सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 390, कुल 766 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 390

( ३४२ ) बीजक कबीरदास ।
जीवको ब्याही माया जो होइहै सो मनते होइहै सो मन ससुर भयो अरु
शुद्धते अशुद्धभयो सो अशुद्ध जीवको बाप शुद्ध जीव ठहरयो सोई समधी
ठहरयो तौने जीवके घरमें लमधी जो है मन को भाईचित्त सो आयो नाना
स्मरण देवायो तबहूं जो माया है ताको भाई काल आयो । चूल्हा जो है तामें
दुइँ पल्ला होइहैं सो पुण्य पाप जेहैं ते दूनों पल्लाहैं तौने चूल्हामें गोड़ दैकै
चरखा जो शरीर है तिनको डड़ाइदीन्ह्यो कहे लाइदियो काहूको पुण्य करायकै
काहू को पाप करायकै शरीर खाइलीन्ह्यो ॥ ४ ॥
देवलोक मरि जाहिंगे एक न मरै बढ़ाय ।
यह मन रंजन कारने चरखा दियो बढ़ाय ॥ ५ ॥
कह कबीर संतौ सुनौ चरखा लखै न कोइ ।
जाको चरखा लखि परो आवा गवन न होइ ॥ ६ ॥
देवलोक को नरलोक को सबको काल खाइलेइहै यह बढ़ैया जो मनहै
सोनहीं मारो मरै है औ जब वह चरखा टूटैहै तब बढ़ही बनाइ देइहै ऐसें
वह बढ़ई जो मन सो कालके रंजन करिवे को शरीर रूपी चरखा कों दृढ़
करत जाइहै नाना शरीर कालको खवावत जाय है ॥ ५ ॥ श्रीकबीरजी
कहैं हैं कि, चरखा जे चारो शरीरहैं तिनको कोई नहीं लखै है जाको चारों
शरीर लखिपरे अरु पांचौशरीर कैवल्य में प्राप्त भयो कहे केवल चितमात्र
रहिगयो तब वह चरखाको गढ़ैया जो मनहै तेहिते जीव भिन्न ह्वैगयो तब
छठवाँ अंश स्वरूप साहब देइहै तामें स्थित हैकै साहबके लोकको जाइहैं
आवा गवन नहीं होई है ॥ ६ ॥
इति अरसठवां शब्द समाप्त ।
अथ उनहत्तरवां शब्द ॥ ६९ ॥
यंत्री यंत्र अनूपम बाजै । वाके अष्ट गगन मुख गाजै ॥१॥
तूही माजै तूही बाजै तुही लिये कर डोलै ।