कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३३४ ) बीजक कबीरदास ।
जब नामस्मरण न कियो सोई शरीर रूपी माड़ी याके माड़ि रह्योहै कहे लपटि
रही है औ कोरिनके जब वाको मांजे हैं तब मांडी सम हैजाइहै औ मैल छूटि
जाइहै। औ इहां त्रिभुवननाथ जो मनहै सो रेचक कुंभक पूरक जे कूचाहैं तिनमें
मांजनलग्यो कहे नामको जपनलग्यो औ जीवको माड़ी जोहै चारो शरीर
तिनको सम कै दियो कहे एक करि दियो औ । कोरिनके मांजत में जब तागा
टूटि जाइहै तौनेको मुरेरिकै जोरि देइहै सो मुररिया कहावैहै इहां नामके स्मरण
में जब बीचपरै है तब कहीं श्याम कहीं गोपाल कहीं कृष्ण इत्यादिक नाम लैके
धागा जोरिदेइहै। औ कोरिनके दुइगोडा कहे दुइ घोरियाके बीचमें ताना तनेंहैं औ
इहां चांद सूर्य जे इड़ा पिंगला तिनके बीचमें दीप जो सुषुम्णा नाड़ी है ताको
ताना कियो। ताना वाको काहेते कह्यो कि, वह साहबके लोकते लै मूलाधारचक्र
लौं रश्मिरूप तनी है जीवही सुषुष्णा नाड़ी है भक्तन को जी उतरै चढ़ै है ॥२॥
पाई करिकै भरना लीन्हो वे बांधै को रामा
वे ये भरितिहुँ लोकै बांधै कोइ न रहे उवाना ।
तीन लोक यक करिगह कीन्हो दिगमग कीन्हो तानै
आदि पुरुष वैठावन बैठे कविरा ज्योति समाना ॥ ३॥
कोरिनके इहां पाई साफ करिबेको कहै हैं औ कमठिनके बीचते
सूत निकासी लेइहै सो भरना कहावै है सो इहां चारो शरीर माड़ी
मांजिकै कहे चारयो शरीर छोड़ायकै जीवको साफ करि कै कहे सूक्ष्म
बिचारते जीव को स्वरूप निकस्यो कि, रामहीको है औरेको नहीं है औ
कोरिनके राक्षकी जो कमठी ताके छिद्र ह्वै सब सूतको निकासीलेई है औ दुइ
सूत बांधिदेइह सो वे कहावैंहैं औ तीनि फेरी करिकै सूतको गांसि देई है सो
तिलोक कहावैहै। औ उबान वह कहावैहै जो बाहर सूत रहिजाइहै सो उबान न
रहिगयो सो इहां दोनों कुंभकमें राम जे दुइबर्ण हैं रकार मकार तिनको बांधि
दियो । बहिरे जब श्वास जाइहै तब जहांते थंभिकै लौटै है सो कुंभक कहावै है
तहां रकार जपै है तब सूर्यके प्रकाशको भावनाकरै है औ जब भीतर श्वास जाइहै
औ थंभिकै लौटै है तहां मकार जपै है तब चन्द्रमाको प्रकाशको भावना करै है