कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरमैनी । ( १७३ )
अथ छिहत्तरवीं रमैनी ।
चौपाई ।
मायामोह कठिनसंसारा । यहैबिचार न काहु विचारा ॥ १ ॥
मायामोह कठिनहै फंदा । होय विवेकी सो जन बंदा ॥ २ ॥
रामनाम लै बेरा धारा । सो तैं लै संसारहि पारा ॥ ३ ॥
साखी ॥ रामनाम अति दुर्लभै अवरे से नहिंकाम ॥
आदि अंत औ युगयुगै रामहिंते संग्राम ॥ ४ ॥
मायामोह कठिनसंसारा । यहै बिचारनकाहुविचारा ॥ १ ॥
मायामोह रूपते संसारको देखै है कहे नानापदार्थ भिन्नदेखै है याहीतें
संसार कठिन है यामें व्यङ्ग यह है कि, जो संसारकोभगवतचिदचिद् विग्रह-
रूप करिके देखै तो संसार उतरिजायबे को सरलै है सो यह बिचार कोई न
बिचारय ॥ १ ॥
मायामोह कठिनहै फंदा । होय विवेकी सोजनबंदा ॥ २ ॥
अरु कह संसारमें मायामोहरूप कठिन फन्दा है जो संसारमें सब भिन्न
भिन्न पदार्थ देखै है तौने संसार कोई भगवत्चिदचिद् विग्रहरूप देखै औ विवेकी
होइ सोई जन साहबको बन्दा है ॥ २ ॥
राम नामलै बेरा धारा । सो तैं लै संसारहि पारा ॥ ३ ॥
औ रामनाम जो है बेरा ताको आधारलैके जो कोई साहबको जान्यो है
ताको उबार ह्वैगयो है सो तैंहूं रामनामजोहै बेरा ताको आधारले कहे रामना-
ममें आरूढ़हो साहबको जानु तौ तैं संसार समुद्रको पार ह्वैजाय ॥ ३ ॥
साखी ॥ रामनाम अति दुर्लभै, अवरेसे नहिं काम ॥
आदि अंत औ युग युगै, रामहिंते संग्राम ॥ ४ ॥
श्रीकबीरजी कहैं हैं कि यह रामनाम अतिदुलभहै मोकोऔरे से काम नहीं