कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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रमैनी । ( १३९ )
अथ छप्पनवीं रमैनी ।
चौपाई ।
दिनदिन जरै जरलकेपाऊ । गाड़े जाइ न उमगै काऊ ॥१॥
कंध न देइ मसखरी करई । कहुधौंकौनिभांतिनिस्तरई ॥२॥
अकरमकरै करमको धावै । पढिगुणि वेद जगतसमुझावै ॥३॥
छूछेपरे अकारथ जाई । कह कबीर चितचेतहु भाई ॥ ३ ॥
दिन दिन जरैजरलकेपाऊ । गाड़ेजाइ न उबरै काऊ ॥१॥
कबीरजी कहैहैं कि जे रोजरोज ज्ञानाग्नि करिकै कर्मकोजारै हैं अपने
जीवत्वको जारैहैं किं हम ब्रह्म हैजायँ सो जरल के पाउ कहे न काहूके कर्मही
जरे न कोई ब्रह्मही भयो । अथवा जरलके पाऊ कहे जारिगये हैं कर्म जाकों
अर्थात् कर्मही नहीं है ऐसो जोब्रह्म ताकोको पायो है? अर्थात् कोई नहीं पायो है ।
जो कहौ जड़भरतादिक पायो है तौ वेजो ब्रह्मही है जाते तौ दूसरो मानिकै
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