कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्द । ( ३४३ )
एक शब्द में राग छत्तिसौ अनहद वाणी बोलै ॥ २ ॥
मुखको नाल श्रवणके तुम्बा सतगुरु साज बनाया ।
जिह्वा तार नासिका चरही माया मोम लगाया ॥ ३ ॥
गगन मँडल मा भा उजियारा उलटा फेर लगाया ।
कह कबीर जन भये विवेकी जिन यंत्री मन लाया ॥ ४ ॥
यंत्री यंत्र अनूपम वाजै । वाके अष्ट गगन मुख गाजै ॥१॥
यंत्री जो है जीव ताको यंत्र जो शरीर है सो अनूपम बीन बाजै है बीनमें
सात स्वर बाजैहैं अरु आठवों जीवके तारमें टीपको स्वर बाजै है औ इहां
यह शरीरमें सात चक्रहैं सहस्तारलों तिनके बीच बीचको जो है आकाश ये सात
गगन भये अरु आठवों सहस्तार के ऊपर को जो आकाश तामें सुरपति कम-
लमें बैठो जो गुरुनाम बतावै है सो वह आठवां गगनमें जाइकै गाज्यो कहैं
रामनाम सुनिकै लेन लग्यो सो इहां सुषुम्णा जो नाड़ी सोई तार है मूलाधार
चक्रसुरति कमल येई तुम्बा हैं ॥ १ ॥
तूही गाजै तूही वाजै तुही लिये करडोलै ।
एक शब्द में राग छत्तिसौ अनहद वाणी बोलै॥२॥
सो या बीणाको तुही गाजै कहै सुरति कमलमें तुही नाम लेइ है औ तुहीं
बाजै कहै तुही सुरति बोले है औ तुही सुरतिको लैके डोलै है कहै तुहीं
सुषम्णा ह्वै चढ़िआइहै अर्थात् शरीरको मालिक तुही है औ बीणामें छत्तिस राग
बोलैहै। औ इहां एक शब्द जो है राम नाम तामें चौंतिस बर्ण औ पैंतीसौंनाद औ
छत्तिसौंबिंदु ई सब हैं बिंदुते आकारादिक स्वर आइगये वही अनहद है कहै वही-
को हद नहीं है तौने रामनाम रूपी बाणी सुरति कमलमें गुरु बोलै है सो तहीं
जपैहै या अंतर बीणा बतायो सो जानु अब बाहर को बीणा बतावै हैं ॥ २ ॥