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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 192

( १४२ ) बीजक कबीरदास ।
अथ अठ्ठावनवीं रमनी ।
चौपाई ।
तैंसुत मानु हमारी सेवा । तो कहँ राज देहुं हो देवा ॥ १ ॥
गम दुर्गम गढ़देहु छुड़ाई । अवरो बात सुनो कछु आई ॥ २ ॥
उतपति परलै देउ देखाई । करहुराज्यसुखविलसहुजाई ३
एको वार न जैहै बाँको । बहुरिजन्मनहिंहोइहैताको॥ ४ ॥
जायपाप देहौ सुखधाना । निश्चयवचनकबीरको माना ५ ॥
साखी ॥ साधुसंत तेई जना, जिन माना वचन हमार ॥
आदिअंत उतपति प्रलय, सव देखा दृष्टिपसार ६
तैं सुत मानु हमारी सेवा । तोको राजिदेहुं हो देवा ॥ १ ॥
गम दुर्गम गढ़देहुँ छड़ाई । अवरो बात सुनोकछुआइ ॥ २ ॥
वही लोकके गये जन्म मरण छूटै है सो कबीरजी साहिबैकी उक्ति कहै हैं ।
साहब कहै हैं हेसुत! हे जीव! तू हमारिही सेवा मानु जिन देवतनको तैं चाहैहै
किं मैं इनको दासहौं तिन देवतनकी राज्यमैं तोको देहुँगो अर्थात् मेरो पार्षद
जब होयगो तब सबके ऊपर है जायगो ते देवता तुम्हारही सेवाकरेंगे ॥ १ ॥
औ गम जो है जगत् दुर्गम जोहै निर्गुण ब्रह्म ये दोनों धोखाजे गढ़हैं ते तोको
छोड़ाय देउँगो अर्थात् मायाते रहित तोको करिदेउँगो औ वह धोखा ब्रह्म में न
लगन देउँगो जो जीवनको संसारी करिदेइहैं तब सगुण निर्गुणके परे जो और
कछुबात है सो मेरेपार्षद कहै हैं सो तैंहूं मेरे नगीच आइकै सुनैगो ॥ २ ॥
उतपतिपरलैदेउँदेखाई । करहुराज्यसुखविलसहुजाई ॥ ३ ॥
अरु उत्पत्ति प्रलय जौनीभांति सो मेरे प्रकाशके भीतर समष्टिजीवते होइ है
सोमैं ऊंचेते तोको देखाइदेउँगो औजगतमेंआयकै जो मोको जानिकै मेरीभक्ति
करैहैं सोसुखहै सोतैंहूमेरीभक्तिकरिकै संसाररूपी राज्यमें जाइकै सुखसोंबिलसैगो