कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १७४ ) बीजक कबीरदास ।
है आदि अन्तमें औ युगयुगमें मोसों रामैते संग्राम कहाहै कि शास्त्रार्थ करिकै
रामनाम में जो जगतमुख अर्थ है ताकोखण्डन करिकै अतिदुर्लभ जो साहब
मुख अर्थ ताकोग्रहणकरौं हैं अर्थात् जबजगतकी उत्पत्ति नहीं भईहै तब औ
युगयुगन में कहे मध्यमें अन्तम कहे जब मुक्तह्वैगयो तबहूं रामनामहीते संग्रा-
मकियो है अर्थात् रामनामको बिचार करत रहौंहौं ॥ ४ ॥
इति छिहत्तरवीं रमैनी समाप्त ।
अथ सतहत्तरवीं रमैनी ।
चौपाई ।
एकैकाल सकल संसारा । एकै नामहै जगत पियारा ॥१॥
तियापुरुषकछुकथो न जाई । सर्वरूप जग रहा समाई॥२॥
रूपअरूपजाय नहिंबोली। हलुकागरुआजाय न तोली॥३॥
भूखनलृषाधूप नहिंछाहीं। दुखसुखरहित रहैत्यहिमाहीं॥४॥
साखी ॥ अपरम परम रूपमगुरंगी, नहिंत्यहि संख्याआहि॥
कहहिं कबीर पुकारिकै, अद्भुत कहिये ताहि ॥५॥
एकै काल सकल संसारा।एकै नामहै जगतपियारा ॥ १ ॥
एक जोहै लोकप्रकाश ब्रह्म ताको अनुभव करिकै जोब्राह्मण मानिलेइहै
सोई माया सबलित ह्वैबोहै सोई काल सकल संसारमें है सो जगत को पियार
एक जोहै रामनाम ताको बिनाजाने याही ते जन्ममरण होइहै ॥ १ ॥
तियापुरुषकछुकथौनजाई । सर्वरूप जग रहा समाई ॥२॥
रूपअरूपजायनहिंबोली।हलुकागरुआजायनतोली ॥३॥
भूखनलृषाधूपनहिंछाहीं। दुखसुखरहितरहैत्यहिमाहीं ॥४॥
वह माया सबलित ब्रह्मको स्त्री न कहिसकै न पुरुषकहिसकै सर्वरूप ह्वैकै
संसार में समाइ रह्यो है॥२॥ वाको न रूप कहिसकै औ न वह हलका गरुवा