कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३५० ) बीजक कबीरदास ।
देहरीलौं वरनारि संगहै आगे संग सहेला ।
मृतकथान सँगदियो खटोला फिरि पुनि हंस अकेला॥३॥
जारे देह भसम हैजाई गाड़े माटी खाई ।
काचे कुंभ उदक जो भरिया तन कै इहै बड़ाई ॥ ४ ॥
राम न रमसि मोहमें माते पर्यो कालवश कूवा ।
कह कबीर नर आपु बँधायो ज्यों नलिनीभ्रम सूव ॥ ५ ॥
फिरहु का फूले फूले फूले ।
जो दश मास अधो मुख झूले सोदिन काहेक भूले ॥१॥
औरे औरे मतनमें लगिकै कहा फूले फूले फिरौहौ कि हमहीं मालिक हैं
हमहीं मुक्तहैं दश महीना अधोमुख गर्भ में झूलतरह तहां कह्यो किं हे
साहब ! मैं तिहारो भजन करौंगो मोको छोड़ावो । सो दिन कांहेको भूलिगयें
अब काहे भजन नहीं करौहौ निकसतही कहां कहां करनलग्यो । जो कहो
जब हम गर्भमें रहे तब हमको साहबै दयालुता करिकै सुरति लगायों अब काहे
दयालुता करिकै सुरति नहीं लगावै हैं सो हम कहाकरैं, हमको साहबई भुलाइ
दियो । अरे मूढ़ साहबतो गोहरावत जाइहै सब शास्त्र वेदके तात्पर्य करिकै बीज-
कमें कि जो मोको जानि भजनकरु तो मैं तेरो उद्धार करौंगो सो गर्भबासमें जो
तैं भजन करिबेको कौल कियो सो भजन न कियो भुलायदियो तामें प्रमाण
कबीरजीके मुक्तिलीला ग्रन्थ को ॥ “ गर्भबासमें रह्यो मैं भजिहौं तोहीं । निशि-
दिन सुमिरौं नाम कष्टसे काढौ मोहीं ॥ यतना कियो करार काढ़ि गुरु बाहर
कीना । भूलिगयो निज नाम भयो माया आधीना ” ॥ सो साहबको कौन दोष-
है तुहीं कौलते चूकि गयो साहबको भजन न कियो ॥ १ ॥
ज्यों माखी स्वादै लहि विहरै शोचि शोचि धनकीन्हा ।
त्योंहीं पीछे लेहु लेहुकर भूत रहनि कछु दीन्हा ॥ २ ॥