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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 387

शब्द । ( ३३९ )
जोपै बीज रूप भगवाना । तौ पण्डित का बूझौ आना ॥१॥
कहँमन कहां बुद्धि ओंकारा। रज सत तमगुण तीनि प्रकारा२
बीज जो है रामनाम सो भगवान्‌है जनन मरण छोड़ाइ देबेको तौ हे पंडि-
त तुम आनआन जगत् कारण ब्रह्म ईश्वर प्रकृति पुरुष काल शब्द परमाणु
इत्यादिक काहे खोजत फिरौ हौ यह नामही जगतमुख अर्थ करि जगत्‌को कार-
णहै ॥ १ ॥ सो रामनामै जो सब‌को बीज ठहर्‌यो तो मनको बुद्धिको प्रण-
वको कारण कहां रह्यो एते सत रज तम जे गुण हैं तिनके तीनि २ प्रकार हैकै
जगत् कियो है प्रथम मन बुद्धि ओंकार कहां रहे कोई नहीं रहे भाव यहहै
कि प्रथम साहबको सुरति पायकै रामनाम को जगतमुख अर्थ करिकै जीव सम-
ष्टि ते व्यष्टि हैकै संसारी भयो है तबहीं ये सब भये हैं ॥ २ ॥
विष अमृत फल फूल अनेका । बहुधा वेद कहै तरबेका ३
वोई सतोगुणी रजोगुणी तमोगुणी उपासनाते विष अमृत अनेक फल फलत
भये कहैं नाना दुःख सुख जीव पावत भये कोई वे देवतन की उपासना
करिकै उनके लोक जाइकै सुख पायो औ कोई विषय आदिक करिकै दुःख
पायो येई वे गुणन में फल फलेहैं सो सबंके फल स्तुति बहुधा वेद तरिबे को
लिख्योहै ॥ “शीतले त्वं जगन्माता शीतले त्वं जगत्पिता। शीतले त्वं जगद्धात्री
शीतलायै नमो नमः” ॥ इत्यादिक सब ॥ ३ ॥
कह कबीरते मैं का जानो । को धौं छूटल को अरुझानो४
सो कबीरजी कहैहैं कि वेद तो फलस्तुतिमें तरिबे को कहैहैं कछू साच
नहीं कहैहैं ये सब जीव अपनी अपनी उपासना में लगे कहैहैं कि हम मुक्तहै
जाइँगे सो सब उपासना सतोगुण रजोगुण तमोगुण ये तीन गुणमयहैं सो मैं
कहाजानौं को बद्धहै को छूटहै तुम्हीं बिचार कैरि लेउ कि हमारी उपासना
मायाके भीतर है कि माया के बहिरे है अर्थात् वेद में यह दिखायो कि सबकों