कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतब ब्रह्मांड कहां रहिगयो जहां ब्रह्मांडमें लीनह्वैकै बनो रह्यो सो यह बात
ऐसी है कि, जे ब्रह्मांडमें प्राण चढ़ावैं हैं तिनके जब शरीर छूटिजायहैं तब उनक
गैवगुफा सब मरिजाँयहैं तब गैवगुफा रूपी करवामें जो प्राण चढ़ो रहै है सो
जब दूसर शरीर धर्यो तब नासिका जो है टोटी तहांते वहै पवन निकसैहै
वही वासना लगी रहैहै तेहिते फिरि गुरुसों पूछिकै अभ्यास करनलगे हैं ॥ ४ ॥
इति पैंसठवां शब्द समाप्त ।
अथ छाछठवां शब्द ॥ ६६ ॥
योगिया कि नगरी बसै मतिकोइ। जोरेवसै सो योगिया होइ १
वह योगियाको उलटाज्ञाना। काराचोला नाहीं म्याना२॥
प्रकट सो कंथा गुप्ताधारी । तामें मूल सजीविनि भारी॥३॥
वा योगियाकी युगुति जो बूझै।रामरमै सो त्रिभुवन सूझै ॥४॥
अमृत वेली क्षण क्षण पीवै। कहकबीर सो युग युग जीवै॥५॥
योगिया कि नगरी बसै मति कोइ।जोरे बसै सो योगिया होइ
योगिया जो है योगी ताकी नगरी जो है ब्रह्मांड गैवगुफा तहां कोई न
बसौ अर्थात् हठयोग कोई न करो काहेते कि, जो कोई वह नगरीमें बसै है
अर्थात् हठयोग करै है सो योगियै होइहै कहे फिरि फिरि वही वासना करिकै
योगिया होइहै योग साधै है जन्म मरण नहीं छूटै है ॥ १ ॥
वह योगिया को उलटा ज्ञाना।कारा चोला नाहीं म्याना २
सो वह योगी को उलटा ज्ञान है कहे उलटे पवन चढ़ावै है अर्थात् या
शरीर को वेदांत शास्त्रमें निषेध करै है कि, यही शरीर ते आत्मा भिन्नहै
तौनेही शरीरको योगी प्रधान मानै हैं कि यही शरीर ते मुक्त ह्वैजायेंगे सो
इनको चोला जो है मन जौनेते शरीर पावै है औ मनै गैवगुफामें समाइ
जाइ है नाना प्रकारके जे कुत्सित कर्म हैं तिनते मलीन ह्वै रह्यो है याते
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