सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 388, कुल 766 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 388

( ३४० ) बीजक कबीरदास ।
मूल रकार बीजहै जो सबको परम कारण है सबते पर है सो याही राम
नामको जो कोई साहबमुख अर्थ करिकै जपैगो सोई परम पुरुष पर श्रीरामच-
न्द्र के पास जाइगो और नहीं तरै हैं ॥ ४ ॥
इति सरसठवां शब्द समाप्त ।
अथ अड़सठवां शब्द ॥ ६८ ॥
जो चरखा जरिजाय बढ़ैया ना मरै ।
मैं कातौं सूत हजार चरूखला ना जरै ॥ १ ॥
बाबा ब्याह करायदे अच्छा वर हित काह ।
अच्छा वर जो ना मिलै तुम्हीं मोहिं बिवाह ॥ २ ॥
प्रथमै नगर पहुंचतै परिगो शोक संताप ।
एक अचंभौ हौं देखा बेटी ब्याहै वाप ॥ ३ ॥
समधी के घर लमधी आया आये बहूके भाइ ।
गोड़ चुल्हौने दैरहे चरखा दियो डढाइ ॥ ४ ॥
देवलोक मरि जाहिंगे एक न मरै बढ़ाय ।
यह मन रंजन कारने चरखा दियो दृढ़ाय ॥ ५ ॥
कह कबीर संतो सुनो चरखा लखै न कोइ ।
जाको चरखा लखिपरो आवा गमन न होइ ॥ ६ ॥
नाना उपासना में लगे जीव संसारते नहीं छूटैहैं सो काहेते नहीं छूटै हैं
सो कहैहैं ॥
जो चरखा जरिजाय बढ़ैया ना मरै ।
मैं कातौं सूत हजार चरूखला ना जरै ॥ १ ॥