कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआये हैं कि, ब्रह्ममें अणिमादिकसिद्धि होई हैं सो वह कृत्यकरिकै कहे ब्रह्ममा-
निकै पचास लाखवर्षके आगेकी कहै हैं सो पचास लाख यह उपलक्षण है
अर्थात् भूत भविष्य वर्तमान सब कहै हैं ॥ १ ॥
विद्या वेद पढ़े पुनि सोई । वचन कहत परतक्षै होई ॥ २ ॥
पहुंचे बात विद्या के वेता । वाहुके भ्रमभये सङ्केता ॥ ३ ॥
विद्या जो है वेद जो है सो संपूर्ण पढ़िलेई अर्थात् आइ जाइ तब जौनबात
कहै हैं तौन परतक्ष होईहै कहे बाक्यसिद्धि है जाइ है ॥ २ ॥ वेविद्याके वेत्ता
कहे जनय्या जे लोग हैं ते वह बातको पहुंचि कहे पहुंचतभये अणिमा-
दिक सिद्धि होत भई औ ब्रह्मको जानतभये परन्तु साहबको जो है साकेत लोक
ताके जानिबेको उनहूंको भ्रमभयो अर्थात् साहबको लोक न जानत भये ॥३॥
साखी ॥ खगखोजन को तुम परे, पीछे अगमअपार ॥
बिन परचै किमिजानिहौ, झूठा है हङ्कार ॥ ४ ॥
औ खग जो है हंसतिहारो स्वरूप ताके खोजिबेको तुमचल्यो कि, हम अपने
आत्माको स्वरूपजानैं सो साहब अगम अपार जो धोखा ब्रह्म सों लग्यो है
वाहीकौं अपनोस्वरूप मानिलियो है जब कुछ संसार तुमको छूट्यो तब अगम
अपार जो धोखा ब्रह्म है ताही को अहंब्रह्मास्मि मानिकै बैठ्यो सो वह अगम
है काहूकी गम्य नहीं है अपार है अर्थात् झूठा है । भाव यह है कि, जब
साकेत लोक को जानोगे तब साकेतनिवासी जेपरमपुरुष श्रीरामचन्द्र तिनको
जानोगे तब वे हंसस्वरूपदै अपने धामको लैजायेंगे तबहीं जन्म मरणते रहित
होउगे तब हंसस्वरूपपावोगे औरीभांति संसार ते न छूटोगे न सिद्धिप्राप्त भयें
न ब्रह्मभये तामें प्रमाण गोसाईं तुलसीदासजी को दोहा ॥ "बारिमथे घृतहोइ-
बरु सिकताते बरु तेल । बिनहरिभजन न भवतरे यह सिद्धांत अपेल )
१ औ कबीरहूजी को प्रमाण ॥ "रामबिनानार हैहोकैसा । बाटमाँझ गोबशौरा
जैसा" ॥ ४ ॥
इति सत्तावनैंवीं रमैनी समाप्तौ ।