कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३४६ ) बीजक कबीरदास ।
मिथ्या हैं ऐसो जो मानौगे तौ जो खेतमें बोवनको होइ हैं, सो तुम मुर्दे पशु
की मासकी मास खाउ हौ अरु वे तुम्हारे जीतही यमपुरमें मांस खाइँगे जो
कहौं हम देवताको बलि चढ़ाइकै खाइ हैं तौनेपर कहै हैं ॥ २ ॥
माटीको करि देई देवा जीव काटि काटि देइयाजी ।
जो तेराहै सांचा देवा खेत चरत किन लेइयाजी ॥ ३ ॥
माटीको तौ देवता बनाओहौ उसके आगे जीव काटि काटि के राखौहौ
यह कैसी गाफिली तुमको घेरी है जो माटीको देवता सांच है तो जब बोकरी
खेतमें चरती है तब तुम्हारा देवता काहे नहीं खाता क्या देवताको किसीका
डर है भाव यह है कि, तुम काहेको हत्यारी लेतेहो अंगुरियादेउ जो सांचा
होयगो तौ खाइगो तेहिते तुम्हारी देवता मिथ्या है खेतमें चरत बोकरीको न
खाइ सकैगो ॥ ३ ॥
कहै कबीर सुनोहो संतो रामनाम नित लैयाजी ।
जो कछु कियो जिह्वाके स्वारथ बदल परारा दैयाजी ४॥
सो कबीरजी कहै हैं कि, जिनके जिनके गलाको तुम काटतेहौ ते सब
तुम्हारो नरकमें गला काटेंगे तेहिते रामनामको नितलेउ भाव यह है जब नामा-
पराध छोड़ि रामनाम लेउगे और फिरि पातक न करौगे तबहीं तुम्हारे पातक
जावेंगे तामें प्रमाण ॥ "हरिर्हरति पापानि दुष्टचित्तैरपि स्मृतः । यदृच्छयापि
संस्पृष्टो दहत्येव हि पावकः ॥ रामेति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन्। नरो न
लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विंदति " ॥ दशनामापराधमें प्रमाण ॥ "संतां निंदा
नाम्नः परममपराधं वितनुते यतः ख्यातिं जातं कथमयह सहेद्धेलनमदः । शिवस्य
श्रीविष्णोर्य इह गुणनामादिसकलं धिया भिन्नं पश्येत्स खलु हरिनामा हितकरः॥
गुरोरवज्ञा श्रुतिशास्त्रनिंदनं तथार्थवादो हरिनाम कल्पनं । नाम्नो बलाद्यस्य
हि पापबुद्धिर्न विद्यते तस्य यमैर्हि विच्युतिः ॥ श्रुत्वापि नाममाहात्म्यं यः
प्रीतिरहितोधमः । अहं ममादिपरमो नाम्नि सोप्यपराधकृत् ॥ ४ ॥
इति सत्तरवां शब्द समाप्त ।