॥ ४॥
बढ़वतवाढ़िघटावतछोटी।परखतखरपरखावतखोटी ॥१॥
केतिककहौं कहांलों कही । औरौ कहौं परै जो सही ॥२॥
कहे बिना मोहिं रहो न जाई । बेरहिलैलै कूकुरखाई ॥३॥
यह माया को प्रपंच जोहै सो बढ़ावत जाइतो बढ़तई जाय है रंकते इंद्रहू
ह्वैजाय तऊ चाह बढ़तई जायहै औ जो घटाइबैलगे तो घटिही जाइहै औ नाना-
मतमें लगि मनमुखी बिचारैहै तब तो खर कहे सांचैहै औ जब काहू साधुते
परखायो तब झूठहीहै जायहै ॥ १ ॥ औमैं केतिको बातकह्यो परन्तु पाथरकै-
सो पानी बहि जाइहै बेधै तौ हुईनहीं है मैं कहांलों कहौं औ औरऊ कहौं जो
सहीपरै कहे जो तोको सांच जानिपरै ॥२ ॥ हे जीव!तेरे ये दुःखदेखिकै मोको
दयाहोइहै ताते बिनाकहे मोसों नहीं रहिजाइहै जौने बेरा रामनाम संसार सागर-
के उतरिबे को मैं बताइदेउँहौं तौने बेराको कूकुर जे तामस शास्त्रवारे गुरुवालोग
ते खाई जाइहैं कहे मेरोकहो तामें नहीं लगन देइहैं औरै औरै मतमें लगाइ
देइहैं जो यहपाठ होई “बिरहिनि लैलैकूकुर खाइ” तौ यह अर्थ है कि बिरहिन
जेलोगहैं जिनको साहबकी अप्राप्ति है तिनको गुरुवालोग खाइ जाइहैं अथवा
बीर जे साहबहैं तिनते हीनजे प्राणी हैं तिनको कूकुर खाइहैं ॥ ३ ॥
साखी ॥ खाते खाते युगगया, अजहुं न चेतो जाय ॥
कहहिंकबीर पुकारिकै, जीव अचेतै जाय ॥ ४ ॥

: Is it जॉनorजौन? It has two slant strokes above: जौन. Wait, look at छड़ावनvsछुड़ावन: Let's look at छड़ावन: The letter छ: curl at top left, loop in middle, loop at bottom right, tail. Below the bottom loop, is there a ु(u-matra)? No! It's completely flat:छड़ावन. Wait, in line 16: सपनहू नहीं है जौन छड़ावन वारोहै॥१॥ Wait, look atछूटावनvsछड़ावन: छ+ड़+ा+व+न=छड़ावन. Wait, is there a dot under ड? In old prints, डoften representsड़. It has a bindu: छड़ावन. Let's write छड़ावन`.

जिनजीव गुरुवा लोगनकेसमुझाये नानामतमें लागि कहूं सांच साधूते खराखोट
नहीं परखाये तेजीव चाहत तो मुक्तिको लाभहैं परन्तु जिनसुकर्मनते अंतःकरण
`शुद्धिद्वारा सांचे साधुको ज्ञान बतायो ठहरै सो

( १८० ) बीजक कबीरदास ।
बिचारहैं नेति नेति कहैहै याते सब खोटही द्वैगयो ॥ ३ ॥ श्रीकबीरजी कहै हैं
सांचो जो है साहब रक्षकताको न जान्यो जिनकहे झीन आशा जो है कि
हमब्रह्म है जायँ तौनेको तोरि ब्रह्ममें लीनहोगे फिरि संसार परोगे तब काकों
खोरी देहुगो तुम्हीं ब्रह्महौ ॥ ४ ॥
इति असिर्वीं रमैनी समाप्ता ।
अथ इक्यासिवीं रमैनी ।
चौपाई ।
देवचरित्र सुनौ रे भाई । सो तो ब्रह्मा धिया नशाई ॥ १ ॥
ऊजेसुनी मँदोदरि तारा।ज्यहिघर जेठ सदा लगवारा॥२॥
सुरपतिजाइअहल्यहिछलिया। सुरगुरुघरणि चंद्रमाहरिया ३
कह कबीर हरिके गुणगाया । कुंतीकर्ण कुंवारेहि जाया ४
देवचरित्र सुनौरे भाई । सोतो ब्रह्माधिया नशाई ॥ १ ॥
ऊजेसुनीमँदोदरि तारा । ज्यहिघर जेठसदा लगवारा ॥२॥
बड़ेबड़े जीव मायामें परिकै भूलिगयेहैं छोटे जीवनको कहा कहियेहे भाइउ!
देवचरित्र सुनौ ब्रह्मा अपनी कन्यासंग भूलि गये ॥ १ ॥ ऊजे मन्दोदरी
ताराजेहैं तिनके घरमेंजेठही लगवारहोत आयोहै जो कहो सुग्रीव बिभीषणकों
कहतेहौ तौ तिनके घर न कहते तिनके कहते औ ई लहुरे हैं वेजेठकहैं सो
ब्रह्माके हवाले कह्यो ब्रह्माके पुत्र आपसमें काज करतभये सो पुलस्त्य जेठे हैं
ते लहुरे भाईकी कन्याको बिवाहे या मन्दोदरीके घरको हवाल भयो औ
ऋक्षराजस्त्री भये तिन्हें सूर्य औ इन्द्रगहे तिनते सुग्रीव औ बालिभये सो प्रथम
सूर्य ग्रहण कीन्हो सो उनकी स्त्री भई औ सूर्यते जेठेइन्द्रहैं तेऊपीछे ग्रहणकियो
ताराके घरको हवाल भयो सो तारा मन्दोदरीके घर जेठही लगवार होत आयो
है जो लहुर पाठहोइ तौ सुग्रीव बिभीषण बने हैं सो यहां नहीं है ॥ २ ॥

रमैनी । ( १८१ )
सुरपतिजाइअहल्याछलिया। सुरगुरुघरणिचंद्रमाहरिया ३
कहकवीरहरिके गुणगाया । कुंतीकर्णकुवारेहिजाया ॥४॥
सुरपतिअहल्याको गमनकरतभयो औ सुरगुरु जे बृहस्पति हैं तिनकी स्त्रीको
चन्द्रमा गमन करतभयो ॥ ३ ॥ औ कुन्ती जो हैं सो कुंवारेहिमां कर्णको
उत्पन्न कियो है सो कर्म तो या डौलके हैं जो नीचहू नहीं करै है परन्तु कबी-
रजी कहै हैं कि हरिके गुण गावतभये ताते इनहूकी सज्जनहीं में गिनती भई
ऐसहुमें हरिरक्षाकैलियो सो हे जीव ! तैं केता अपराध कियो ॥ ४ ॥
इति इक्यासिवीं रमैनी समाप्तं ।
2
अथ बयासिवीं रमैनी ।
चौपाई ।
सुखकबृक्षयकजक्तउपाया । समुझिनपरीविषयकछुमाया १
छौक्षत्री पत्री युग चारी । फल द्वै पापपुण्य अधिकारी २
स्वादअनंतकछुवर्णिनजाहीं । कर चरित्र सो तेही माहीं ३
नटवरसाजसाजिया साजी । सो खेलै सो देखै बाजी ४
मोहा बपुरा युक्ति न देखा । शिवशक्तीबिरंचिनहिंपेखा ५
साखी ॥ परदेपरदे चलिगया, समुझि परी नहिं बानि ॥
जो जानै सो बाचिहै, होत सकल की हानि ॥६॥
सुखकबृक्षयकजक्तउपाया । समुझिनपरीविषयकछुमाया १
छौक्षत्रीपत्री युगचारी । फलद्वै पाप पुण्यअधिकारी ॥ २ ॥
स्वादअनन्तकछुवर्णिनजाही । करचरित्रसो तेहीमाही॥३॥
साहबको बिसरायकै सूखा जो बृक्षहै यह संसार माया कहे पावत भयो बिषय
बिषरूप माया न समुझिपरी संसारीह्वैगयो ॥ १ ॥ शरीर धारनकैट छा उरमिनको

( १८२ ) बीजक कबीरदास ।
धारण करनेवाला जो जीव क्षत्री सो पत्री कहे पक्षी है जौने वृक्षचारिउ युगमें पक्षीद्वै
गयो अथवा क्षयमान जे नवगुण हैं तिनको धारणकीन्हे जो जीव सोई पत्री कहे
पक्षी है नवगुण कौन हैं सुखदुःख इच्छा प्रयत्न राग द्वेषधर्माधर्म भावना
यहितरहको जीव जो है पक्षी सो पापपुण्य फल ताको खाइबेको चारिउयुग
अधिकारीहै ॥ २ ॥ तिन फलनमें बहुतस्वादहै कछु कहो नहीं जायहै
तेहीवृक्ष में जीवरूप पक्षी चरित्रकरै है सो आगे कहैं ॥ ३ ॥
नटवरसाजसाजिया साजी । सो खेलैसो देखै बाजी ॥४॥
मोहावपुरा युक्तिन देखा । शिवशक्ती बिरंचिनहिंपेखा ॥५॥
नटके बेटा कैसी साज साजि कहे नानारूप धारण करिकै आवैजाय है जो
वाजीगर जौने खेलखेलै है तौने देखै है अर्थात् जे ब्रह्ममें लगेते ब्रह्मही देखै हैं जे
जीवात्मामे लगैहैं ते जीवात्मैको देखैहैं इत्यादि जो जौने मतमेंहैं सो ताही में
लगोहै सांच बताये लरैधावै है काहे ते उनकी वासना अनेक जन्म ते वही
है ॥ ४ ॥ गुरुवाकारिकै मोहा जो वपुराजीव है सो साहबके जानिबे की युक्ति
न देखत भयो शिवशक्त्यात्मक जगत् पूर्व कहिआये हैं सो या शिवशक्ति बिरंचि
मायारूप या बात न जानतभये ॥ ५ ॥
साखी ॥ परदे परदे चलिगया, समुझि परी नहिंवानि ॥
जो जानै सो वाचि है, होत सकलकी हानि ॥ ६ ॥
परदे परदे कहे बिना साहबके जाने संसारमें जीव चलिगया कहे संसारमें
जातरहा बाणी जोहै वेद शास्त्र सो तात्पर्य करिकै साहबको बतावैहै सो जीव-
को न समुझिपरयो जो कोई वेदशास्त्रादि में तात्पर्य करिकै परमपुरुष पर
श्रीरामचन्द्रको जानै सोई बाचैहै अपरोक्ष अर्थ जगत्मुख जानिकै सबकी हानि
होतही जाय है ॥ ६ ॥
इति बयासिर्वीं रमैनी समाप्त ।

" ? No, "गुण"
"जे"
"साहबहैं"
"तिनको"
"ज्ञान"
"जाको"
"लखायो"
"है"
"ताको"

Let's check line 19 (prose line 6):
"मनतहँई लय भयो मनोनाश बासना क्षयहैगई जब मनोनाश भयो तब धाया"
Wait:
"मनतहँई" (together)
"लय"
"भयो"
"मनोनाश"
"बासना"
"क्षयहैगई" (together: क्ष-य-है-ग-ई)
"जब"
"मनोनाश"
"भयो"
"तब"
"धाया"

Let's check line 20 (prose line 7):
"कहे हंसरूप में स्थितहै साहबके पास को धावत भयो ॥ २ ॥ क्षत्रियसोहै जो"
Wait:
"कहे"
"हंसरूप"
"में"
"स्थितहै"
"साहबके"
"पास"
"को"
"धावत"
"भयो"
"॥ २ ॥"
"क्षत्रियसोहै"
"जो"

Let's check line 2

( १८४ ) बीजक कबीरदास ।
आपनेको और और देवताके दास मानै है यहनाममिटाइदेइऔ यह जीवका जीव
नाममिटाइदेइ औ हंसरूप में स्थितह्वैकै जीवको नाम रामदास धरावै तबहीं
यहजीवको प्रतिपाल होईहै आपने देखतै जन्म मरणको लैहे कहे छोड़िदेइ
है ॥४॥ सो जो कोई या भांति साधन करै सो हालै निशानेमें घाउकरै अर्थात्
मनोनाश बासक्षय हालै ह्वै जाइहै औ जेमनमतराउह अपने मनमतमें अपनेको
राजामानै हैं जूझिकै संसारमें परे अर्थात् कोई आपनेनको ब्रह्ममानै है कोई
आत्मैंको मालिकमानैहै ते जैसे मिथ्या वासुदेव अपनेको कृष्णमानि जूझिपरयो
ऐसे येऊ मनमाया करिकै मारे जाय हैं ॥ ५ ॥
साखी ॥ मनमतमरैनजीवई, जीवहिमरण न होय ॥
शून्यसनेहीरामविन, चलेअपनपौखोय ॥ ६ ॥
मनमती न मरै है न जियै है काहेते जीवहि मरण न होय जीवको जीवत्वनहीं
जाइ है जिअब तो तब कहिये जब साहबको जानिकै साहबके लोकहि में जन्म
मरण छूटि जाय मरिबो तब कहिये जब ब्रह्ममें लीनहोय जीवत्व छूटिजाइ
जनन मरण न होइ सो शून्य जे हैं वे धोखा तिनके सनेही जे मनमती हैं तेमरै
हैं न जिये हैं जीवको तत्त्व नहीं जाइ है जीव सनातनको है तामें प्रमाण ॥
( ममैवांशोजीवलोकेजीवभूतः सनातनः ) ॥ ६ ॥
इति तिरासिवीं रमैनी समाप्त ।
अथ चौरासिवीं रमैनी ।
चौपाई ।
जोजिय अपनेदुखै सँभारू ।सोदुःखव्यापिरहोसंसारू॥१॥
माया मोह बंध सब लोई । अल्पै लाभ मूलगो खोई॥२॥
मोर तोर में सबै बिगूता । जननीउदर गर्भमहँसूता ॥ ३॥
ई बहुरूप खेलै बहु बूता । जनभौरा असगये बहूता ॥४॥
उपजैखपै योनिफिरि आवै।सुखक लेशसपनेहुंनाहिंपावै॥५॥

रमैनी । ( १८५ )
दुःख सँताप कष्ट बहुपावै । सो न मिला जो जरत बुझावै ६
मोर तोर में जर जग सारा। धिग जीवन झूठो संसारा ॥७॥
झूठे मोह रहा जगलागी । इनते भागि बहुरि पुनि आगी ॥८॥
जेहित कै राखे सबलोई । सो सो सयान बाचे नहिं कोई ॥९॥
साखी ॥ आपु आपु चैते नहीं, औ कहौतौ रिसिहा होइ ॥
कहकवीरसपनेजगै, निरस्ति अस्ति नहिं कोइ ॥१०॥
जोजियअपनेदुखैसँभारू । सोदुखव्यापिरहोसंसारू ॥ १॥
मायामोह बंध सबलोई । अल्पै लाभ मूलगो खोई ॥ २ ॥
मोरतोरमें सबै विगूता । जननी उदर गभमहँसूता ॥ ३ ॥
ई बहुरूप खेलै बहु बूता । जनभौंराअसगये बहूता ॥ ४ ॥
हे जीव ! जौन दुःखयह संसारमें व्यापिरह्यो है तौने अपने दुःखकों सँभारु
अर्थात् तौने दुःखसे निकसु ॥ १ ॥ मायामोहमें सब बँधेहौ सो अल्पतो लाभ
है अर्थात् विषय सुखतो थोरही है तिन सबकेमूल संपूर्ण दुःख के मेटनवारे जे
परमपुरुष श्रीरामचन्द्र हैं ते खोइनाइ हैं कहे बिसरि जाय हैं ॥ २ ॥ मोर
तोर याही में सब जीव विगूता कहे अरुझि रहे है याहीते जननीके उदरमें
सदा सूतत है अर्थात् गर्भवास नहीं मिटे है ॥ ३ ॥ जैसे भौंरा फूलनमें रस
लेनको जाइ है संध्या द्वै गई तब कमल संपुटित द्वैगयो तब फँसिगयो तैसे ये
जीव बहुरूपते बहुत पराक्रम करिकै खेलखेलै हैं कहे विषय रसलेनको जाय ही
मायामें फँसिजाय हैं ॥ ४ ॥
उपजैकपैयोनिफिरिआवै।सुखकलेशसपनेहुंनहिंपावै ॥५॥
दुःखसँतापकष्ट बहुपावै । सो न मिला जो जरतबुझावै॥६॥
उपजै है औ खपैकहे मरै है पुनि पुनि योनिमें फिरि आवै है सुखको लेश
सपन्यो नहीं पावै है ॥ ५ ॥ दुःख संताप कष्ट बहुतपावै है जो आगीते जरत

( १८४ ) बीजक कबीरदास ।
बुझावै सो गुरुनहीं मिलै है इहांदुःखसंताप कष्ट तीनबार जो कह्यो तामें कुछ
भेद है दुःख वह कहावै है जो काहूह मारे होइहै औ जो रोगादिकन करिकैहोइ
है सो संकष्टकहावै है औ जो कोई हानिते होइहै सो संताप कहावै है ॥ ६ ॥
मोरतोरमें जरजग सारा । धिगजीवन झूठो संसारा ॥७॥
झूठेमोहरहाजगलागी । इनतेभागि बहुरि पुनिआगी ॥८॥
जेहितकै राखे सबलोई । सो सयान बाचे नहिं कोई ॥९॥
औ तोर मोर करिकै सब संसार जर जाइ हैं यहसंसार साहब को चिद्रूप
करिकै नहीं देखै वे यह संसारको संसाररूप करिकै देखै हैं यही झूठो है सो
ऐसे झूठे संसारमें जीवनको जीबेको धिक्कार है ॥ ७ ॥ मायाको जो मोहहै
सो सब संसारमें लगिरह्यो है सो झूठो है इनते जो कोई भागिबेऊ
कियो तौ फेरि वही झूठे ब्रह्माग्निमें जरै है ॥ ८ ॥ जेने सबलोई कहैं
लोगन को हितकै राखे हैं ते सयान कालसे कोई नहीं बचै हैं तू कैसे
बचैगो ॥ ९ ॥
साखी ॥ आपुआपु चेतैनहीं, औ कहौतौ रिसिहा होइ ॥
कहकबीरसपनेजगै, निरास्तिअस्तिनाहिंकोई ॥१०॥
आपु आपुकहै अपने स्वरूपको नहीं चेतै है कि मैं परमपुरुष श्रीरामचन्द्र-
केहौं सो मैं जो समुझाऊं हौं तौ रिसहा होइ है सो कबीरजी कहै हैं कि जो-
सपने जागै सपन कहा है देहको अभिमानी मनमुखी है जागे कहै अपने
मनते यह बिचारिलेइ कि मैं जाग्यो मैं ब्रह्म है गयो अथवा आपनेको जान्यो
मैंहीं सबको मालिकहौं और कोई दूसरो छोड़ावनवारो नहीं है म अपने क।
जान्यो सो छूटिगयो सो कोई साहबको न मान्यो सो निरस्तिकहे नास्तिक है ।
सो अस्तिकहे आस्तिक न होइहै सो कहा जागैहै नहीं जागै है अर्थात् वह
ज्ञानतो धोखाहै संसार समुद्र ते तेरी रक्षाकहा करैगो ताते वहसाहबको समु-
झिजाते तेरोसंसार समुद्रते उवार करिदेइ ॥ १० ॥
इति चौरासिवीं रमैनी सम्पूर्णा ।
इति ।