कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १३२ ) बीजक कबीरदास ।
के लोकजाय तिनके तिनके रूपधरिबो सो मिटिजायहै।संसारतो छूटि ही जायहै
सो वे बोलै हैं औ मन स्थिरह्वैगयो है कहेमनको संकल्प बिकल्प तो छूटैनहीं
है मनते भिन्न ह्वैवो कहा है कि संकल्प बिकल्पही मनको स्वरूपहै जब संकल्प
बिकल्प छूटिगयो तब मनते भिन्न ह्वै गयो सो कैसे मनते भिन्नहोइगो सो साध-
न आगे कहैहैं ॥४॥
साखी ॥ तनरहते मनजातहै, मन रहते तन जाय ॥
तन मन एक ह्वैरहो, हंस कबीर कहाय ॥ ५ ॥
तनजोहै वा शरीर स्थूल सूक्ष्मकारण महाकारण सोअर्थअनुसंधान करत
रामनाम जपत २ तनते जब रहित ह्वैगयो तब मन जातरहै है औ मन जाय
है तब चारिउशरीर जात रहैहैं । सो जब तनमन एकह्वैरहै कहे सिगरें
तन प्राणमें बंधे हैं सो प्राण औ मनको एकघर करिदैसोनाम जपिविधिजानि-
तवसंकल्प बिकल्प मनको छूटिजाय है। मनतो संकल्प बिकल्परूपहै सो जब-
संकल्प बिकल्पछूट्यो तब मननाश ह्वैगयो । तब चारिउशरीरको हेत जोहै ज्ञान
सोऊ जातरहैहै तब चारिउ शरीर भिन्नह्वैजायहैं एक शुद्धआत्मा में स्थिर ह्वैरहैं
हैं मुक्ति ह्वैजाय हैं जैसे पूर्वशुद्ध समष्टिरूप में रह्योहै तैसे सो ह्वैगयो। जैसे सम
ष्टिजीव जब रह्यो है तब जगत् को कारणरह्यो आयो है साहबको न जानिबो
रूप ताते संसारही ह्वैगयो है तैसे यह जो शरीरनमें साहबको भजन करिराख्यो
सो जब मनादिक याकेछूटि गये शुद्ध ह्वैगयो तब वाही भांति साहब को जानैं
को कारण रहिगयो। काहेते कि राम नामको अर्थ साहब मुख जानिराख्यो है
सो मङ्गल में साहब कहिआये हैं कि जो रामनाम जपिकै मोको जानै तो मैं
हंसरूपदै अपने पास बुलाइलेऊं।याहीते साहब हंस रूप देइ है तब वह काया-
को बीरजीव हंस कहावैहै। कैस हंस कहावैहै कि असारजेहैं चारिउ शरीर औ
मन माया रूप पानी ताको छोड़िदियो औ सारजोहै साहबको ज्ञानरूपदूधता-
कोग्रहणकियो औ अकह रामनाम जो मोती है ताको चुनन लग्यो कहे लेन-
लग्यो सोकबीरजी लिखबै कियो है शब्दमें (निर्मल नामचुनि चुनि बोले) अरु-
अकह रामनामहै अरु अकह निर्गुण सगुण के परैहै श्रीरामचन्द्रई हैं तामें