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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

( १४४ ) बीजक कबीरदास ।
साखी ॥ पाहन ह्वै ह्व सबचले, अनभितियन को चित्त ॥
जासा कियो मिताइया, सो धनभे अनहित्त॥४॥
चढ़तचढ़ावतभड़हरफोरी । मननहिंजानैंकोकरिचोरी॥१॥
चोर एकमूसलसंसारा । बिरला जनकोइजाननहारा ॥२॥
स्वर्ग पातालभूमिलैवारी । एकैराम सकल रखवारी॥ ३ ॥
गुरुवालोग आप प्राण चढ़ावै हैं अरु औरको सिखैसिखै प्राण चढ़वावै हैं
सोयही प्राण चढ़त चढ़त भड़हर जो ब्रह्म ताको फोरि कै वही धोखा ब्रह्ममें
लीनभये मनते । या नहीं जानै हैं कि साहब के ज्ञानकी चोरी को करैहै वही
धोखा ब्रह्मही तो करैहै यही नहीं जानै हैं वाहीमें लगे हैं॥१॥ सो चोर एक जो
धोखाब्रह्महै सोसंसारभरको मूसिलियो अर्थात् ब्रह्मही के ज्ञानको सबदौरे हैं
परमपुरुष को नहीं दौरे हैं तेहिते कोई बिरलाजन परमपुरुष जे श्रीरामचन्द्र हैं
तिनको जानैहै॥२॥ जे श्रीरामचन्द्र एक स्वर्ग पाताल भूमि को बारीकेसम रख-
वारी कहे रक्षा करै हैं इहां एकैराम रखवारहै यह जो कह्यो ताते बाँधनवारै
धोखा देनवारे बहुतहैं पै बंधनते छोड़ावन वारे एक श्रीरामचन्द्रई हैं दूसरों
नहीं है स्वर्गतेऊपरके भूमिते मध्यके पातालते नीचेके लोक सबआये ॥ ३ ॥
साखी ॥ पाहनह्वैह्वै सबचले, अनभितियन को चित्त ॥
जासों कियो मिताइया, सो धनभे अनहित्त॥४॥
अनभितियाको चित्तजो धोखाब्रह्महै तौनेमें लगिकै संपूर्ण जे जीवहैं ते
पाहन ह्वैगये कहेजड़वत् ह्वैगये वे धनते छोड़ावनवारे श्रीरामचन्द्रको न जानत-
भये जौन ब्रह्मते सबजीव मिताई कियो सो अनहितभये कहे संसार में डारन-
वारो धोखई ठहरयो ॥ ४ ॥
इति उनसठवीं रमैनी समाप्तं ।

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मांगि खायहैं औ फिरि २ बिरवारूप देवतनको पलुहावैकहे प्रश्नकरे जायहैं पुनि

Line 19 (टीका line 8):
उनहीं सों सम्पति कहे नाना ऐश्वर्य होय सिद्धि होइ औ पति कहे राजाहोय
Notice:

  • उनहीं सों सम्पति कहे नाना ऐश्वर्य होय सिद्धि होइ औ पति कहे राजाहोय
  • होइ has इ, not ई or य.
  • राजाहोय has no space between राजा and होय.

Line 20 (टीका line 9

( १४६ ) बीजक कबीरदास ।
पूर्व कहिआयेहैं कि एकै रामरखवारी करै हैं सो मैंहींहौं तिहारो पति तुम मोमें
लगौ जात्तेतुम्हारो उवार ह्वैजाइ तिनको तुमपति मानिराख्योहै ते तुम्हारे पति-
नहीं हैं वे बांधने वारे हैं ॥ ४ ॥
इति साठवीं रमैनी समाप्त ।
अथ इकसठवीं रमैनी ।
चौपाई ।
धर्मकथा जो कहतै रहई । लवरी नित उठि प्रातै कहई ॥ १॥
लवरिबिहानेलवरीसाँझा । यकलावरिसतहृदयामाँझा॥२॥
रामहुंकेरमर्मनहिं जाना । लै मति ठानी वेद पुराना ॥३॥
वेदहुकेर कहानहिंकरई । जरतै रहै सुस्त नहिं परई ॥ ४ ॥
साखी ॥ गुणातीतके गांवते, आपुहिं गये गमाय ॥
माटीतन माटीमिल्यो, पवनहि पवन समाय ॥ ५ ॥
धर्मकथाजो कहतैरहई । लवरीनितउठि प्रातैकहई ॥ १ ॥
धर्म की कथा जो कहतई रहैं कि स्त्री आपने पतिही को जानै और
दूसरेंको पतिकारि न जानै परन्तु धर्म कछूजानै नहीं हैं धर्म कहां है कि जीव यह
साहबकी शक्तिहै याके पति साहब हैं तामें प्रमाण॥ “अपरेयमितस्त्वन्यांप्रकृतिं-
विद्धिमेंपराम् । जीवभूतांमहाबाहो ययेदंधार्य्यतेजगत्”॥इतिगीतायाम्॥ “वासुदे-
वःप्रमाणैकःक्ष्मायमिदंजगत”॥दूसर कबीरजीका प्रमाण॥ “दुलहिनगावौमंगल-
चार । हमरेघरआयेरामभतार ॥ तनरतिकारि मैं मनरतिकरिहौं पांचौतत्वबराती ।
रामदेवमोहिंव्याहनऐहैं मैयौवनमदमाती ॥ सरिरसरोवरवेदीकरिहौं ब्रह्मावेदउचा-
रा । रामदेवसँगभांवरिलेहौं धनिधनिभागहमारा ॥ सुरतेंतीसौकौतुकआयेमुनिवर-
सहसअठाशी । कहैकबीरहमब्याहिचलेहैं पुरुषएकअबिनाशी” ॥ तेसाहबको या
जीव नहीं जानै हैं औरऔरमें लगे है बड़े प्रातःकाल उठिकै लवरी कहै है कि
हमहीं राम हैं दूसरो नहीं है अथवा जीव जन्म लेइहै सो प्रातःकाल है नव

रमैनी। (१४७)
गर्भ में रह्यो तब साहब ते कह्योहै कि तुम मोको गर्भते छुड़ायो मैं तिहारोभ-
जन करौंगो औ जब गर्भते निकस्यो जन्मलियो तब वहबात लवरी कै डार्यो मैं
कहा कह्यो है साहब को भजन न कियो कहा करन लग्यो ॥ १ ॥
लवरिविहानेलवरीसाँझा । यकलावरिविसहदयामाँझा ॥२॥
रामहुंकर मर्मनाहिं जाना । लै मतिठानी वेद पुराना ॥३॥
सो यहितरह ते लवरी बिहाने कहैहै औ साँझके लवरीकहैहै कहे आपन औ
गुरुके औ देवताके ऐक्यता मानै है काहेते तीनि कहैं हैं कि, एक लवरी जो है
मायासो हृदयमें बसैहै सोई सब लवरी कहावै है॥२॥ सो भला ब्रह्म को मर्म न
जानै तौ न जानै काहेते कि वहतो धोखा है सो कछू वस्तु होइ तौ जानै परन्तु
सांच औ सर्वत्र पूर्ण औ सबते श्रेष्ठ ऐसे जे श्रीरामचन्द्र हैं तिनको जो या मर्म
है कि, जो कोई मेरे सन्मुख होइ ताको मैं छुड़ाइ लेउँ या जीव न जानतभये
साहब छुड़ाइ लेइहै तामें प्रमाण ॥ “अबही लेउँ छुड़ाय कालते जो घट सुरति
सम्हारो”॥ याहीहेतु सुरति दियो है मतिलैकै कहेग्रहण करिकै वेदपुराणके अर्थ
ठानै है कहे अपने सिद्धांतमें लगायदेइ है ॥ ३ ॥
वेदहु केर कहानाहिं करई । जरतैरहै सुस्त नहिं परई ॥४॥
सिद्धांततौ एकैहोइहै साहबकोसिद्धांत जो तात्पर्यवृत्तिकरिकै यह कहैहै सो
भला न जानै मुक्ति न होइ परन्तु वेदमें जो सुकर्म लिखे हैं सो करिकै नरकतें
तौ बचै सो वेदहू की कही जो विधि निषेधहै सोऊ नहीं करैहै ऐसो मूढ़ यह
जीव शोकरूपी अग्निमें जरतै रहैहै सुस्त नहीं परै है सुचित्त नहीं होय है अर्थात्
इहां कुछ छोड़्यो उहां धोखाजोब्रह्महै तहांकुछ न समझ्यो औईश्वर जे हैं तिनहूं
को काहू न मान्यो औ सबके रखवार दयालु जे श्रीरामचन्द्रहैं तिनहूं छोड़्यो
तेहिते मूर्ख उंटके पाद है गयो न जमीनको न आसमान को वाको कौन
बचावै। जो कहो आत्माको चीन्हिकै बचिजाय तौ जो आत्मामें एती शक्तिहोती
तौ बंधनमें न परतो आपही बचिजातो ताते सबके रखवार जे साहबहैं तिनहींके
बचाये बचैहै ॥ ४ ॥

( १४८ ) बीजक कबीरदास ।
साखी ॥ गुणातीतके गावते, आपुहि गये गमाय ॥
माटीतन माटीमिल्यो, पवनहि पवन समाय ॥ ५ ॥
गुणातीत जो साहबको लोक ताकेगावते कहे प्रकाशतेजहांसमष्टि जीवरहै है
तहां आपुही रामनाम को साहबमुख अर्थ गमाय कै संसारमुख अर्थ
करि संसारी द्वैगयो शरीर धारणकियो पुनि माटीमें माटी मिलिगयो औ
पंवनमें पवनं मिलिगयो अर्थात् ते पुनि जैसेके तैसे ह्र गये औ जो गुणा-
तीतके गावते यह पाठ होइ तौ यह अर्थ है गुणातीत जो है धोखा ब्रह्म
ताको गावत गावत साहब को गंवाइ जातभये ॥ ५ ॥
इति ईकसठवीं रमैनी समाप्त ।
अथ बासठवीं रमैनी ।
चौपाई ।
जोतोहिं कर्त्तावर्णविचारा । जन्मत तीनिदण्ड अनुसारा १
जन्मत शूद्रभये पुनि शूद्रा । कृत्रिमजनेउ घालिजगधुंद्रा२
जोतुमब्राह्मणब्राह्मणीजाये । और राह तुम काहेन आये ३
जो तू तुरुक तुरुकनी जाया । पेटैकाहेन सुनतिकराया ४
कारी पीरी दूहाँ गाई । ताकर दूध देहु बिलगाई ५
छाडुकपटनलअधिकसयानी। कहकबीर भजुशारँगपानी ६
जोतोहिंकर्त्तावर्णबिचारा । जन्मततीनिदंडअनुसारा ॥१॥
जेतोको ब्रह्मा वर्णको बिचारकियो कि ये ब्राह्मणहैं क्षत्रीहैं बैश्य हैं शूद्रहैं
मुसल्मानहैं सो एतो शरीर के धर्महैं तीनिदण्ड जे हैं संचित क्रियमान प्रारब्ध
तिनके कर्मके अनुसारते जन्मनकहे जन्मलेइ हैं ॥ १ ॥

रमैनी। ( १४९ )
जन्मतशूद्रभयेपुनिशूद्रा। कृत्रिमजनेउघालिजगधुंद्रा ॥२॥
जोतुमब्राह्मणब्राह्मणीजाये। औरराहतुमकाहेनआये ॥३॥
जब प्रथम तेरो जन्म होइहै तबतैं शूद्रई रहै है काहेतें कि संस्कार कुल-
नहीं रहैहै औ जब मरैहै तब अशुद्धई रहैहै शिखा जनेऊ दूनो आगीमें
जरिजाइहैं तबहूं शूद्रै ह्वैजाइहै सो कृत्रिम जनेऊ पहिरिकै तैं जगतमें दन्द
मचाइ दियेहै कि हम ब्राह्मण हैं ये क्षत्री हैं ये वैश्यहैं ये शूद्रहैं ॥ २ ॥
जोकहौ हम जन्म करिकै ब्राह्मण हैं ब्राह्मणीते उत्पन्न हैं और राह ह्वै काहे
आये ब्रह्मांड फोरिकै आवते आंखी के राहह्वै आवते अशुद्ध राहह्वै काहे आये
अर्थात् न ब्राह्मणी अपनी शक्तिते उत्पन्न करिसकै औ न तैं अपनी शक्ति ते
आइसकै कर्महीते ब्राह्मणी उत्पन्न करै है कर्मही ते तैं आवै है तेहिते जन्म ते
तौ शूद्रहै संस्कारते द्विजभये वेद अभ्यास कियो तब विप्रभये औ जब ब्रह्मकों
जानैगो तब ब्राह्मण कहावैगो ताते कर्महीते ब्राह्मणत्व तोमें आवै है अहं-
ब्रह्म तो धोखही है परब्रह्म जे श्रीरामचन्द्र हैं तिनहूं को तैं न जान्यो सो तैं
ब्राह्मणकैसे होइगो जबतैं साहबको जानैगो तबहीं ब्राह्मणहोइगो ॥ ३ ॥
जोतूतुरुकतुरुकिनीजाया। पेटैकाहेनसुनतिकराया ॥४॥
कारी पीरी दूहौ गाई। ताकर दूध देहु बिलगाई ॥५॥
औ जो तू कहैहै कि हम तुरुकिनी ते उत्पन्नहैं तौ पेटै काहे न सुनति
करायो तेहिते तुरुकिनी के पेटते भयेते मुसल्मान नहीं है ॥ ४ ॥ कारीपीरी
गाइको दूध मिलाइकै कोई बिलगावै तौ काबिलग होइहै ऐसे आत्मा तौ एक-
ही जातिहै हिन्दू तुरुक नहीं ह्वै सकै है ॥ ५ ॥
छांडुकपटनरअधिकसयानी।कहकबीरभजुशारँगपानी६॥
अपनी सयानी अधिककरिकैजोकपट करिराख्यो है सोछोड़ि दे विचारिकै
देखु तैंतो आत्मा न हिंदू है न तुरुकहै तैं जाको अंश है ऐसे शारँगपाणि जे
साहबहैं ताको भजु ताकी सेवा करु शारँगपाणी जो कह्यो ताको यह हेतुहै कि
धनुषबाण लिये तेरी रक्षा करिबेको तैयार हैं और तू और औरैमें लगाहै। जो

( १५० ) बीजक कबीरदास ।
साहबमें लगेहै सोई सबते श्रेष्ठ होयहैं तामें प्रमाण॥(विप्राद्विषड्गुणयुतादरविंद
नाभादारविंदविमुखाच्छ्वपचंवरिष्ठम् । मन्येतदार्पितमनोवचनेहितार्थम्प्राणं पु-
नातिसुकुलंनतुभूरिमानः ) ॥ १ इतिभागवते ॥ ६ ॥
इति बासठवीं रमैनी समाप्त ।
अथ तिरसठवीं रमैनी ।
चौपाई ।
नाना रूप वर्ण यककीन्हा । चारि वर्ण उनकाहु न चीन्हा ॥१॥
नष्टगये करता नहिं चीन्हा। नष्टगये औरहि मन दीन्हा॥२॥
नष्टगये जिन वेद वखाना । वेद पढ़ा पै भेद न जाना ॥ ३ ॥
विमलषकैरैनर नहिंसूझा।भो अयानतवकछुवनबूझा॥४॥
साखी ॥ नाना नाच नचाइकैक, नाचै नटके वेष ॥
घट घट अविनाशी वसै, सुनहु तकी तुम शेष ॥५॥
वर्ण धर्मखंडन करि आये अब सब वर्णको एक मानि जे साहबको भूलैहैं तिनको
खंडनकरैं हैं ! नानारूप जे जीवहैं तिनको एक वर्ण कहे एक रंग करि देत भयो
अहं ब्रह्मास्मि करिकै सब मानत भयो कि हमहीं सब हैं दूसरे नहीं है चारिउवर्ण
वहीको वर्णन करतभये यह न जानतभये कि यह धोखा ब्रह्मको खाई लेइहै॥ १॥
फिरिफिरि सब जीव नष्ट ह्वैगये कहे मरि गये उद्धारकर्त्ता जो साहबहै ताको न
चीन्हतभये औ औरहि जो धोखा ब्रह्महै तौनेमें मन दैके नष्टह्वैगये अर्थात् लीन
ह्वैगये साहबकोतो जाने नहीं फिर संसारी भये॥२॥जै वेदको बखानिकै पढ़िप-
ढ़िकै औरनको अर्थ सुनावै हैं तेवेदपढ़्यो परंतु भेद न जान्यो कहे वेद को
तात्पर्य जे साहब हैं तिनको न जान्यो तेहिते नष्ट ह्वैगये सब वेदको भेद साह-
बहै तामें प्रमाण ॥ (सर्वेवेदायत्पदमामनन्ति) ॥ ३ ॥ बिमलष जो साहब मन
बचनके परे ताको खंकहे आकाशवत् शून्य ज्ञान करै है कि, वह नहीं हैं
आकाशवत् ब्रह्मही पूर्ण है सो उनके ज्ञान नेत्र तौ हई नहीं हैं साहब कैसे सूझि

रमैनी । ( १५१ )
परै जब न सूझि पर्यो तब अज्ञान द्वैगये नेतिनेति कहनलगे कि, अकथ है
कबीरजीका प्रमाण ॥ "वेदविचारि भेद जो जानै। सतगुरु मर्मशब्द पहिचानै"
॥ ४ ॥ गुरुवा लोग कहैं कि, वही जोहै अविनाशी सो सबके घटघट में
सबको नाच नचावै है औनटके वेष आपो नाचै है । सो कबीरजी शेखतकीसों
कहैं हैं कि, हे शेखतकी ! जो सबको नाचनचावैगो आपनटके वेष नाचैगो सो
अविनाशीकैसेहोइगो काहेते कि नटएक वेषलैआयोपुनि वह वेष छोड़िके और
वेष लैआयो याही भांति नानावेष नट धारणकरै हैं ते सब अनित्यहैं नाना वेष
धरिबो तौ मायाके गुणहैं वह मायाके परे कैसे होइगो औ जब मायाते परै
न होइगो तौ अविनाशी कैसे होइगो सो हे शेखतकी तुम सुनो वाहूबिचार करत
करत जो शेष रहिजायहै सो तुमहौ बातो तुम्हारहो अनुभवहै अथवा तुम शेषहौ
सो कार निराकार के परे जो साहब है ताको तुम शेष हौ कहै अंशहौ ॥ ५ ॥
इति तिरसठवीं रमैनी समाप्त ।
अथ चौंसठवीं रमैनी ।
चौपाई ।
काया कंचन यतन कराया।बहुत भांतिकै मन पलटाया॥१॥
जो सौवार कहौ समुझाई । तहिबो धराछोड़ि नहिंजाई ॥२॥
जनकेकहे जो जन रहिजाई।नवो निधि सिद्धी तिनपाई॥३॥
सदाधर्म तेहि हृदयाबसई । राम कसौटी कसते रहई ॥४॥
जोरि कसावै अंतै जाई । तौ बाउर आपुहि बौराई ॥ ५ ॥
साखी ॥ ताते परी कालकी फांसी, करहु आपनो शोच ॥
जहां संत तहँ संत सिधावै,मिलि रहे पोचै पोच ॥६॥
कबीरजी कहैहैं कि ईजीवनके कायाको हम बहुत यतनकरवाया औ बहुत भांति
ते मन पलटाया कि तू धोखा कों त्यागि कंचन आपने स्वरूपको जानै॥ १ ?

( १५२ ) बीजक कबीरदास ।
याबात यद्यपि मैं सौबारसमुझाऊं हौं ताहूपै ऐसो धोखाको धरचो कि छोड़ि
नहींजाय सो जे जन गुरुवाजनके कहेराहिजायहैं धोखाकोनहीं त्यागै हैं ॥ २ ॥
तेनवोनिद्धि पावै हैं औ निर्गुण सगुणके परेमैं जोबातकहौं ताकोकहाँ बूझैं ॥३॥
जेमेरोकह्यो बूझैंहैं कि हमसाहबकेहैं याधर्मजिनके हृदयमें बसैहै तेसाहबके रूप-
कसौटी में आपनो कंचन स्वस्वरूप कसतई रहैं औ जेसाहब नहींकसैहैं
गुरुवालोगनके कसावैनाईहैं तेवेबाउरऊ निराकार ब्रह्म तांमें आपही बौरायजाय
हैं जो औरको औरकहै सो बाउर है ॥ ४ ॥ ५ ॥ सो हे जीवो ! तुम साहब
के होइकै धोखा में लगे ताहीते कालकी फांसीमें परेहौ सो आपने छूटिबे को
सोच करौ देखो तो जहां संत रामोपासकहैं तहें संतजाइहैं आपनोस्वरूपजानि
छूटिजाइहैं जे गुरवालोगनको उपदेश लेइहैं ते जीव पोच पोच मिलिरहेहैं॥६॥
इति चौंसठवीं रमैनी समाप्त ।
अथपैंसठवीं रमैनी ।
चौपाई ।
अपने गुणके औगुण कहहू।यहैअभाग जोतुम न विचारहू १
तुमजियरा बहुतैदुखपाया । जलबनमीनकवनसुचुपाया २
चातृकजलहल भरेजोपासा।मेघ न वरसै चलैउदासा॥३॥
स्वांग धरचोभवसागर आसा।चातृकजलहलआशैपासा४
रामै नाम अहै निजसारू । औ सब झूठ सकल संसारू ५
किंचित है सपनेनिधिपाई । हियनमाहँ कहँ धरै छिपाई६॥
हरि उतंग तुमजातिपतङ्ग । यमघर कियो जीवको संगा७
हियनसमाय छोड़नहिंपारा ।झूठलोभ तैं कछु न विचारा८
स्मृति कहाआपु नहिंमाना । तरिवर छलछागर हैजाना ९
जियदुरमति डोलै संसारा । तेहि नहिं सूझैवारनपारा १०

रमैनी । ( १५३ )
साखी ॥ अंधभया सबडोलई, कोइ नाहिं करै विचार ॥
हरिकि भक्ति जाने बिना, भव बूडिमुआ संसार १ १
अपने गुणके औगुण कहहू। यहै अभाग जो तुन न विचारहू ॥१॥
तुम जियराव बहुतै दुख पाया। जल विन मीन कवन सचु पाया २॥
चातृक जलहलहल भरे जोपासा । मेघनबरसै चले उदासा ॥३॥
स्वांग धरयो भवसागर आसा। चातृक जल हल आशै पासा ४॥
स्वतःसिद्ध तुम साहबके दासहौ या जो आपनो गुण ताको अवगुण कहौहै। कि
हम ब्रह्महैं सो यां नहीं बिचारौहै। कि हम ब्रह्महैं कि दासहैं याही तुम्हारी अभा-
गहै दासभूतमेतमान ॥(दासभूताःस्वतःसर्वेह्यात्मानःपरमात्मनः)॥ परमात्ममें बहुत
दुःख पायो है जो छाया पाठ होय तौ बहुत दुखमें आयो सो जब बिना कौनौ
सचु पायेहौ? नहीं पायो। ऐसे बिना साहबके जाने सचु न पावोगे?॥१॥२॥ जैसे जब
मेघ स्वातीको जल नहीं बरषैहै तब चातृक उदासै रहैहै कहै पियासै रहैहै जो नजीक
समुद्रौ भरोहोय तौ कहा होइ ऐसे स्वामी मेघसम रामोपासक पूरा गुरु तुमनहीं
पायो जो साहबको बताइदेइ ताते तुम उदासई गयो और और में लगावन वारे
गुरुवालोग जो उपदेशऊ कियो पै जनन मरण न छूट्यो ॥ ३ ॥ भवसागर ते
पारहोबे की आशाकरि स्वांगजो धोखा ब्रह्म तौनेको तुम धरचो कि अहं ब्रह्मास्मि
मानिसंसारते छूटिजाइँगे सो तुम्हारी आशा चातृककी भई कि स्वातीतौ पायो
नहीं जो बहुत जलहै पै बिना स्वाती चातृककी आशा फांसही हैगई अथवा स्वांग
धोखा ब्रह्म को जो तुमधरयो है सो साहबकी आशा कहै दिशानहीं है भवसागर-
हीकी आशाकहे दिशा है ॥ ४ ॥
रामैनाम अहै निजसारू । औसब झूठ सकल संसारू ॥ ५॥
किंचितहै सपने निधि पाई। हियनमाहँ कहँ धरै छिपाई ॥ ६ ॥
हरि उतंग तुम जानि पतंगा । यमघर कियो जीवको संगा॥७॥
हियन समाय छोड़ नहिं पारा। झूठ लोभ तैं कछु न विचारा॥ ८ ॥

( १६४ ) बीजक कबीरदास ।
स्मृतिकहा आपनहिंमाना। तरिवरछलछागरह्वैजाना ॥ ९ ॥
जियदुरमतिडोलैसंसारा । तेहिनहिंसूझै वारनपारा ॥ १० ॥
हे जीवो ! तुम यह बिचारत जाउ कि निज कहे आपनो सार रामै नाम
को साहब मुख अर्थ समझिकै संसार ते छूटोगे अर्थात् साहब को स्वरूप औ
तुम्हारो स्वरूप राम नामही में है औ सब कहे ब्रह्मई है यह जो मानि राख्यो
है सो धोखा है झूठा है औ मायिक जो सकल संसार है सो झूठा है अथवा
सकल संसार में और जे मत हैं ते सब झूठे हैं ॥ ५ ॥ अहं ब्रह्मास्मि ज्ञान करै है
सो सपने कैसी है अर्थात् झूठी है तैंतो किंचित् कहे अणुहै वा बिभु है झूठलों-
भंत कछु न विचारा तुम्हारे हिये में ब्रह्म नहीं समाय है कहे तुम्हारो ब्रह्म
होइबो नहीं संभवित होइ है याको छोड़िदेव औ वाको पार नहीं है कहैं
लवरी और न होय है याते झूठ लोभकिये है कि, मैं ब्रह्महोइ जाउँगो सो कछु
न विचारा काहेते अच्छा विचारनहीं किये है अथवा कछु न विचारा कहै
वा विचार कछु नहीं है मिथ्या है ॥ ६ ॥ ७ ॥ ८ ॥ जौन स्मृति बतावैहै ॥ (स्याज्जीव-
नेच्छाद्यदितेस्वसत्तायांस्पृहायदि । आत्मदास्यंहरेःस्वाम्यंस्वभावंचसदास्मर॥१॥)
सो तुम स्मृतिको कहा आप कहे आपनो स्वस्वरूप न मान्यो धोखाब्रह्ममें लगिकै
अपने को ब्रह्ममानिकै तरिवर जोहै संसार ताको छल जो है धोखा ब्रह्मसोइ है
छागकहे बकरा ताही ह्वैकै कहे वह ब्रह्मह्वैकै तुमजान्यो कि हम चरिलेइँ
अर्थात संसारते छूटिजाइँ सो एतो बड़ो संसार रूपी वृक्ष कहा धोखाब्रह्म
बकरा चरोचरिजाइ है ॥ ९ ॥ जौन जीमें दुर्मति करिकै संसारमें डोलौहौ कहे
फिरौहौ सो अहं ब्रह्म माने संसारको वारापार न पावोगे वहतो धोखा है॥ १०॥
साखी ॥ अंधभयासबडोलई, कोइनकरैविचार ॥
हरिकिभक्तिजानेविना, भवबूडिमुआसंसार॥ ११॥
श्रीकबीरजी कहै हैं कि मैं येतोसमुझाऊं हौं परंतु सबसंसार की आंखि फूटि-
गई हैं अंधभया सबडोलैहै कहे फिरैहै यह विचार कोई नहीं करै है भक्तनको
संसार दुःखहरै सो हरि जेहैं सबकेरक्षक परमपुरुष श्रीरामचन्द्र तिनकी अनु-
रागात्मिका भक्ति बिना जाने भव जोहै धोखाब्रह्म तौनैहै भ्रमको समुद्र
ताहीमें संसार बूडिमुआ कहे संसारी जीव बूडिमुये ॥ ११ ॥
इति पैंसठवीं रमैनी समाप्त ।

रमैनी। ( १५५ )
अथ छयासठवीं रमना।
चौपाई।
सोई हितू बंधु मोहिं भावै। जात कुमारग मारग लावै ॥१॥
सो सयान मारग रहिजाई। करै खोज कबहूं न भुलाई॥२॥
सो झूठा जो सुतकै तजई। गुरुकी दया रामको भजई॥ ३ ॥
किंचितहैयाहिजगतभुलाना। धनसुतदेखिभयाअभिमाना ४
साखी ॥ जिय जो नेक पयान किये, मंदिर भया उजार ॥
मरे जे जियते मरिगये, बाँचे वाँचन हार ॥ ॥५॥
सोई हितु वा बंधु मोको भावैहै जो कुमारगमें जात जे जीव हैं तिनको सुमा-
रगमें लैआवै कहे साहबको बतावै अथवा कुमारग में जात जो जीवहैं ताको साह-
बके सुमार्गमें लगावै॥१॥अरुसो ई जीव सयानहै जो सुमार्गमें आयकै रहिजायहै
कहे स्थिर ह्वैजाय है अरु और और मतनको खोज करिकै सबको सिद्धांत साहब
हीमें लगाइदेइ सो कवहूं न भुलाइ है ॥ २ ॥ ऐसो गुरुवा झूठा है जो सुतकै
कहैं, मूड़ मूड़िकै अपना चेला बनाइके तजिदेइ है साहब को नहीं बतावै है
औरे औरे देवनको सौंपिदेइ है औ जाकीदया ते अर्थात् जाकें उपदेशते यह
जीव श्रीरामचन्द्र को भजन करै है सोई सांचो गुरु है। भाव यह है कि बिना
परमपुरुष श्रीरामचन्द्रजी के जाने यह जीव को शोक नहीं छूटै है जे गुरु साह
बको बताइकै संसारते नहीं छुड़ावै हैं औरे औरे मतन में लगाइकै संसारमेंडा-
रिदेईहैं ते अज्ञान दूरि करनवारे नहीं हैं वे नरक देन वारे हैं औ आप नरक
जानवारे हैं तामें प्रमाण ॥ ( शिष धनहरै शोकनहिं हरई । सो गुरु घोरनरकमें
परई॥ औकबीरहूजी लिखि आये हैं ॥(छोड़िदेहु नरझेलिकझेला । बूड़ें दोउगु-
रुअरुचेला ॥ ) हे जीवतू तो अणु हैं एकजो ब्रह्म औजगद्रूप जो है माया तामें
भुलाइरह्यो है याही ते तैं जगत्में उत्पन्न भयो है आपने को मालिकमानिधन
सुतादिको तोको अभिमान होइ है ॥ ३ । ४ ॥ हे जीव जो नेकहुपयान ते किये

( १६६ ) बीजक कबीरदास ।
स्थूल शरीर मंदिर उजार होइजाई है सो बिना परमपुरुष श्रीरामचन्द्रके भजन जे
मरे जीवतौ मरिकै चौरासीलाख योनिमें भटकनेलगे औबाचे बाचनहार कहे जे
पांचौ शरीर ते बचिकै पार्षद रूप बाचन द्वार रहे ते बाचे ॥ ५ ॥
इति छयासठवीं रमैनी समाप्त ।
अथ सतसठवीं रमैनी ।
गुरुमुख चौपाई ।
देहहलाये भक्ति न होई । स्वांगधरेबहुते नर जोई ॥ १ ॥
धिंगाधिंगी भलो न माना।जोकाहू मोहिं हृदय न जाना २॥
मुखकछु औरहृदयकछु आना।सपन्यो कवहूं मोहिं नजाना ३
ते दुखपावैं यहि संसारा । जो चेतौ तौ होंहु निनारा ॥ ४ ॥
जो नर गुरुकी निन्दा करई । शूकर श्वानजन्मसो धरई ५
साखी॥लखचौरासीयोनिजीव, भटकि भटकि दुखपाव ॥
कह कबीर जो रामहिं जानै,जो मोहिं नीके भाव६
देहहलाये भक्ति न होई । स्वाँगधरे बहुतै नर जोई ॥ १ ॥
धिंगाधिंगीभलो न माना।जोकाहूमोहिंहृदय न जाना॥२॥
देह हलाये कहे पेट हलाय कुंडलिनी उठावै है औ स्वांगधरे कहे कोई खाख
लगावै है कोई जटा नहीं बढ़ावै है कोई टोपीदै अलफी पहिरि कुबरी लेइ है
कोईकोई तिलकैनहीं देय है कोई बेंडा तिलक देइ है कोई नाकते तिलक देइ
है कोई काठफल पाषाण अस्थि इत्यादि माला पहिरै है ऐसे स्वाँगधर नरनको
देखैहै सौबिना साहबके जाने भक्तिहोई है ? नहीं होइ है ॥१॥ धिंगाधिंगीकहे
बड़ेबड़े मालपुवा मोहनभोग खाय मोटायकै बडेबड़े धिंगा ह्वै रहे हैं औ बड़ी
बड़ी धिंगी ह्वैरही हैं भलो जो साँच मत ताको नहीं माने हैं साहब कहै
हैं जो कोई मोको हृदयते नहीं जानै है सो मोको पाव है ? नहा पावै है॥२॥

रमैनी । ( १५७ )
मुखकछु औरहृदयकछु आना।सपन्योकबहूंमोहिंनजाना॥ ३
तें दुखपावहिं यहिसंसार । जोचेतौतौहोहुनिनारा ॥ ४ ॥
जोनरगुरुकीनिन्दाकरई । शूकरइवानजन्मसोधरई ॥ ५ ॥
मुखमें तो और है कि, हम संन्यासी हैं हमसाधु हैं हमब्रह्मचारी हैं औ
हृदय में और है धनमिलैको उपाय खोजै हैं तेनर सपन्यो कबहूं मोकोनहीं
जानिसकैं हैं ॥ ३ ॥ सोऐसे जे प्राणी हैं ते यहिसंसार में दुःख नानाप्रकारके
पावै हैं सो हेजीवो ! तुम चेतकरौ तो इनसे न्यारा हैजाउ ॥ ४ ॥ औ जे
तात्पर्य्य वृत्तिकारिकै मोको बतावैं हैं ऐसे जे गुरु हैं तिनकी जोकोई निन्दाकरै
हैं कि, जोई वर्णन करै हैं सो सब मिथ्या है ते मरिकै श्वान अरु शूकरको
जन्म धारण करै हैं ॥ ५ ॥
साखी॥ लखचौरासीयौनिजीव, भटकिभटकिदुखपावै ॥
कहकबीरजोगमहिं जानै, सोमोहिंनीकेभावै ॥ ६ ॥
साहब कहैं हैं कि मेरोभक्त कबीर कहैहै कि चौरासी लाख योनिमें जीव
यह भटकि भटकि दुःख पावैहै सो तिनमें जोकोई श्रीरामचन्द्रको जानै सोई
मोको भावै है। ऐसो प्रकट कबीरबतावै हैं ताहूको और औरमें अर्थकरि और
और लगै हैं सो मोको नहीं जानै हैं ॥ ६ ॥
इति सतसठसवीं रमैनी समाप्त।
अथ अड़सठवीं रमैनी ।
चौपाई।
तेहिवियोगते भये अनाथा।परिनिकुंजन पावनपाथा ॥ १॥
वेदौ नकलकहै जे जानै । जो समझै सो भलो न मानै॥२॥
जटवर वन्द खेल जो जानै।ताकर गुण जो ठाकुर मानै॥३॥
उहैजो खेलै सबघटमाहीं। दूसर को लेखा कछु नाहीं॥४॥
भलो पोच जो अवसर आवै । कैसहुकै जन पूरा पावै॥५॥

( १९८ ) बीजक कबीरदास ।
साखी ॥ जेकरे शरलागै हिये, तब सो जानैगा पीर ॥
लागतौ भागै नहीं, सुखसिंधु निहारु कबीर॥६॥
तेहिवियोगतेभये अनाथा । परिनिकुंजवनपावनपाथा॥१॥
वेदौनकल कहै जोजानै । जो समुझैसोभलो न मानै ॥२॥
संपूर्ण जे जीव हैं ते परमपुरुष जे श्रीरामचन्द्रहैं तिनहीं के वियोगते अनाथ
ह्वैगये। निकुंज बन जो बाणीको जालहै नाना मत जिनमें परिकै एक सिद्धान्त
मत परमपुरुष श्रीरामचन्द्रके मिलनके पाथ कहे पंथ न पावत भये ॥ १ ॥
जिनको पूर्व कहिआये कि साहब को नहीं जानै स्वांगभर बनावै हैं तिनको हे
जीवो! जो तैं जानै तौ वेदहू वे मतवारेन को नकलई कहै हैं तौ जो साहब को
समुझैहै सोऊ उनको नहीं मानै है नकलई मानै हैं ॥ २ ॥
नटवरवंद खेल जो जानै । ताकरगुण जो ठाकुरमानै॥३॥
उहैजो खेलैसवघटमाहीं । दूसरकोलेखा कछुनाहीं ॥४॥
भलोपोच जो अवसर आवै । कैसे कै जनपूरा पावै ॥५॥
अब योगिन को कहैहैं। नट कैसे बंटा जो कोई खेलै जानै है कहै यहजीव
आत्माको ब्रह्मांडमें चढ़ाइकैकै फिरिउतारै जानै है ताको गुण यहहै कि, समाधि
लगि जाइहै कहे ब्रह्मरूपह्वैजाइहै सो वही ब्रह्मको जो कोई ठाकुर मानैहै ॥ ३॥
अर्थात् जौनब्रह्ममें है ताउहौं तौने घटमें है दूसरेकी कछुनहीं लगै है अर्थात्
दुंसरो पदार्थ कछुनहीं है ॥ ४ ॥ सो जे यहमत करैहैं तिनको भलो पोचं-
कहे नीको नागा अवसर आवतहै अर्थात् जब जीवमें लीन है ब्रह्मरूप ह्वैजा-
इहै यातो भलो अवसर। औ जब समाधि उतरिगई जैसेकै तैसे ह्वैगई या पोच-
अवसरहै सो कैसे कै जन पूरो ज्ञान पावै कि हम पूर्णब्रह्महैं तो सर्वत्र पूर्ण
है जो या ब्रह्महै तातो तो समाधिउतरेहूमें वही वृत्ति बनी रहती ॥ ५ ॥
साखी ॥ जेकरे शरलागै हिये, तब सो जानैगा पीर ॥
लागतौ भागै नहीं, सुखसिंधु निहारु कबीर ॥६॥

रमैनी । (१५९)
जेकरे शरलागैहै सोई बाणलागे की पीर जानै सो जोः कोईसमाधि लगावै
है सोई समाधि उतरेको दुःख जानैहै सो समाधि तौ तोर लागैहै ना भागु
समाधिही लगाये रहु सो तेरो भागिबो तौ बनतई नहीं है समाधि उतरेही
आवैहै याते यह धोखा छोड़िदे कबीरजी कहै हैं सुखसिंधु जे साहबहैं तिनको
निहारु जिनको एकबार निहारे समाधि लगी रहैहै अर्थात् जो एकहूबार साह-
बके सम्मुख भयोहैः सो फिरिनहीं संसार में बच्योहै तामेंप्रमाण ॥ ( एकोपि
कृष्णस्यकृतः प्रणामो दशाश्वमेधावभृथेनतुल्यः ॥ दशाश्वमेधीपुनेरेतिजन्मकृष्ण-
प्रणामीनपुनर्भवाय ॥ इति ) अथवा जाके बाण लगै है सोई पीर जानै है सो
जो साहब में लागे हैं तेई धोखाकी पीर जानै हैं कि हमयोगमें यज्ञादिमें लगि
कै नाहक जन्म गँवाये।सो कबीर जी कहै हैं कि साहबको दुर्लभजानि तैं लागु
तौभागु न साहब सुखसिंधुहै तिनको तूनिहारु तौ ये सब धोखनकी पीर दूरि
करि देयँगे तब अपराध तेरो न गनैंगे । तामें प्रमाण॥"कथंचिदुपकारणकृतेनैके
नतुष्यति ॥ नसंमरत्यपकाराणांशतमप्यात्मवत्तया" इतिबाल्मीकीये ॥ ६ ॥
इति अड़सठवीं रमनी समाप्त।
अथ उनहत्तवीं रमैनी ।
चौपाई ।
ऐसा योग न देखा भाई । भूला फिरै लिये गफिलाई ॥१॥
महादेवको पंथ चलावै । ऐसो बड़ो महंत कहावै ॥ २ ॥
हाट वाट में लावै तारी । कञ्चे सिद्धन माया प्यारी ॥ ३ ॥
कबदत्तै मावासी तोरी । कव शुकदेव तोपची जोरी ॥४॥
कब नारदबंदूक चलाया। ब्यासदेव कब बंब बजाया ॥५॥
करहिं लड़ाई मतिकेमंदा।ईहैं अतिथि किं तरकशबंदा॥६॥
भयेविरक्त लोभमनठाना। सोना पहिरि लजावै बाना ॥७॥
घोरा घोरी कीन्ह बटोरा । गांवपाय यश चलो करोरा ८॥

( १६० ) बीजक कबीरदास ।
साखी ॥ तियसुन्दरी न सोहई, सनकादिक के साथ॥
कवहुंक दाग लगावई, कारी हांडी हाथ ॥ ९ ॥
ऐसा योग न देखाभाई । भूला फिरै लिये गफिलाई ॥१॥
महादेव को पंथ चलावै। ऐसो बड़ो महंत कहावै ॥ २ ॥
हाटबाट में लावै तारी। कच्चे सिद्धन माया प्यारी ॥ ३ ॥
कव दत्तै मावासी तोरी। कव शुकदेव तोपचीजोरी ॥ ४ ॥
श्रीकबीर जी कहैहैं कि ऐसा योग हम नहीं देख्यो है कि साहबको तो
जानै नहीं हैं गाफिल ह्वैकै भूले भूले फिरै हैं ॥ १ ॥ अरु महादेव को पंथजो
तामस शाखहै सो चलावै हैं औ बड़े महंत कहावै हैं ॥ २ ॥ सबके देखावन
को हाट में औ पहारन के बाट में तारी लगायकै बैठै हैं औ सिद्धकहावै
हैं औ सबके देखावन को यह कहैं हैं कि संन्यासीको धर्मनहीं है कि
द्रव्यलेय औ हाथछुवै परंतु जो कोई चढ़ाइक चलौ जाइहै ताको चिमटाते
लैकै कमंडलुमें डारिलेइ हैं सो ऐसे कच्चे सिद्धन को माया बहुत प्यारी
लगैहैं ॥ ३ ॥ दत्तात्रेय कबै मवासिनको शत्रुन को तौरचोहे औ शुकदेव कबै
तोपखाना अपने साथ जोरिकै चलायो है ॥ ४ ॥
कब नारद बंदूक चलाया । ब्यासदेवकवंबंबबजाया ॥५॥
करहिंलराई मतिकेमंदा । ईहैंअतिथिकितरकसबंदा ॥६॥
भये विरक्त लोभ मनठाना। सोनापहिरि लजावैबाना ॥७॥
घोराघोरी कीन्ह बटोरा । गाँवपायशचलो करोरा ॥८॥
औ नारद मुनि कबै बंदूक चलायो है औ ब्यासदेव कबै नगारादैकै काहूकें
ऊपर चढ़ेहैं ॥ ५ ॥ ई संन्यासी बैरागी मतिके मंद लड़ाई करै हैं ई
अतिथि हैंकि, तरकस बन्दसावंतहैं?॥६॥ भये तौ बिरक्त संन्यासी परंतु लोभ

रमैनी। ( १६१ )
कारिकै रोजगार करै हैं सोना पहिरि कै बानाको लजावै हैं ॥ ७ ॥ औ
घोरा घोरी हाथी बहुत आपने संगलेत भये औ काहू राजाते गांव पायो करोर-
पती है या यश चलायो बड़े ज्ञानीहैं बड़े भक्तहैं या यश चलायो ॥ ८ ॥
साखी ॥ तियसुन्दरी न सोहई,सनकादिक के साथ ॥
कवहूंक दाग लगावई, कारी हांडी हाथ ॥ ९ ॥
लाव लश्कर में स्त्री साथ रहतई है सनकादिक जटाधारे वैष्णवनको कहैहैं
अथवा सनकादिक कहे जिनकी पांच वर्षकी अवस्था बनीरहैहै ऐसेब्रह्माकेपुत्र
तिनहूको या मजाहोयतोकबीर जी कहै हैं कि संन्यासिनके साथमें सुन्दरीका सों-
हहै ? नहीं सोहैहै कबहूं दाग लगावतईहै जैसे कारी हांडी हाथमें लेइँ तो दाग
लागिही जायहै ऐसे जिनके जिनके संगमें स्त्रीरहैहै ते पाखंडिनको दाग लगतै है
स्त्रीनते नहीं बचैहैं। नामके तोसंन्यासी बैरागीहैं अखाड़ा गृहस्थी बांधेहैं तहां स्त्री
आवई चाहैं सो दाग लगावई चाहैं अथवा ऐसे पाखंडीहैं ते माया रूपई ह्वैरहेहैं तेई
मायारूपी सुन्दरी कहे स्त्रीहैं तिनको संग न करै औ जो संग करै तौ दाग लगवई
करै सो जीव ते पाखंडिनको संग न करै तामेंप्रमाण ॥(पुंसांजटाधरणमोजवतां
वृथैव मेधाविनामखिलशौचनिराकृतानाम् । तोयप्रदानपितृपिण्डबहिःकृतानां संभा-
षणादपिनराःनरकंप्रयांति ) ॥ इतिविष्णुपुराणे ॥ ९ ॥
इति उनहत्तरवीं रमैनी समाप्त ।
अथ सत्तरवीं रमैनी ।
चौपाई ।
बोलनाकासों बोलियेभाई । बोलतही सबतत्त्वनशाई॥१॥
बोलतबोलत बाढु विकार। सोबोलिय जोपरैबिचारा॥२॥
मिलैजोसंतबचनदुइकहिये । मिलैअसंत मौनह्वै रहिये॥३॥
पंडितसों बोलियहितकारी । मूरखसों रहिये झखमारी॥४॥
कह कबीर ई अधघट बोलै । पूरा होय विचार लैबोलै॥५॥
११

( १६२ ) बीजक कबीरदास ।
बोलाना कासोंबोलियेभाई । बोलतही सवतत्त्वनशाई॥१॥
बोलतबोलतवाढु विकारा सोवोलियो जो परैविचारा ॥ २ ॥
बैरागिनकी संन्यासिनकी दशा जैसी हैरही है सो पूर्बकहिआये सो ऐसे
पाखंडी संसारमें है रहेहैं बोलानाकासों बोलिये बोलतहीमें सब तत्त्व नशाइ
जाइहै। तत्त्वकहावैहै यथार्थ सो साहब के जे नामरूप लीला धाम यथार्थ हैं ते नशाइ
जाइहै कहे भूलिजाइहैं ॥ १॥ बोलत बोलत बिकारई बाढ़ैहै ताते सो बात बोलि-
ये जेहिते साहब के नामादिकन को बिचार ठीक परिजाइ कौनी तरहते सांच
बिचार ठीक परै सो कहै हैं ॥ २ ॥
मिलैजोसंतवचनदुइकहिये । मिलैअसंतमौनह्वैरहिये ॥३॥
पण्डितसोंबोलियहितकारी । मूरखसोंरहियेझखमारी॥४॥
जो संत मिलैतो द्वैबचन कहबऊ करिये द्वैबचन कह्योताको भाव यहहै कि
थोरई अपने मयोजन मात्र बोलिये औ सत्संग करिये काहेते कि उनके सत्संग
किये बिचार बाढ़ैहै औ असंत मिलै तो मौन ह्वै रहिये बोलिये न काहेते कि
उनके संगते अज्ञान बाढ़ै है ॥ ३ ॥ तेहिते पंडितसों बोलिबो हितकारीहै काहेते
कि पंडित जेहैं ते सारासारको विचार करिकै सार पदार्थ जे साहब तिनको
ठीक करिकै असार जोहै धोखा ब्रह्म औ माया ताको छोड़ि दियोहै वे साहबको
बतावेंगे औ मूरख सों बोलिबो झकमारीहै काहेते कि जो मूरख सों बोलै तौ
अपने स्मरणकी हानिहोइ है वह तो समझायेते समझैगो नहीं तबआपही झक-
मारि कै रहिजाइगो पीछे क्रोध होइगो अरु मूरख नहीं समझैहै तामेंप्रमाण
गोसांई जीको॥ सोरठा ॥ “फूलैनफूलैबेत, यदपिसुधाबरषैजलद॥ मूरखहृदयन-
चेत, जोगुरुमिलैंबिरंचिसम” ॥ १ ॥ पानीकोपान भीजै तो बेधैं नहीं । त्यों मूर-
खको ज्ञान बूझावै तौ सूझैनहीं ॥ ४ ॥
कहकबीरई अधवट डोलै । पूराहोय विचार लैबोलै ॥ ५ ॥
श्रीकबीरजी कहैंहैं कि जे सत्संगऊ करैं हैं औ मूरखहू सों बोलै हैं शास्त्रार्थ
करै हैं औ और और मतको सिद्धांतको जानो चाहैंहैं कि हमारे मत ठीकहै कि
औरऊमतठीकहै परमपुरुष श्रीरामचन्द्र सबते परे हैं यह सिद्धांतको निश्चय नहीं है

ते अधवटजेहैं और और मतवारे इनकेसमुझाये नहीं समुझैं हैं। औ असंत संगकरिकै
विचारकी हानिहोइहै। कहाहानिहोइहै? कि औरऊको विचारमन पर न लागै है अपने
मतमें भ्रमहोन लगैहै आपनो ठीकनहीं वह ठीकहै जैसे आधी गगरी जलसे भरीहोइ
तो वाकोजल डोलैहै ऐसे साहबमें उनको ज्ञानतो पूरो नहीं ताते डोलैहै औ जो
पूरा सो बीचैलैकै बोलैहै और प्रश्न सुनिकै वाकोविचार लैलियो कहे समझि
लियो कि यह बोलिबो अधिकारी है हमारो कह्यो समुझैगो तब बोलैहै जैसे
भरी गगरी को जल नहीं डोलै है और जल वामें नहीं समाय है ऐसे वे तों
साहबके ज्ञान म पूर हैं सो उनको ज्ञान डोलै नहीं है अरु और मतनको सिद्धांतके
जे ज्ञान हैं ते उनके अंतःकरणमें नहीं समायहैं ॥ ५ ॥
इतिसत्तरवींरमैनी समाप्त ।
अथ इकहत्तरवीं रमैनी ।
चौपाई ।
सोग वधावासम करिमाना । ताकी बातइन्द्रनहिंजाना ॥ १॥
जटातोरि पहिरावै सेली। योग युक्तिकै गर्भ दुहेली ॥ २ ॥
आसनउड़ाये कौन बड़ाई । जैसे काग चील्ह मड़राई ॥ ३ ॥
जैसी भिस्त तैसि है नारी । राजपाट सब गनै उजारी ॥ ४॥
जैसे नरक तसचंदन माना। जसबाउर तसरहैसयाना ॥ ५॥
लपसी लौंग गनै यकसारा । खांड़ै परिहरि फांकै छारा ॥ ६॥
साखी ॥ यह विचार ते बहि गयो, गयो बुद्धि बल चित्त ॥
दुइ मिलि एकै है रह्यो, काहि बताऊ हित्त ॥ ७ ॥
सोगबधावा समकरिमाना । ताकीबात इंद्रनहिंजाना ॥ १॥
जटातोरि पहिरावै सेली । योगयुक्तिकै गर्भ दुहेली ॥ २ ॥