कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १४० ) बीजक कबीरदास ।
न किये कि भलेलगेहैं तुम मसखरी किये कि जो तुमहूं अहंब्रह्मास्मि मानौ तौ
तुमको अनेक प्रकारकी ऋद्धिसिद्धि प्राप्त होइ है साहब को ज्ञान छोड़िदेहु या
भांति समुझाय नरक में डारिदिये ॥ २ ॥
अकरमकरैकरमकोधावै । पढिगुणवेद जगतसमुझावै ॥३॥
छूंछे परै अकारथ जाई । कह कबीर चितचेतहु भाई ॥४॥
कैसेहैं वे गुरुवा लोग करत तो अकरममतहैं किहमको करमत्यागहै हम संन्या-
सी हैं हम ज्ञानी हैं औ करम करिबेको धावै हैं औ वेदको पढ़ि गुनिकै जगतकों
समुझावै हैं कि, निष्कर्महोउ चाहैते सब विकारहै चाह छोड़िदेउ औ आप
भायाके लिये बजारमें झगरै हैं सो उनके कहे जीवनको कैसे समुझिपरै ॥ ३॥
उनको उपदेश अकारथई जायहै औ जो सुनै है सो छूंछई परैहै अर्थात् कछू-
वस्तु हाथ नहीं लगै है सो कबीरजी कहै हैं कि, हे भाई ! चित चेत करो
जेहिते कनककामिनी रूप मायाते औ धोखाब्रह्मते बचिजाउ ॥ ४ ॥
इति छप्पनवीं मैनी समाप्त ।
अथ सत्तावनवीं रमैनी ।
चोपाई ।
कृतियासूत्रलोक यकअहई।लाख पचासके आगे कहई॥१॥
विद्या वेद पढै पुनि सोई । वचन कहत परतक्षै होई ॥ २ ॥
पहुंचि बात विद्या के वेता।वाहु के भर्म भये संकेता ॥ ३ ॥
साखी ॥ खग खोजनको तुमपरे, पीछे अगम अपार ॥
विन परचै किमि जानिहौ, झूठाहै हंकार ॥ ४ ॥
कृतियासूत्रलोकयकअहई । लाखपचासकेआगेकहई ॥ १ ॥
कृतिया कहे यह कृत्रिम जो है कर्म अहंब्रह्म मानिबो सो यहलोक में
एक सूत्रके बरोबरहै कहेरस्सीकेबरोबरहै जीवनके बांधिबेको । मंगलमें कहि