कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १३८ ) बीजक कबीरदास ।
जातकौरवनलागिनवारा गयेभोजजिनसाजलधारा ॥ २ ॥
गेपांडव कुंतीसी रानी । गेसहदेवजिनमति बुधिठानी ॥३॥
सर्वसोनेकी लंक बनाई । चलत बारकछुसंग न लाई ॥४॥
औ कौरवनको जातवार न लग्यो औराजाभोजगे जिनधारानगरीको बसायोहै
कहे साज्यो है भोजके कहेते कलियुगके राजा सब आयगये ॥ २ ॥
औ पांडवानैहैं औ कुन्ती ऐसी रानी जो है औ सहदेव जैहैं ते सब जातभये
जेपण्डितहैं तिनहूं में अपनीमति कहे बुद्धि अधिक ठानतभये कहे करतभये ॥३॥
औ सब लंका सोनेकै रावण बनायो पै चलतवार संगमें न गई ॥ ४ ॥
कुरियाजासुअंतरिक्षछाई । सोहरिचन्द्रदेखिनहिंजाई ॥ ५ ॥
औ जाकी कुरिया अंतरिक्षमें छाईहै कहे स्वर्गमें महलबनोहै इन्द्रते अधिक
सिंहासनमें बैठतेंहैं ऐसेजैनैहैं हरिश्चन्द्र राजा तेऊनहीं देखिपरे हैं अर्थात् तेऊ न
रहिगये मरिगये भावयह है कि महा प्रलय भये त्रैलोकमें कोई नहीं रँहिजाईहै॥५॥
मूरखमानुषअधिक सजोवै । अपनामुवलऔरलगिरोवै॥६॥
इ न जानै अपनो मरिजबै । टका दशबढ़े औरलैखैवै ॥७॥
मूरख जो मनुष्यहै सो संजोवै कहे अधिक सम्यक् प्रकारते जोवै है अर्थात्
और को मरिबो कहे आजा मरिगयो बाप मरिगयो इत्यादिक सबको मरिबो
देखतई जायहैं औ रोवै हैं अपने मरनकी चिन्तानहीं करैहैं॥६॥ या नहीं जानैहैं
कि जेतेदिन बीतिगये जेतेने मारिगये और मरिही जायँगेय है बिचारै हैं कि
और दशतका बढ़ैं जाते बहुतदिन बैठेखायँ ॥ ७ ॥
साखी ॥ अपनी२ करिगेये, लागिनकाहुकेसाथ ॥
अपनीकरिगयो रावणा, अपनीदशरथनाथ ॥ ८ ॥
जीतिजीति पृथ्वी सबै अपनी अपनी करिकै गये यशी दशरथराजा ते अधिक
कोई न भयो जाकी सब प्रशंसा करैहैं उनके सुकृतको यश जगतही में रहिगयों
उनके साथ न गयो औ अयशीरावणते अधिक कोई न भयो जाकी सब निन्दाकरै
हैं जाके दुष्कृतको अयश जगतहीमें रहिगयो ॥ ८ ॥
इत पचपनवीं रमैनी समाप्त ।