कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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जोलहा बीनेहु हो हरि नामा। जाके सुर नर मुनि धरैं ध्याना ।
ताना तनैको अउठा लीन्हे चर्खी चारिहु वेदा
सरखूटी यक राम नरायण पूरण कामहि माना ॥ १ ॥
श्रीकबीरजी कहैहैं कि, जोलहा जो मैं हौं सो हरिके नामको बिनौ हौं । वें
हरि कैसेहैं कि, जिनको सुर नर मुनि ध्यान धरै हैं । कौनी तरहते बिनौहौं सो
उपाय कहौहौं । कोरिनके यहां ताना तनिबेको अउठाने नापिलेइहैं औ इहां
अउठानो शरीरहै ताको साढ़ेतीनिहाथको नापिलियो अथवा अंगुष्ठमात्र लिंगश-
रिरहै सो मनोमय है ताको मैं हरिनाम बिनिबेको धारणकियो है । नहीं तौ मैं
मनके परे रह्यो हौं । औ कोरिनके इहां चर्खीते सूत खैंचिकै केंडा करि लेइहैं,
औ इहां चारो वेद जे हैं तेई चर्खी हैं तिनके तात्पर्यते आत्माको स्वरूप “कि
तैं परमपुरुषपर श्रीरामचन्द्रको है” यहीसूत जीवात्माको निकास्यो । औ कोरि-
नके इहां सर औ खूंटीते तानाको पूरैहैं अरु इहां श्री इहां वैष्णवह्वै गुरुके मंत्र
पावैहै रघुनाथजीको षडक्षर और नारायणको द्वयक्षर औ अष्टाक्षर सो सर खूटी•
राम औ नारायण ये नामहैं । एकनामको सरबनायो एक नामको खूटी बनायो
इनहींको नामलिये हरिनामरूपी कपरा बिनिबे को मैं अधिकारी भयो । यह मैं
मान्यो कि, मैं पूरिदेहौं रामनाम दुइ खूंटी हैं नारायण नामसर है ॥ १ ॥
भव खागर यक कठवत कीन्हो तामें माड़ी सानी ।
माड़ीको तन माड़ि रहोहै माड़ो विरला जाना ।
त्रिभुवन नाथ जो मंजन लागे इयाम मुरारिया दीना ।
चाँद सूर्य दुइ गोड़ाकीन्हो मांझदीप किय ताना ॥ २ ॥
कोरिनके इहां माड़ी सानी जाइहै तब एक कठौतामें धरैं हैं सो इहां भवसा-
गर कठौताहै औ चारों शरीर माड़ी हैं तामें जीव सूतसनो है इहां साधनअव-
स्थामें चारों शरीरमें वह नामको भावनाकरिकै जो जपिबो है मुमुक्षुदशामें
सोई सानिबो है सो नाम उच्चारणकी विधि कोई विरला जानै है सो रामानुजा-
चार्य आपने राममंत्रार्थमें लिख्यो है यह नाम स्मरणको शरीर धारण कियो सों