कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १४४ ) बीजक कबीरदास ।
साखी ॥ पाहन ह्वै ह्व सबचले, अनभितियन को चित्त ॥
जासा कियो मिताइया, सो धनभे अनहित्त॥४॥
चढ़तचढ़ावतभड़हरफोरी । मननहिंजानैंकोकरिचोरी॥१॥
चोर एकमूसलसंसारा । बिरला जनकोइजाननहारा ॥२॥
स्वर्ग पातालभूमिलैवारी । एकैराम सकल रखवारी॥ ३ ॥
गुरुवालोग आप प्राण चढ़ावै हैं अरु औरको सिखैसिखै प्राण चढ़वावै हैं
सोयही प्राण चढ़त चढ़त भड़हर जो ब्रह्म ताको फोरि कै वही धोखा ब्रह्ममें
लीनभये मनते । या नहीं जानै हैं कि साहब के ज्ञानकी चोरी को करैहै वही
धोखा ब्रह्मही तो करैहै यही नहीं जानै हैं वाहीमें लगे हैं॥१॥ सो चोर एक जो
धोखाब्रह्महै सोसंसारभरको मूसिलियो अर्थात् ब्रह्मही के ज्ञानको सबदौरे हैं
परमपुरुष को नहीं दौरे हैं तेहिते कोई बिरलाजन परमपुरुष जे श्रीरामचन्द्र हैं
तिनको जानैहै॥२॥ जे श्रीरामचन्द्र एक स्वर्ग पाताल भूमि को बारीकेसम रख-
वारी कहे रक्षा करै हैं इहां एकैराम रखवारहै यह जो कह्यो ताते बाँधनवारै
धोखा देनवारे बहुतहैं पै बंधनते छोड़ावन वारे एक श्रीरामचन्द्रई हैं दूसरों
नहीं है स्वर्गतेऊपरके भूमिते मध्यके पातालते नीचेके लोक सबआये ॥ ३ ॥
साखी ॥ पाहनह्वैह्वै सबचले, अनभितियन को चित्त ॥
जासों कियो मिताइया, सो धनभे अनहित्त॥४॥
अनभितियाको चित्तजो धोखाब्रह्महै तौनेमें लगिकै संपूर्ण जे जीवहैं ते
पाहन ह्वैगये कहेजड़वत् ह्वैगये वे धनते छोड़ावनवारे श्रीरामचन्द्रको न जानत-
भये जौन ब्रह्मते सबजीव मिताई कियो सो अनहितभये कहे संसार में डारन-
वारो धोखई ठहरयो ॥ ४ ॥
इति उनसठवीं रमैनी समाप्तं ।