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कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)

Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary

सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished766 पृष्ठ

पृष्ठ 383, कुल 766 में से

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पृष्ठ 383

सो जौन साधारण श्वास चलैहै नासिकाते बारह आंगुर भीतर जायहै बारह
आंगुर बाहर जायहै जहां जहांते थंभि थंभिकै लौटै है तहां रकार मकार को
जपिकै वे आंगुरनको घटाइ बूझै दूनों कुंभकनको घटावनलगै इसतरहते वे जो हैं
श्वास ताके बांधतमें जब श्वासके क्रमते घटाइक तहुँलोकै बांधै कहे त्रिकुटीमें
बांधिदेइ अर्थात् एक आंगुर भीतर जानपावै न एक आंगुर बाहर जानपावै औ
एक आंगुर बीचमें राखै सो यहि तरहते जो कोई करै है सोई उबान नहीं रहै है
कहै संकल्प विकल्प मिटि जाइहै जपकरतमें काहेको उबैगो ताको रामनामही
तीनों लोक देख परै है वोत बाहर नहीं देखपरै है। जहां कोरी बीननको बैठै है
सो कारिगह कहावै है जब कपरा बीनि चुके तब तहां तीनि घरी करिकै कपरा
धरि देइहै औ तानाको दिगमग कहे जहां तहां डारिदेइहै इहां तीनि लोकमें
फैली जो जीवकी वृत्ति है ताको जहां अपने स्वरूपमें आत्माकी स्थिति है तहां
कैवल्यमें राख्यो । तीनि आंगुर श्वासा करिकै जो स्मरण करतरह्यो सो मन पव-
नको एक घर कै दियो तब संकल्प विकल्प सब मिटिगयो यह ताना शरीरमें
तन्यो रह्यो ताको दिगमग कियो कहे पृथ्वीको अंश पृथ्वीमें जलको अंश
जलमे तेजको अंश तेजमें वायुको अंश वायुमें आकाशको अंश आकाशमें
मिलाइदियो ये पंच भये औ मनको बुद्धिमें बुद्धिको चित्तमें चित्तको
अहंकारमें अहंकार को जीवात्मामें मिलाइदियो ये पांचभये ये सबताना
दशौ दिशा में फैलाइ दियो तब याको सुधि भूलिगई एक जीवात्माभर रहिगयो
औ जब कपरा तय्यार ह्वैजाइहै तब कोरीके यहां मालिक को पयादा आवै है
तब पयादाके साथ मालिकके यहां कपरा कोरी लैजाइहै औ यहां आदिपुरुष
जे परमपुरुष पर श्रीरामचन्द्रहैं ते बैठावन देइ हैं कहे याको हंसस्वरूप देइहैं
सोई पयादाहै ताके साथ ह्वैकै कहे तामें स्थितह्वैकै कबीर जो मैंहों सो वह
जोहै कैवल्यरूप ताते छूटि कै पार्षदरूप पाइकै परमपुरुष पर श्रीरामचन्द्रके
लोकको प्रकाशरूप जोहै ब्रह्म तौने ज्योतिमें समाइकै कहे वाको भेद परम
पुरुष पर श्रीरामचन्द्रके धामकों गयो भाव यह है जैसे कोरी थान मालिक
के नजर कैदेइहै तैसे अपने आत्माको शुद्ध करिकै परम पुरुष पर श्री रामच-