कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरमैनी। ( १३७ )
अथ पचपनवीं रमैनी।
चौपाई।
गये राम अरुगये लक्षमना। संग न गै सीताअसधना १
जातकौरवनलाग न बारा। गये भोज जिन साजल धारा२
गै पांडवकुन्तीसी रानी गैसहदेव जिन मति बुधि ठानी३
सर्व सोनेकै लंक उठाई। चलत बार कछु संग न लाई४
कुरियाजासु अंतरिक्ष छाइ। हरिचन्द्र देखिनहिं जाई ५
मूरुख मानुष अधिक सजोवै।अपना मुवल औरलगिरोवै६
इ न जानै अपनो मरि जैबै। टका दश विढ़ै और लै खैबै७
साखी॥ अपनी अपनी करि गये, लागिन काहूके साथ॥
अपनी करिगयो रावणा,अपनी दशरथ नाथ॥८॥
गयेराम अरुगये लक्षमना। संगनगै सीता असिधना ॥ १॥
देवतन मुनिनको कहिआये हैं अब राजनको कहै हैं काहेते कि, आगे दश-
अवतार कहिआये हैं इहां पुनि राम कहै हैं तहां इहां जे जीव राम राजा भये
ताको औ लक्ष्मणको महाभारतसभापर्वमें नारद युधिष्ठिरते कह्योहै राजनके
गिनतीमें यमकीसभामें। तिनको कहैं कि, रामगये लक्ष्मणगये औ संगमें सीता
असनारी न जातभई। जो यह अर्थ कोई न मानै तौयह कहै हैं कि, नारायणके
अवतार रामचन्द्रहैं तिनहीको जाइबो कबीरकहै हैं तौ कबीरजी तौ सांचके
कहवैया हैं झूठी कैसे कहेंगे सब रामायणम बर्णन है कि प्रथम जानकी शरीर
ते सहितगई हैं पुनि श्रीरामचन्द्र शरीरते सहित जातभये जिनके संग श्रीशक्ति
भूशक्ति लीलाशक्ति शरीरैं सहित चलीजातीहै सो जो कबीरजी व राजा
ने भये हैं तिनको जाइबेको न कहते तौ संगमें सिया असि धना न गई यह
कैसे लिखते ॥ १ ॥