कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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अथ सत्तरवां शब्द ॥ ७० ॥
जसमास नरकी तसमास पशुकी रुधिररुधिर यकसाराजी ।
पशुकी मास भखै सबकोई नरहि न भखै सियाराजी ॥ १ ॥
ब्रह्मकुलाल मेदिनी भरिया उपजि विनशि कित गइयाजी ।
मास मछरिया जोपै खैया जो खेतनि में बोइयाजी ॥ २ ॥
माटीको करि देई देवा जीव काटि काटि देइयाजी ।
जो तेरा है सांचा देवा खेत चरत किन लेइयाजी ॥ ३ ॥
कहै कबीर सुनोहो संतो रामनाम नित लैयाजी ।
जो कछुकियो जिह्वाके स्वारथ बदल परारा दैयाजी ॥४॥
जसमासनरकी तसमासपशुकी रुधिररुधिरयकसाराजी ।
पशुको मास भखै सबकोई नरहि न भखै सियाराजी ॥१॥
जस नरकी मास होइ है तस पशुकी मास होइ है अरु रुधिर भी एक
तरह होइ है परंतु पशुके मासको जे भक्षण करै हैं ते सियारई हैं सो
वे मनुष्यते औ सियारते यतनै भेद है कि, सियार मनुष्यको मांस खाइ है अरु
नरपशु की मांस खाइ है मनुष्यको मांस पशु नहीं खाइ है सो कहै हैं कि,
रुधिर मांस तो सब एकई तरह है नर की मांस काहे नहीं खाय हैं ॥ १ ॥
ब्रह्म कुलाल मेदिनी भरिया उपजि विनशि कित गइयाजी ।
मास मछरिया जोपै खैया जो खेतनि में बोइयाजी ॥ २ ॥
जौनेते सब पृथ्वी जगत् भयो है ऐसो जो है ब्रह्मा कुलाल जो कुम्हार औ
सर्वत्र जगत में भरै रहा अर्थात् सब वस्तु ब्रह्मई रह्यो तौ यह सब पृथ्वी
उपजी औ बिनशिकै कहां गई सो एक ब्रह्मही सर्व मानिकै जो मास मछली
खाउ कि सब तो एकई है जो मन चलैगो सो करेंगे नरक स्वर्ग कर्म सब