कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 386, कुल 766 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३३८ ) बीजक कबीरदास ।
ताको कारकह्यो औ म्याना छोटा को फ़ारसी में कहै हैं सो वह मन छोटा
नहीं है बड़ो है सब संसार अरु चारों शरीर मनमें भराहै ॥ २ ॥
प्रकट सो कंथा गुप्ताधारी । तामें मूल सजीतनि भारी ॥ ३॥
अरु जो बहुत योग करिकै ब्रह्मांडमें प्राण चढ़ाइकैक प्राणको गुप्तकियो है
सो प्रकटै है ते वे योगी कंथाजो है शरीर ताको धारण किये रहे हैं बहुत दिन
जियै हैं ताको हेतु यहहै कि, मूल सजीविनि अमृतहै सो भारी कहे बहुतहै सो
चुवत रहै है जैसे संजीवनी ओषधि महाप्रलय भये नहीं रहि जाइहै सो याको
वह जियावै है सोऊ नहीं रहिजायहै तैसे जो कोई मूड काटि डारचो अथवा
कोई शरीर को खाइलयो तब न वह अमृत रहिजाइ न वे रहिजाइँ ॥ ३ ॥
वा योगिया की युगुति जो बूझै । राम रमै सो त्रिभुवन सूझै४
अमृत वेली क्षण क्षण पीवै । कह कबीर सो युग युग जीवै५
सो ये जो हैं योगी ते युगुति करिकै जिये हैं आखिरमें इनको जन्म मरण
नहीं छूटै सो या जोगियाको हठयोग छोड़िकै जो कोई वा योगी की युगुति बूझै
जे राजयोग करनवारे हैं सो रामरमै तब वाको त्रिभुवनमें रामई सूझिपरे॥४॥
अरु श्री कबीरजी कहै हैं कि, अमृतबेलि जो है रामनाम ताको क्षण क्षण में
पिये कहे श्वास श्वास में राम नाम स्मरण करै है सोई हनुमान बिभीषणा-
दिक के तरह युगयुग जियै है औ जनम मरणते रहित ह्वैजाइहै ॥ ५ ॥
इति छाछठवां शब्द समाप्त ।
अथ सरसठवां शब्द ॥ ६७ ॥
जौपै बीजरूप भगवाना । तौ पंडित का बूझौ आना॥१॥
कहँ मन कहां बुद्धि ओंकारा। रज सत तम गुण तीनि प्रकारा२
विष अमृत फल फलै अनेका।बहुधा वेद कहै तरुवेका ॥३॥
कह कबीर ते मैं का जानो। कोधौं छूटल को अरुझानो॥४॥
जो आगे कहिआये कि जो कोई रामनाम लेइहै सोई जनन मरणते रहित
होइहै सो कहै हैं ॥