कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १३४ ) बीजक कबीरदास ।
साहब कहा समुझावैहै कि जैसो पूर्व कहिआये हैं ( नामार्थमें लिखि आये हैं
शरनकी विधि ) तैसो अनुसंधान करत रामनाम जपिकै निरंतर जो छठयें मास
या होइतौ जो या शरीरते करैहै छामहीनामें दर्शन सो पावैहै याही भांतिसों जौं
मोकोध्यावै तौ छठयेंमास मेरोदर्शन पावै कहे छठौ जो हंस स्वरूप तामें स्थिर
ह्वैजाय ॥ ३ ॥ तौ कौनेउभांतिसों मैं देखाइ देउहौं औ निशिदिन वाके साथ
गुप्तराह्निकै वाको सब सुभावलेउ औ जो दृढ़होइ तौ राम नाम कासाधक
ताको छठौ शरीर दैके वाको प्रत्यक्ष ह्वैजाउ पाछे २ रघुनाथजी नित्य बनेरहत-
हैं तामें प्रमाण॥ ( रामरामेतिरामेतिरामरामेतिवादिनम् । वत्सङ्गौरिवगौर्य्यर्व्या-
धावंतमनुधावति ) ॥ ४ ॥
साखी ॥ कहहिं कवीरपुकारिकै, सबका उहै हवाल ॥
कहा हमरमानै नहीं, किमिछूटै भ्रमजाल ॥ ५ ॥
श्री कबीरजी पुकारिकै कहैं हैं कि जिनको शेष शिवादिने पारनहीं पायो
यह भांतिके दुर्लभ जे परमपुरुष श्रीरामचन्द्र हैं ते आजुकाल्हि ऐसे सुलभह्वै
गयेहैं कि आपई उपाय बतावै हैं कि जो ऐसो उपायकरैं तो छठयें शरीर में
मोको पाइजाईं ते साहबको कह्यो मैं कतनो समुझावतहौं पै सब बेवकूफ हैं
जीवन को हवाल उहैहै कहे वही मायाके नानामतनमें लगेहैं वहीको बिचार
करैहैं जौन धोखाते संसार पायोहै हमारो कह्यो यतनेहूपै नहीं मानैहै सो ऐसे
दुष्ट जीवनको भ्रमजाल कैसेछूटै ॥ ५ ॥
इतिबावनवीं रमैनी समाप्त ।
अथ तिरपनवींरमैनी ।
चौपाई ।
महादेव मुनि अंत न पावा । उमासहित उन जन्म गँवावा १
उनते सिद्ध साधु नहिंकोई । मन निश्चल कहु कैसेहोई २॥
जौ लग तन में आहै सोई । तौलग चेत न देखौ कोई३॥