कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशब्द। ( ३५१ )
जैसे माखी फूलनके रसके स्वादको पाइकै बिहार करै है औ ताहीके
सहतको धन जोरि जोरिकै धरै है तैसे तुमहूं विषय भोग करिकै धन जोरि
जोरि धरौहौ सो जैसे कोऊ आइकै मछेहनको लाइकै सहतको लैजाइकै आपसमें
बांटे लेइहै तैसे तोहीं पीछे कहे जब तुम न रहिजाउगे तब तिहारे धनको स्त्री
पुत्रादिक लेहु लेहु करिकै बांटि लेइँगे अरु तुमको भूत की रहनि कहे दशदिन
भूत कहेंगे मरवटामें बैठायेंगे ॥ २
देहरीलौ वरनारि संगहै आगे संग सहेला ।
मृतुकथान सँग दियो खटोला फिरि पुनि हंस अकेला ३
जारे देह भसम हैजाई गाड़े माटी खाई ।
काचे कुंभ उदक जो भरिया तनकै इहै बड़ाई ॥ ४ ॥
ये चारो तुकनको अर्थ स्पष्टहै ॥ ४ ॥
राम न रमसि मोहमें माते पर्यो काल वश कूवा ।
कह कबीर नर आपु बँधायो ज्यों नलिनी भ्रम सूवा ॥५॥
श्री कबीरजी कहै हैं कि हेजीव! मोहमें माते राममें नहीं रमै है कालके वश
ह्वैकै संसार कूपमें पर्यो है वाते बारबार तेरो जन्म मरण होइहै सो तौ अप-
नेही भ्रमते नानादुःख सहै है जैसे नलिनी को सुवा अपनेही चंगुलते धरि लियो
छोड़ै नहीं है मारो जाइहै तैसे तैंहूं नाना मतनमें लगिकै अरु विषयनमें लगिकै
आपहीते यह संसारमें परिकै बँधिगयो संसारको धरैहै भाव यहहै संसार
तोको बांधे नहीं है तें छोड़ि काहे नहीं देइहै अरु जेहि साहबको तैं है जहां
एकउ दुःख नहीं हैं तिनमें काहे नहीं लगे है ॥ ५ ॥
इति तिहत्तरवां शब्द समाप्त ।
अथ चौहत्तरवां शब्द ॥ ७४ ॥
योगिया ऐसोहै बड़ करणी । जाके गगन अकाश न धरणी १
हाथ न वाके पाउँ न वाके रूपनवाके रेखा ।
बिना हाट हटवाई लावै करै ब्याई लेखा ॥ २ ॥