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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 185

रमैनी । (१३६)
तबचेतिहौजबतजिहौप्राना । भयाअन्ततवमनपछिताना ४
यतनासुनतनिकटचलिआई।मनकोविकार न छूटैभाई ५॥
साखी ॥ तीनिलोकमें आयकै, छूटि न काहू कि आश॥
यकआंधर जग खाइया,सवजग भया निराश ॥६॥
उनते अधिक सिद्धिकौन साध्योहै जाको मन निश्चल होइ अर्थात् सिद्धिसा-
धे मन निश्चल नहीं होयहै ॥ २ ॥ जबलग शरीरमें मनहै तबलग चेतन करिकै
अथवा महादेव जे हैं औ बड़े बड़े मुनिजेहैं ते अंतनहीं पायो जो कोऊ
जान्योहै ते वोही साधन तेजान्योहै कहे ज्ञान करिकै वह परम पुरुषको कोईनहीं
देखै हैं ॥ ३ ॥ कबीरजी कहैहैं कि तुम तब चेतिहौ जब प्राण छोड़ोगे ? तब-
कहां चेतौगे यह याकु भाव है जब अनतही जाई शरीर पावोगे तब मनको पछि-
तावई रहिजायगो जो भया अयान पाठ होइ तौ यह अर्थहै कि तुम जो अया-
नेभये साहबको न जान्यो हमारकहा मानवई न कियो तौ अब पछिताना क्याहै
पछितातो काहेकोहै संसार पीर सहो ॥ ४ ॥ यह सब जगत् शास्त्रनम सुनाहै
कि मौत निकट चलीआवै है हमहूं मरिजावेंगे पै मरघट ज्ञान कथैहै मनकों
विकार नहीं छोड़ैहै ॥ ५ ॥ तीनि लोकमें आइकै सब मरिगयो परन्तु काहूकी
आशा न छूटतभई एक आंधरजोहै मन सोजगत्‌को खाइलयो सब जगत्
परमपुरुषके मिलिबेको निराश ह्वै गयो । इहां आंधर कह्यो सो मन परमपुरुषको
कबहूंनहीं देखैहै काहेतेकि साहबमनबचनकेपरै है आपही शक्तिदइहैजीवकों
तबहींदेखैहै ॥ ६ ॥
इति तिरपनवीं रमैनी समाप्ता ।
अथचौवनवीं रमैनी ।
चौपाई ।
मरिगयेब्रह्माकाशिकेबासी । शीव सहित मूये अविनासी १
मथुरा मरिगयेकृष्णगुवारा। मरि मारि गये दशौ अवतारा २
गरिमीरगयेभक्तिजिनठानी। सगुणमें जिन निर्गुण आनी ३