कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६४४ ) बीजक कबीरदास ।
मुखको नाल श्रवणके तुम्बा सतगुरु साज बनाया ।
जिह्वा तार नासिका चरही माया मोम लगाया ॥ ३ ॥
बीणाके बीचमें डांड़ीहै यहां मुखै नाल डांडी है वीणामें दुइतुम्बा लगैहैं यहां
दूनों जे श्रवणहैं तेई तुम्बाहैं बीणाको स्वर मिलावै हैं औ यहां सतगुरु जेहैं ते साज
बनाइ जीवनको उपदेश करै हैं औ वहा बीणामें तार लागै है अरु यहां जीभ जो
है सोई तार है औ बीणामें चरही कहै सार लाँगैहै औ यहां नासिका चरही कहे
सारहै सारमें मोम जमाया जाइ है यहां माया जो है गुरुकी कृपा माया "दम्भे
कृपायां च॥" सोई मोम जमायो जैसे बीणा में जौन स्वर बजावै तौन बाजै है
तैसे सुरति कमलते गुरु जो राम नामको उपदेश कियो सोई जीभते जपै है ॥३॥
गगन मँडल मा भा उजियारा उलटा फेर लगाया ।
कह कबीर जन भये विवेकी जिन यंत्री मन लाया ॥४॥
बीणा जब सुरते बाजै है तब सब रागनको उजियारा ह्वै जाइहै औ आछो
लगैहै सबराग जानि जाइहैं और दूसरे पक्षमें जीवको उलटो ज्ञान जगत्मुख
ह्वैगयो तैं ब्रह्ममुख ह्वैगयो तैं औ आत्मामुख ह्वैगयो तैं कि महीं ब्रह्महौं ताकों
नाना शब्दमें समुझाइकै अठयें गगनमें जीवको साहब मुख करतभये तब जीव-
को ज्ञान ह्वैगयो सब धोखा छोड़िकै साहब में लग्यो जगत्मुख रह्यो सो
उलटा रह्यो ताको सीधेमें गुरुवालोग फेरि लैआये औ लगायो । पाठ होइतो
साहबमें लगावत भये श्रीकबीरजी कहैहैं कि, यंत्री जो हैं बीणाकार उस्ताद
तौनेते जो बीन बजावै मन लगाय सीखैहै तौ वाको सुरनको रागनको वे ब्यौरा
आइ जाइहैं ऐसे सुरति कमलमें बैठे जे हैं परमगुरु जे राम नामको उपदेश
करै हैं तिनसोंजो कोई यंत्री जीवात्मा मन लगावै है सो बिबेकी होइहै कहे
जगत् को असांच जानिकै सांच साहब में लगि जाइहै ॥ ४ ॥
इति उनहत्तरवां शब्द समाप्त ।