कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १७२ ) बीजक कबीरदास ।
नहीं मार्यो औ हिरण्यकश्यप को पछारिकै नहीं बाघ्यो कहेनहीं बघ्यो अर्थात्
नृसिंह रूप नहीं धर्यो ॥ ५ ॥ अरु वे साहब बाराहरूप धरिकै डाढ़में
धरणी नहींधर्यो औ क्षत्रिनको मारिकै निक्षत्र नहीं कियो अर्थात् परशुरामकों
अवतार नहीं लियो ॥ ६ ॥ अरु वे साहब करते गोवर्द्धनको नहीं धर्यो
अर्थात् गोविंदरूप नहीं धर्यो औ न ग्वालके सङ्ग बन बनमें फिरचो है याते
हलधर रूपनहीं धर्यो ॥ ७ ॥
गंडकशालग्रामनशीला। मत्स्यकच्छहै नहिंजलहीला॥८॥
द्वारावतीशरीरनछाड़ा। लैजगन्नाथपिंडनहिंगाड़ा ॥ ९ ॥
अरु वे साहब गण्डक म शालग्राम का शिला नहीं भये औ न मत्स्य
कच्छ हैके जलमें परे हैं ॥ ८ ॥ अरु वे साहब द्वारावती में शरीर नहींछो-
ड़ेहै अर्थात् कालस्वरूप नहीं धारण कियो जौनजौन फिरि द्वारावताम छोड़्यो
है औ जगन्नाथ के उदर म ब्रह्म जो इधा में तेजराख्यो है सो वे साहब को
तेज नहीं है यहि तरहते सगुण जे नारायण हैं औ सब अवतार हैं ते वे
नहीं हैं ॥ ९ ॥
साखी ॥ कहहिंकबीर पुकारिकै, वा पंथेमति भूल ॥
ज्यहिराखे अनुमानकरि, सो थूलनहीं अस्थूल ॥१०॥
श्रीकबीरजी पुकारिकै कहै हैं कि, वा पंथेमतिभूलकहे न जाउ ज्यहि राखें
अनुमानकारि कहे अनुमानकरि राख्यो है ब्रह्मको सोऊ वे साहब नहीं हैं औ
स्थूलनहीं स्थूलकहे न थूलहोइ सो स्थूल कहावै अर्थात् निराकार नहीं है ताते
सगुण निर्गुण साकार निकारके परे श्रीरामचन्द्र हैं यह बतायो दशरथके इहां
नारायण अवतारलेइ हैं तिनको रामनाम होइ है तिनहीं रामरूपते सगुण निर्गु
णके परे हैं ॥ १० ॥
इति पचहत्तरवीं रमैनी समाप्त ।