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सर्वकोश
कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

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पृष्ठ 400

( ३५२ ) बीजक कबीरदास ।
कर्म न वाके धर्म न वाके योग न वाके युगुती ।
सींगी पत्र कछुव नहिं वाके काहेक मांगै भुगुती ॥ ३ ॥
तैं मोहिं जाना मैं तोहिं जाना मैं तोहिं माँह समाना ।
उतपतिप्रलय एक नहिं होती तब कहु कौनको ध्याना ॥४॥
योगिया एक आनि किय ठाढो राम रहा भरिपूरी ।
औषधि मूल कछुव नहिं वाके राम सजीविनि मूरी ॥ ५ ॥
नटवत बाजी पेखनी पेखै बाजीगरकी बाजी ।
कहै कबीर सुनौहो सन्तों भई सो राज विराजी ॥ ६ ॥
योगिया ऐसो है बद करणी। जाके गगन अकाश न धरणी १
हाथ न वाके पाउँ न वाके रूप न वाके रेखा ।
विना हाट हटवाई लावै करै बयाई लेखा ॥ २ ॥
योगिया कहे संयोगी याको ब्रह्मसंयोग करिकै जगत् करैहै याते योगिया
माया सबलित ब्रह्महै सो वह योगिया की बद करणी है कहे निषिद्ध करणी है
जौने चैतन्याकाशमें अहं ब्रह्मास्मि बुद्धि करै है तौन चैतन्याकाश मेरे लोकको
प्रकाशहै तहां आकाश धरणी एकौ नहीं हैं ॥१॥ वह चैतन्याकाशको जो मानि
लियो है कि सो महीं है ऐसा जो समष्टि जीव चैतन्य ब्रह्मरूप सो वाके न हाथ
है न पाउँ हैं न वाके रूप रेखा है जहां जीव नानाकर्म करै है जंगत् अरु बही
जगत् कर्मनको फल पावैहै जहां यही लेनदेन ह्वै रह्यो है सो जो है हाट वाकें
नहीं हैं कहे देश काल वस्तु परिच्छेदतें शून्यहै औ हटवाई लगौतै है माया
कहे सबलित ह्वैकै जगत् करतै है अरु बया और को अनाज और और को नापि
देइहै अरु ब्रह्म जो है बया सो माया सबलित ह्वैकै ईश्वर रूपते जीवनके कियें
जे कर्मके फलहैं ते जीवन को देइहै ॥ २ ॥
कर्म न वाके धर्म न वाके योग न वाके युगुती ।
सींगीपत्र कछुव नहिं वाके काहेको मांगै भुगुती ॥३॥