कबीर बीजक (सन्त कबीर साहिब - हंसदास शास्त्री कृत सविस्तार हिन्दी टीका सहित)
Kabir Bijak with Comprehensive Hindi Commentary
सद्गुरु कबीर साहिब (टीकाकार: हंसदास शास्त्री) द्वारा
रमैनी । ( १२१ )
जे जीवात्महींको जानै हैं साहबको नहीं जानै हैं तिनहीं को अंदेशपरै है
काहेते कि सब झूठहीहै वही सँदेश कहैहैं जबयमदूत मारनलगै तब वा मारु-
देखि उनको अंदेश परैहै कि हमारी रक्षा कौनकरै है सो या पापिनकी दशा
गरुड़ पुराणमेंप्रसिद्धहै ४ साहबके जाननवारे जैसाधुहैं तिनकी संगति छोड़िकै
जेअसरारकहे कफरई करैहैं अपने जीवात्मैको मालिक मानैहैं साहबको नहीं
जानैहैं उकहे वे जेदुष्टहैं ते बहै मोटनरकको भारा कहे नरकको है भार जामें
ऐसी जोमायाकी मोटरी ताहीको बहै कहे ढोवैहैं ॥ ५ ॥
साखी ॥ गुरुद्रोही औ मनमुखी, नारीपुरुषविचार ॥
तेनरचौरासीभ्रमाहिं, जब लगिशशिदिनकार॥६॥
कबीरजी कहैहैं कि शुकादिक मुनि वेद पुराण साधु औ जे जे साहबके
बतावन वारेहैं सो येई गुरुहैं जो कोई इनकी बाणी को मिथ्या मानै है सोई
गुरुद्रोही है सो गुरुद्रोही औ मनमुखी कहे अपने मनैते नारिनर विचारिकै जे
एक जीवात्महींको मालिकमानै हैं ते चौरासी लक्ष योनिही में जबलगि सूर्यचन्द्र-
मा रहै हैं तबलगि वाहीमें परे रहैहैं ॥ ६ ॥
इति तैंतालीसवीं रमैनी समाप्त ।
अथ चौवालीसवीं रमैनी ।
चौपाई
कवहूं न भये संग औ साथा । ऐसो जन्म गँवाये हाथा ॥ १॥
बहुरि न ऐसो पैहौ थाना । साधुसंगतुमनहिं पहिंचाना ॥२॥
अवतौ होइ नरकमें वासा। निशिदिनपरेलवारके पासा॥ ३॥
साखी ॥ जात सवन कहँ देखिया, कहै कबीर पुकार॥ ॥
चेतना होहु तौ चेति ले, दिवस परत हैं धार ॥ ४ ॥
( १२२ ) बीजक कबीरदास ।
कबहुंन भये संग औ साथा । ऐसो जन्म गँवाये हाथा ॥ १॥
साहबके जाननवारे जे साधु तिनको सत्संगकबहूं न कियो औ उनके बताये
साहबको साथ कबहूं न कियो जेहिते आवागमन रहित होय मनुष्य ऐसोजन्म
अपने हाथते गमायदियो ॥ १ ॥
बहुरि न ऐसो पैहौथाना । साधुसंगतुम नहिंपहिचाना॥२॥
अबतोरहोइनरकमेंवासा । निशिदिनपरैलवारकेपासा ॥३॥
ऐसोस्थानकहे मनुष्यदेह तुम फेरि न पावोगे साधुसंग तुम नहीं पहिचान्योहैं
साधुसंगकरो जो पूरागुरु पाइजाउगे तौ उबार ह्वै जाइगो॥२॥धोखाजो है ब्रह्म
औ माया ताके उपदेश करनवारे जे हैं गुरुवालोग लवरा तिनके पास में निशि-
दिन परचो है सो बिना पारिख तेरो नरकही मो बासहोइगो ॥ ३ ॥
साखी ॥ जातसवनकहँदेखिया, कहैंकबीरपुकार ॥
चेतवाहौतौचेतिले, दिवसपरतहै धार ॥ ४ ॥
दूनौं ब्रह्ममायाके धोखा में सब को नरक जातदेखिकै कबीर जी पुकारिकै
कहैंहैं कि चेतिबे को होइ तो चेतौ नहींतौ दिनैकै तिहारे ऊपर धारपरैहै कहे
गुरुवालोगनको डाकापरैहै भाव यह है जो गुरुवा लोगन को डाका तुम्हारे
ऊपर परैगो औ वह ब्रह्म को उपदेश करेगो औ तुम्हारे वह धोखा दृढ़परिजा-
इगो तौ तुम मारेपरोगे कहे जैसे मरा काहूको फेरो नहीं फिरै है तैसे तुमहूं
वह धोखाते काहूके फेरे न फिरोगे अर्थात्काहूको कहा न मानोगे तौ संसार-
हीमें परेरहोगे बहुत बड़ेबड़े वही धोखाते ब्रह्ममेंपरिकै मरिगये साहबको न
जानत भये सो आगेकहैंहैं ॥ ४ ॥
इति चौवालीसवीं रमैनी समाप्त ।
रमैनी । ( १२३ )
अथ पैंतालीसवीं रमैनी ।
चौपाई
हिरणाकुश रावण गये कंसा। कृष्णगयेसुरनर मुनिवंसा॥ १॥
ब्रह्मा गये मर्म नहिं जाना । बड़ सबगयो जो रहेसयाना ॥२॥
समुझिनपरीरामकीकहानी।निरवकदूधकिसरवकपानी ३॥
रहिगोपंथ थकितभो पवना।दर्शौदिशाउजारिभोगवना॥४॥
मीनजाल भो ई संसारा।लोह कि नाव पषाणको भारा॥५॥
खेवै सबै मरम नहिंजाना । तहिवो कहै रहै उतराना॥ ६ ॥
साखी ॥ मछरी मुखजस केचुवा, मुसवन मुहँ गिरदान ॥
सर्पनमाहँ गहेजुवा, जाति सवनकी जान ॥ ७ ॥
हिरणाकुशरावणगयेकंसा । कृष्णगयेसुरनरमुनिवंसा॥ १ ॥
ब्रह्मागयेमरमनहिं जाना । बड़सबगये जो रहेसयाना ॥ २ ॥
श्रीकबीरजी कहै हैं कि हिरणाकुश रावण कंस मरिजात भये औ इनती-
नोंके मरवैया कालस्वरूप जे कृष्ण तेऊ मरजातभये दशौ अवतार निरंजन
नारायणै ते होइ हैं या हेतुते मरिजानवारे तीनिकह्यो मारनवारो एकहीकह्यो
औ सुर नर मुनि इनके बंशवारे तेऊ मरिगये औ ब्रह्मा आदिक जे बड़ेबड़े
सयानरहें वेऊ वेदको तात्पर्य न जान्यो मरिगये ॥ १ ॥ २ ॥
समुझिनपरीरामकीकहानी।निरवकदूधकिसरवकपानी ३॥
रहिगोपंथथकितभोपवना । दशौदिशाउजारिभोगवना॥४॥
रामकी कहानी कहे रामनामकी कहानि जो चारो बेदकहैंहैं सो काहूको न
समुझिपरी धौं निरबक दूधहीहै धौं पानिहीपानी है अर्थात् जिनको परमपुरुष
श्रीरामचन्द्र को ज्ञानभयो वेदको तात्पर्यबूझ्यो साहबमुख अर्थलगायो सोदूधही
( १२४ ) बीजक कबीरदास ।
पियतभयो औजो जगद्मुख अर्थमें लग्यो सोपानिहीपानी पियतभयो साहब मुख
अर्थ न जान्यो एते सबमरिगये ॥ ३॥ अपने अपने पन्थ चलावतभये जब पवन
थकितभयो कहे श्वासारहितभई तब दशौदिशा कहे दशौ इन्द्रिनद्वारके जे
देवता ते जातरहे तब दश द्वारको जो शरीरगाउँ सो उजारि ह्वैगयो कहै-मरिगये
याते या आयो कि जे नानामत चलावै हैं मतयहै रहिजायहै जा शरीरमें मरिकै
गये ताहीकी सुधि रहैहै ॥ ४ ॥
मीनजालभोई संसारा । लोहकिनावपषानकोभारा ॥ ५॥
याही रीतिते मरत जियत जे मीनरूप जीवहैं तिनको यहि संसारसमुँद्र में
बाणी जालफंदनको भयो सो जे जालमें फँदे ते तो अविद्याके जालमें फँदेही हैं
जे उबरे चाहैं हैं तेजड़वत् जोमन पाषाण तांहीको है भार जामें ऐसी जोअविद्या-
रूपी लोहेकी नाव तामें चढ़े सोवह बूड़िही जायगी फिरवही संसारमें
परे रहैहैं ॥ ५ ॥
खेवै सबै मर्म नहिं जाना । तहिबो कहै रहै उतराना ॥६॥
सब गुरुवाजन खेवै हैं कहे वही धोखाब्रह्ममें लगावै हैं औ या कहैहैं कि
हम मर्मजान्योहै तुम यामें लगौ पारह्वैजाउगे सोवह जो संसारसमुद्र में अविद्या-
रूपी नाव मन पाषाण ते भरी बूड़िही जायगी तामें गुरुचेला दोउ बूड़िही
जायँगे पार न पावैंगे अर्थात् वेदान्त आदि नाना शास्त्रनमें नाना तर्क उठाय
उठाय बिचार करतऊ जायहैं संकल्प बिकल्प नहींछूटै तात्पर्य तो जानै नहीं औ
जन्मभरि चेलापूंछतई जाय है परंतु तबहूं यही कहै हैं कि तुम संसार समुद्रमें
उतराने हौ कहे उबरेहौ यह नहीं विचारैहैं कि संकल्प बिकल्प छूटबइ नहीं
कियो संसारते कैसेउबरेंगे ॥ ६ ॥
साखी ॥ मछरीमुखजसकेचुवा, मुसवनमुंहगिरदान ॥
सर्पन माहँ गेहेजुवा, जाति सवनकी जान ॥ ७ ॥
जैसे मछरीके मुखमें केंचुआ मुसवानके मुहँमें गिर्दान अर्थात् जब मूस
गिर्दानको रंगदेख्यो तबलालमास अथवा लाल फल जानि धरनधायो जब फूंक
रमैनी । ( १२५ )
मारचो तब आँधरहैगयो गिर्दानहीं मूसकोखायलियो औ सर्प जैसे गहेजुवा कहैं
छुछूंदरको धरहै जो उगिलै तो आँधर हैजायहै खायतो मरि जाय ऐसे सब
जीवनकी जातिहै जे कर्मकांडीहैं ते जैसे मछरी केचुवाको जब खायहै तब
मुहँमें बंसी चुभिजायहै वाहीमें फँसिजायहै तैसे स्वर्गादिकफल की चाहकरि
कर्मकरैहै जनन मरण नहीं छूटैहै काल खायलेइ है औ जे ज्ञानकांडीहैं ते
साहबको ज्ञान तो काचोहै अपने शाखबल या कहैंहैं कि हम समुझायकै पाखं-
डमतवारे जे हैं तिनको अपने मतमें लै आवेंगे या बिचारि तिनके यहां गये सो
बे धोखा ब्रह्मरूप उपदेश फूंक ऐसा मारचो कि आंधरे है गये साहब को जौन
ज्ञानरहै सो भूलिगये तो उनके खाबेको पै वोई उलटिकै खायगे औ उपासना
कांडी जे हैं ते अपने अपने इष्टकी उपासना धरचो सोतौ छोड़तहीनहीं बनैहै
डरैहै कि देवता खफा न होइ आंधर न करिदेइ जो न छोड़ै तो वाही देवताके
लोकगये औ फेरिआये जन्ममरण नहीं छूटैहै जैसेसांप छुछूंदरको धरचो परन्तु
न उगलत बनै न लीलतबनै ताते कबीरजी कहैंहैं कि साहबको जानो जनन
मरण उनहीं के छुड़ाये छूटैगो ॥ ७ ॥
इति पैंतालीसवींरमैनी समाप्त ।
अथ छियालीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
बिनसै नाग गरुड़ गलिजाई । विनसै कपटी औ सतभाई १
विनसैपापपुण्यजिनकीन्हा।विनसैगुणनिर्गुणजिनचीन्हा२
बिनसैअग्निपवनअरुपानी । विनसै सृष्टिजहांलों गानी३
विष्णुलोक विनसै छनमाहीं । हो देखा परलयकी छाहीं ४
साखी ॥ मच्छरूप माया भई, यमरा खेलहि अहेर ॥
हरिहर ब्रह्म न ऊबरे, सुरनर मुनि केहिकेर ॥ ५ ॥
( १२६ ) बीजक कबीरदास ।
जेभर ब्रह्माण्डके भीतरहैं ते सब नाशमानहैं संसार समुद्रमें ऐसो माया
लपेट्यो कि यह मत्स्य( जीव )माया है गई अर्थात् मिलिगई है कहै जीवनको
शरीरमें डारिदियो है शरीरही देखपरैहै जीवको खोजनहीं मिलै है भीतर
बाहरमनमास आदिक वह जड़ मायहीदेखिपरैहै यमरा जो ढीमर कालहै सो
शिकार खेलैहै तातें कोईनहींउबरैहै कोईहालहीमरैहै कोईमहाप्रलयमें
मरैहै ॥ १ ॥ ५ ॥
इति छियालीसवीं रमैनी समाप्त ।
अथ सैंतालीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
जरासिंध शिशुपालसँहारा । सहस अर्जुनै छल सों मारा १
बड़छल रावणसो गये वीती । लंकारह कंचनकी भीती २
दुर्योधनअभिमानहिंगयऊ । पंडवकेर मरम नहिंपयऊ॥३॥
मायाके डिभगे सबराजा । उत्तम मध्यम बाजनवाजा ४
छांचकवैवितधरणिसमाना । यकौजीवपरतीति न आना ५
कँहलौं कहौं अचेते गयऊ । चेतअचेत झगर यकभयऊ ६
साखी ॥ ईमाया जग मोहिनी, मोहिसि सब जगधाइ ॥
हरिचन्द्र सतिके कारने, घर २ गये बिकाइ॥७॥
ये जे राजा बड़े २ गनाय आये तेसब मारेपरे कोई उत्तम कोई मध्यम
कोई निकृष्ट कर्मकारिकै गये सो कहांलौं मैं कहौं चित अचितके झगरा ते कहै
चिंत जीव अचित माया ई दूनौके संयोग ते सब जीव पृथ्वीमें मिलिगये
अपेन शुद्ध आत्माको न जानत भये यह माया जोहै जगमोहनी सोसब जगको
धायकै मोहिलेटभई हरिश्चन्द्र जेराजा हैं तेसत्यके कारणे विद्यामाया में बँधिकै
घर २ बिकाय जातभये पुत्र बिकानो स्त्री बिकानी ॥ १ ॥ ७ ॥
इति सैंतालीसवीरमैनी समाप्त ।
रमैनी । ( १२७ )
अथ अड़तालीसवीं रमैनी ।
चौपाई ।
मानिक पुरहिकबीर बसेरी । मदति सुनोशेष तकिकेरी १
ऊजो सुनी जमनपुर धामा । झूसी सुनी पिरनके नामा२
इकइसपीर लिखेतेहिठामा । खतमा पढ़ें पैगमर नामा ३
सुनिवोलमोहिरहा न जाई । देखि मकरवा रहे लोभाई ४
हवीव और नवीके कामा । जहँलों अमल सो सबेहरामा ५
साखी ॥ शेखअकरदी शेख सकरदी, मानहु बचन हमार॥
आदि अंत उत्पति प्रलय, देखो दृष्टि पसार॥६॥
प्रकट कबीरजी तो यह कहैहैं कि मानिकपुरमे रह्यो तहासे खतकी मदत
सुन्यो कि, जिन पीरनके स्थान ॥ १ ॥ जमनपुरमें सुन्यो ते झूसीपारमें आये
तहां मैंहूंगयों ॥ २ ॥ इकइसौ जे पीरहैं तिनकेनामलिखे हैं कि ये सब पैगंब-
रैकेर फांतियां देइहैं औ कलमा पढ़ैहैं ॥ ३ ॥ सो उनके बोलसुनि २
मोपै नहीं रहाजाय है मकरवा देखि २ ये सब भुलायरहे हैं यह जानिकै तहां
मैं जाइकै कह्योकि ॥ ४ ॥ हवीकहे देवतनको खाना अथवा हवीब कहे
फारसीमें दोस्तकोकहैं हैं औजहां भर नामहै नबीके जे तुम लेतेहौ औनबीके
जहांभर कामहै जे पीरलोग तुमको उपदेश करतेहैं सो सब हरामहै काहेते
अल्लाह तो मनवचनके परेहै ॥ ५ ॥ हे शेख अकरदी हे शेखसकरदी
हमारा कहो जो बचनहै सो सब सांच मानो आदि अंतमें जो दृष्टि
पसारिकै देखो तो जहांभर मनबचनमें पदार्थ आवै हैं सो सबमाया को
पसारहै अल्लाह नहीं है सो कबीरजी के चौबिसपरचैसे. खत केलिखे पीछे
शिष्य भये सो सब कथा निर्भय ज्ञानमें बिस्तारते हैं ॥ ६ ॥
इति अड़तालीसवीं रमैनी समाप्ता ।
( १२८ ) बीजक कबीरदास ।
अथ उनचासवीं रमैनी ।
चौपाई ।
दरकीवात कहौ दुर्वेशा । वादशाह है कौने भेशा ॥ १ ॥
कहां कूच कहँकरै मुकामा।कौनसुरतिकोकरौंसलामा ॥२॥
मैंतोहिं पूंछौं मुसलमाना । लाल जर्दकी नाना बाना ॥३॥
काजीकाज करौ तुमकैसा। घर २ जबै करावो वैसा ॥ ४ ॥
बकरीमुर्गीकिनफुरमाया।किसकेहुकुमततुमछुरीचलाया५॥
दर्द न जानै पीर कहावै । वैता पढ़ि २ जग समुझावै ॥६॥
कहकवीरयकसय्यदकहावै।आपुसरीका जगकबुलवै ॥७॥
साखी ॥ दिन भर रोजा धरतहौ, राति हततहौ गाय ॥
यहतौखून वहबंदगी, क्योंकर खुशीखोदाय ॥८॥
और पदको स्पष्टही है ॥ १ ॥ २ ॥ ३ ॥ ४ ॥ ५ ॥ दर्दतो तिहोरें
दिलमें आती नहीं है गला कटावतमें अल्लाहको बागीचा खराब करतेहौ अरु
बैतें पढ़ि २ के पीरकहावतेहौ औजगत् को समुझावतेहौ अर्थात् हौ बेपीर पीर-
भर कहवावतेहो॥६॥सोकबीरजी कहैं कि एक सय्यदजोहै वह पीर गुरुवा सों
जैसा आप खुआरहै औ तैसे सबको खुआरकरै है ॥७॥ दिनको तो रोजा धरते
हौ औ बंदगी करतेहौ औ रातिको गाईहततेहौ कहे मारतेहौ सो यह तौं
खूनकरतेहौ बहुतभारी औ वहबन्दगी बहुतथोरी करतेहौ दिनको न खायो राति-
हीको खायो क्योंकर तिहारेऊपर खोदाय खुशी होय ताते यह कि वह तौ
साहबको है सो जिनको गला तुम काटतेहौ तिनहीं के हाथ तुम्हारऊ गला
वह साहब कटावेंगे ॥ ८ ॥
इति उनचासवीं रमैनी समाप्त ।
रमैनी । ( १२१ )
अथ पचासवीं रमैनी ।
चौपाई ।
कहतेमोहिंभयलयुगचारी।समुझतनाहिंमोहसुतनारी ॥ १ ॥
वंशआगिलागि वंशैजरिया।भ्रमभुलाय नरधंधेपरिया ॥२॥
हस्तीके फंदे हस्ती रहई । मृगी के फंदे मिरगा परई ॥ ३ ॥
लोहै लोह काटजसआना।तियकैटत्त्व तियापहिंचाना॥४॥
साखी ॥ नारि रचंते पुरुष है, पुरुष रचंते नार ॥
पुरुषहिपूरुष जो रचै, तेहि विरलेसंसार ॥ ५ ॥
चारिउ युग मोको समुझावत भयो पै सुत नारीके मोहतेकोई समुझत नहीं
है ॥१॥ जैसे बांसकी आगी बांसैको जारिदेईहै तैसे सुतनारीके मोहरूप भ्रममें
भुलायकै नरधंधेमें परे जाइ हैं कोई नाना ज्ञान उपासनामें परिकै जरैहै कोई
सुतनारीके धंधेमे परिकै जरैहै ॥२॥ जैसे हथिनीके फंदेहाथी रहैहै मृगीके फंदे
मृगा परै है कहे फँदिजायहै ऐसे जीवके फंदमें जीवपरैहै । जैसे लोहते लोह
कटिजाय है तैसे जीवहीते जीव यहमारो परैहै। तियकी तत्त्व स्त्री पहिचानैं स्त्री
जो ऊंटिनी ताकी तत्त्व वही जानैहै । अर्थात् जीवही ते जीव भ्रमिजायहै । काहेतें
साहबको तो जानैनहीं जीव जीवही मों विश्वास मानै मायामें मिलिकै या जीव
मायाही में रह्यो है ताते मायाकेही पदार्थमें बिश्वास मानैहै ॥३॥४॥ नारीतें
पुरुष रचिजाईहै कहे मायाते सब पुरुष भये हैं औ पुरुष जोहै शुद्धसमष्टि जीव
ताहीते मायाभई है । औ पुरुष जो हैं शुद्धजीव सोपरमपुरुष जे श्रीरामचन्द्रहैं
सबके बादशाह तिनमें रचै कहे प्रीतिकरै ऐसो कोई विरलाहै ॥ ५ ॥
इति पचासवीं रमैनी समाप्त ।
९
( १३० ) बीजक कबीरदास ।
अथ इक्यावनवीं रमैनी ।
चौपाई
जाकरनाम अकहुवाभाई । ताकर कही रमैनी गाई ॥ १ ॥
कहैको तात्पर्य है ऐसा । जस पन्थी वोहित चढ़िवैसा ॥ २ ॥
हैकछुरहनिगहनिकीबाता । बैठारहत चला पुनिजाता ॥ ३ ॥
रहैबदननहिंस्वागसुभाऊ। मनस्थिर नहिं बोलैकाऊ ॥ ४ ॥
साखी ॥ तनरहते मन जातहै, मनरहते तनजाय ॥
तनमन एकै ह्वैरह्यो, हंस कबीर कहाय ॥ ५ ॥
जाकरनाम अकहुवाभाई । ताकर कहीरमैनी गाई ॥ १ ॥
जाको नाम अकह है ताको तौ हिन्दू मन बचनकेपरे कहते हैं औ मुसल-
मान बेचिगून बेनिमून कहतेहैं । सो हम पूछते हैं "हिन्दूकहै कि,
वह तो निराकार होतो तौकहैंहैं कि, वेद मेरी श्वासहै शरीर न होतो तौ वेद-
श्वास कैसेहोतौ । जोकहोवेद तो मायकहें 'साकार है तौ' मिथ्याके बताये तुम्हीं
सांच पदार्थ कैसे जानिहौ । जो कहे साकार तौ मध्यम परमान ठहरा य तौ
अनित्य होइहै अकहुवा न होइगो । अरु जो मुसलमान निराकार कहैहैं कि उसके
आकार नहीं है तो मूसा पैगंबरको कोहनूरकें पहाड़ में हुँगुनी दिखायो सो वह
पहाड़ छार द्वैगयो जो शरीर न होतोतौ छुगुनी कैसे देखावतो । कुरानमें लिखैहै
कि जिंसतरफ़ अपनामुंह फेरै तिसी तरफ़ साहबका मुँहहै, औ सबके हाथके
ऊपर अल्लाहको हाथहै, औ अल्लाह महम्मदसों कहतेहैं कि, "जिसका हाथप-
करातूने तिसका हाथपकरा मैंतब सों इनडौलौंतै यहआवताहै" कि, उसके शक-
लहै । पै जिस तरहकीशकल सोकोईनहीं कहिसकैहै काहेते कि जो उसके मिसाल
दूसरा कोई होय तौ उसकी उपमादैके समुझाय सक्के सो उसकी शकल तो
कोईनहीं समुझाय सक्ता है । लेकिन जो कोई उसकी शकल देखा है सोई जानताहै ।
रमैनी। ( १३१ )
नैसी उसकी शकलैहै लेकिन बयान नहीं कर सक्ताहै। औ कुरान खोदाको कलाम
कहैवात है जो बदन न होता तौ कलाम कैसे कहते। सो निराकार साकार के परे अकह
जो साहब है ताकी रमैनी कहे तिसके रूपादि बर्णनकी कथा जबानमें किस तरहसे
कहौ, बचनमें तौ आवै नहीं है । अथवा जाकर नामैंअकहुवाहै ताकोरूप अकहुवा-
बनैहै तिसकी कथाकहांहै । जोवाहूअकहुवा होयगी जो ऐसाभया तौ जानि न
परैगो किसूको मिथ्या होयजाइगो । तौनैको कबीरजी कहै हैं कि सबको हमको
अकहुवा है कछू उसको साहबको कोई बात अकहुवा नहीं है हमताहीकी कही
रमैनीगाइतहै सोजोकछुरमैनीमेंलिख्योहै सो सांचीहै ॥ १ ॥
कहै को तात्पर्यहै ऐसा । जस पंथीवोहित चढ़िवैसा ॥ २ ॥
हैकछुरहनिगहनिकी बाता । बैठारहाचलापुनिजाता ॥ ३ ॥
जौनकहि आये तौनेको तात्पर्य ऐसाहै कि पांचशरीरते साहब नहीं मिलैहै
काहेते मनबचनके परैहैसाहब है औ जोहमसों साहब कहा कि जीवनको रमैनी
उपदेश करौ ताको हेतुयह है साहब बिचारयो कि मनवचकेपरे जो मैंहौं सों
बिनामेरे बताये जीव मोको न जानेंगे जोकहै। साहबको कापरी है न जानेंगे
नहींतौ साहबके दयालुताकी हानिहोइहै याते उपदेशकरै कहै हैं सो जौने अकह
रामनाम के जपेते साहब प्रसन्नहै हंसरूपदेइहै तौने रामनाम रमैनी ते जानिहै
काहेते कि ॥ (इच्छाकरभवसागर वोहितरामअधार । कहहिं कविरहरि शरणगहु
गोबच्छखुर बिस्तार) ॥ ऐसी साखीरमैनी में लिखी है तेहिते या अर्थ आया कि
संसारसागर पारहोवैको एक रामनामही जहाजमानि नामार्थ में जोशरणकीबि-
धिहै ताको अनुसंधानकरत रामनामजपै ॥२॥ यहरहनि गहनिकैकै जैसे वछवा
को खुरलोग उतरिजायहै ऐसो संसारसागरमें रामनामको अभ्यासकै तरिजाय हैं
कैसे जैसे नावकोचढ़ैया नावमेंबैठाहै पै पारहोत जायहै ऐसे रामनामको जपैया
संसारसागरमें बैठा देखो परैहै परन्तु पारको चलो जायहै ॥ ३ ॥
रहैवदननहिंस्वागसुभाऊ । मनंस्थिरनहिंबोलैकाऊ ॥ ४ ॥
इसतरहके जेहैं जिनकेबदनकहे संभाषण करिबे ते जीवनको स्वागकोसुभाऊ
कहे ब्रह्मह्वैजावो चतुर्भुजादिकनके लोकमें जाइचतुर्भुज हैजावौ और नानादेवतन्
( १३२ ) बीजक कबीरदास ।
के लोकजाय तिनके तिनके रूपधरिबो सो मिटिजायहै।संसारतो छूटि ही जायहै
सो वे बोलै हैं औ मन स्थिरह्वैगयो है कहेमनको संकल्प बिकल्प तो छूटैनहीं
है मनते भिन्न ह्वैवो कहा है कि संकल्प बिकल्पही मनको स्वरूपहै जब संकल्प
बिकल्प छूटिगयो तब मनते भिन्न ह्वै गयो सो कैसे मनते भिन्नहोइगो सो साध-
न आगे कहैहैं ॥४॥
साखी ॥ तनरहते मनजातहै, मन रहते तन जाय ॥
तन मन एक ह्वैरहो, हंस कबीर कहाय ॥ ५ ॥
तनजोहै वा शरीर स्थूल सूक्ष्मकारण महाकारण सोअर्थअनुसंधान करत
रामनाम जपत २ तनते जब रहित ह्वैगयो तब मन जातरहै है औ मन जाय
है तब चारिउशरीर जात रहैहैं । सो जब तनमन एकह्वैरहै कहे सिगरें
तन प्राणमें बंधे हैं सो प्राण औ मनको एकघर करिदैसोनाम जपिविधिजानि-
तवसंकल्प बिकल्प मनको छूटिजाय है। मनतो संकल्प बिकल्परूपहै सो जब-
संकल्प बिकल्पछूट्यो तब मननाश ह्वैगयो । तब चारिउशरीरको हेत जोहै ज्ञान
सोऊ जातरहैहै तब चारिउ शरीर भिन्नह्वैजायहैं एक शुद्धआत्मा में स्थिर ह्वैरहैं
हैं मुक्ति ह्वैजाय हैं जैसे पूर्वशुद्ध समष्टिरूप में रह्योहै तैसे सो ह्वैगयो। जैसे सम
ष्टिजीव जब रह्यो है तब जगत् को कारणरह्यो आयो है साहबको न जानिबो
रूप ताते संसारही ह्वैगयो है तैसे यह जो शरीरनमें साहबको भजन करिराख्यो
सो जब मनादिक याकेछूटि गये शुद्ध ह्वैगयो तब वाही भांति साहब को जानैं
को कारण रहिगयो। काहेते कि राम नामको अर्थ साहब मुख जानिराख्यो है
सो मङ्गल में साहब कहिआये हैं कि जो रामनाम जपिकै मोको जानै तो मैं
हंसरूपदै अपने पास बुलाइलेऊं।याहीते साहब हंस रूप देइ है तब वह काया-
को बीरजीव हंस कहावैहै। कैस हंस कहावैहै कि असारजेहैं चारिउ शरीर औ
मन माया रूप पानी ताको छोड़िदियो औ सारजोहै साहबको ज्ञानरूपदूधता-
कोग्रहणकियो औ अकह रामनाम जो मोती है ताको चुनन लग्यो कहे लेन-
लग्यो सोकबीरजी लिखबै कियो है शब्दमें (निर्मल नामचुनि चुनि बोले) अरु-
अकह रामनामहै अरु अकह निर्गुण सगुण के परैहै श्रीरामचन्द्रई हैं तामें
रमैनी । ( १३३ )
प्रमाण ॥ ( रामकेनामतेपिंडब्रह्मांडसब रामकोनाममुनिभर्ममानी । निर्गुण-
निरंकार के पार परब्रह्म है तासुको नामरङ्गारजानी । विष्णुपूजाकरै ध्यान-
शङ्करधरै भनहि सुविरंचि बहुबिबिध बानी । कहैकबीर कोइ पारपावैनहीं
राम को नामहै अकह कहानी ) ॥ ५ ॥
इति इक्यावनवीं रमैनी समाप्त ।
अथ बावनवीं रमैनी ।
चौपाई ।
ज्यहिकारणशिवअजहुंवियोगी।अङ्गविभूतिलायभेयोगी १
शेषसहसमुखपार न पावैं । सोअबखसमसहितसमुझावै२॥
ऐसीविधिजोमोकहँध्यावै । छठयें मास दर्श सो पावै॥ ३ ॥
कौनेहुं भांति दिखाई देऊ। गुप्तै रहि सुभाव सब लेऊ॥४॥
साखी ॥ कहहिं कबीर पुकारिकै, सबका उहै हवाल ॥
कहाहमार मानै नहीं, किमिछूटै भ्रमजाल॥ ५ ॥
ज्यहिकारणशिवअजहुंवियोगी।अंगविभूतिलायभेयोगी १॥
शेषसहसमुखपारनपावै।सोअबखसमसहितसमुझावै॥ २ ॥
जाकेकारण शिवअंगमें बिभूतिलगाइकै योगीभयेपरन्तुअजहूँलौं बासों बियो-
गी हैं काहेते कि जोबियोगी न हो ते तो तमोगुणाभिमानी काहे रहते॥ १॥औ
शेष सहस मुखते कहिकै पार न पायो तेई दुर्लभ खसम जे परमपुरुष श्रीराम-
चन्द्रहैं ते हिते सहित जीवनको समुझावैहैं काहेते जीवनको हित मानिकै समु-
झावै है कि मोको जानिकै मेरे पासआवै संसार दुःख न पावै ॥ २ ॥
ऐसीविधिजो मोकहँध्यावै । छठयें मास दर्शसोपावै ॥ ३ ॥
कौनेहुंभांति दिखाईदेऊ । गुप्तैरहि सुभाव सबलेऊ ॥ ४ ॥
( १३४ ) बीजक कबीरदास ।
साहब कहा समुझावैहै कि जैसो पूर्व कहिआये हैं ( नामार्थमें लिखि आये हैं
शरनकी विधि ) तैसो अनुसंधान करत रामनाम जपिकै निरंतर जो छठयें मास
या होइतौ जो या शरीरते करैहै छामहीनामें दर्शन सो पावैहै याही भांतिसों जौं
मोकोध्यावै तौ छठयेंमास मेरोदर्शन पावै कहे छठौ जो हंस स्वरूप तामें स्थिर
ह्वैजाय ॥ ३ ॥ तौ कौनेउभांतिसों मैं देखाइ देउहौं औ निशिदिन वाके साथ
गुप्तराह्निकै वाको सब सुभावलेउ औ जो दृढ़होइ तौ राम नाम कासाधक
ताको छठौ शरीर दैके वाको प्रत्यक्ष ह्वैजाउ पाछे २ रघुनाथजी नित्य बनेरहत-
हैं तामें प्रमाण॥ ( रामरामेतिरामेतिरामरामेतिवादिनम् । वत्सङ्गौरिवगौर्य्यर्व्या-
धावंतमनुधावति ) ॥ ४ ॥
साखी ॥ कहहिं कवीरपुकारिकै, सबका उहै हवाल ॥
कहा हमरमानै नहीं, किमिछूटै भ्रमजाल ॥ ५ ॥
श्री कबीरजी पुकारिकै कहैं हैं कि जिनको शेष शिवादिने पारनहीं पायो
यह भांतिके दुर्लभ जे परमपुरुष श्रीरामचन्द्र हैं ते आजुकाल्हि ऐसे सुलभह्वै
गयेहैं कि आपई उपाय बतावै हैं कि जो ऐसो उपायकरैं तो छठयें शरीर में
मोको पाइजाईं ते साहबको कह्यो मैं कतनो समुझावतहौं पै सब बेवकूफ हैं
जीवन को हवाल उहैहै कहे वही मायाके नानामतनमें लगेहैं वहीको बिचार
करैहैं जौन धोखाते संसार पायोहै हमारो कह्यो यतनेहूपै नहीं मानैहै सो ऐसे
दुष्ट जीवनको भ्रमजाल कैसेछूटै ॥ ५ ॥
इतिबावनवीं रमैनी समाप्त ।
अथ तिरपनवींरमैनी ।
चौपाई ।
महादेव मुनि अंत न पावा । उमासहित उन जन्म गँवावा १
उनते सिद्ध साधु नहिंकोई । मन निश्चल कहु कैसेहोई २॥
जौ लग तन में आहै सोई । तौलग चेत न देखौ कोई३॥
रमैनी । (१३६)
तबचेतिहौजबतजिहौप्राना । भयाअन्ततवमनपछिताना ४
यतनासुनतनिकटचलिआई।मनकोविकार न छूटैभाई ५॥
साखी ॥ तीनिलोकमें आयकै, छूटि न काहू कि आश॥
यकआंधर जग खाइया,सवजग भया निराश ॥६॥
उनते अधिक सिद्धिकौन साध्योहै जाको मन निश्चल होइ अर्थात् सिद्धिसा-
धे मन निश्चल नहीं होयहै ॥ २ ॥ जबलग शरीरमें मनहै तबलग चेतन करिकै
अथवा महादेव जे हैं औ बड़े बड़े मुनिजेहैं ते अंतनहीं पायो जो कोऊ
जान्योहै ते वोही साधन तेजान्योहै कहे ज्ञान करिकै वह परम पुरुषको कोईनहीं
देखै हैं ॥ ३ ॥ कबीरजी कहैहैं कि तुम तब चेतिहौ जब प्राण छोड़ोगे ? तब-
कहां चेतौगे यह याकु भाव है जब अनतही जाई शरीर पावोगे तब मनको पछि-
तावई रहिजायगो जो भया अयान पाठ होइ तौ यह अर्थहै कि तुम जो अया-
नेभये साहबको न जान्यो हमारकहा मानवई न कियो तौ अब पछिताना क्याहै
पछितातो काहेकोहै संसार पीर सहो ॥ ४ ॥ यह सब जगत् शास्त्रनम सुनाहै
कि मौत निकट चलीआवै है हमहूं मरिजावेंगे पै मरघट ज्ञान कथैहै मनकों
विकार नहीं छोड़ैहै ॥ ५ ॥ तीनि लोकमें आइकै सब मरिगयो परन्तु काहूकी
आशा न छूटतभई एक आंधरजोहै मन सोजगत्को खाइलयो सब जगत्
परमपुरुषके मिलिबेको निराश ह्वै गयो । इहां आंधर कह्यो सो मन परमपुरुषको
कबहूंनहीं देखैहै काहेतेकि साहबमनबचनकेपरै है आपही शक्तिदइहैजीवकों
तबहींदेखैहै ॥ ६ ॥
इति तिरपनवीं रमैनी समाप्ता ।
अथचौवनवीं रमैनी ।
चौपाई ।
मरिगयेब्रह्माकाशिकेबासी । शीव सहित मूये अविनासी १
मथुरा मरिगयेकृष्णगुवारा। मरि मारि गये दशौ अवतारा २
गरिमीरगयेभक्तिजिनठानी। सगुणमें जिन निर्गुण आनी ३
?
Wait, there are TWO vertical strokes?
Let's zoom in on "नार्रसिंहाद्यनेकधा":
न + ा = ना
Then: an upright glyph: it looks like 'र' with a repha: 'र्र'? Or is it 'सिं' with repha: 'र्fields'?
Wait, the letter after 'ना' has a circle/loop, like 'र' or 'सि'?
Wait! It has 'ि' matra!
Ah, the 'ि' matra of 'सिं' has a repha on it, or wait:
Letter 1: ना
Letter 2: र
Letter 3: सिं (with anusvara)
Wait, why is there a repha? It looks like "नारसिंह"! Wait, is there a repha on 'र'? Yes, it looks like "नार्रसिंहाद्यनेकधा" or "नारसिंहाद्यनेकधा"?
Look at the top: there is an anusvara dot, and a curved stroke?
Wait, the curved stroke is above the 'ि' matra of 'सिं'!
Ah, it's just the 'ि' matra of 'सिं'!
Wait, then what is the letter between 'ना' and 'सिं'?
It is 'र'!
So: 'ना' + 'र' + 'सिं' + 'हा' + 'द्य' + 'ने' + 'क' + 'धा' = "नारसिंहा
रमैनी। ( १३७ )
अथ पचपनवीं रमैनी।
चौपाई।
गये राम अरुगये लक्षमना। संग न गै सीताअसधना १
जातकौरवनलाग न बारा। गये भोज जिन साजल धारा२
गै पांडवकुन्तीसी रानी गैसहदेव जिन मति बुधि ठानी३
सर्व सोनेकै लंक उठाई। चलत बार कछु संग न लाई४
कुरियाजासु अंतरिक्ष छाइ। हरिचन्द्र देखिनहिं जाई ५
मूरुख मानुष अधिक सजोवै।अपना मुवल औरलगिरोवै६
इ न जानै अपनो मरि जैबै। टका दश विढ़ै और लै खैबै७
साखी॥ अपनी अपनी करि गये, लागिन काहूके साथ॥
अपनी करिगयो रावणा,अपनी दशरथ नाथ॥८॥
गयेराम अरुगये लक्षमना। संगनगै सीता असिधना ॥ १॥
देवतन मुनिनको कहिआये हैं अब राजनको कहै हैं काहेते कि, आगे दश-
अवतार कहिआये हैं इहां पुनि राम कहै हैं तहां इहां जे जीव राम राजा भये
ताको औ लक्ष्मणको महाभारतसभापर्वमें नारद युधिष्ठिरते कह्योहै राजनके
गिनतीमें यमकीसभामें। तिनको कहैं कि, रामगये लक्ष्मणगये औ संगमें सीता
असनारी न जातभई। जो यह अर्थ कोई न मानै तौयह कहै हैं कि, नारायणके
अवतार रामचन्द्रहैं तिनहीको जाइबो कबीरकहै हैं तौ कबीरजी तौ सांचके
कहवैया हैं झूठी कैसे कहेंगे सब रामायणम बर्णन है कि प्रथम जानकी शरीर
ते सहितगई हैं पुनि श्रीरामचन्द्र शरीरते सहित जातभये जिनके संग श्रीशक्ति
भूशक्ति लीलाशक्ति शरीरैं सहित चलीजातीहै सो जो कबीरजी व राजा
ने भये हैं तिनको जाइबेको न कहते तौ संगमें सिया असि धना न गई यह
कैसे लिखते ॥ १ ॥
( १३८ ) बीजक कबीरदास ।
जातकौरवनलागिनवारा गयेभोजजिनसाजलधारा ॥ २ ॥
गेपांडव कुंतीसी रानी । गेसहदेवजिनमति बुधिठानी ॥३॥
सर्वसोनेकी लंक बनाई । चलत बारकछुसंग न लाई ॥४॥
औ कौरवनको जातवार न लग्यो औराजाभोजगे जिनधारानगरीको बसायोहै
कहे साज्यो है भोजके कहेते कलियुगके राजा सब आयगये ॥ २ ॥
औ पांडवानैहैं औ कुन्ती ऐसी रानी जो है औ सहदेव जैहैं ते सब जातभये
जेपण्डितहैं तिनहूं में अपनीमति कहे बुद्धि अधिक ठानतभये कहे करतभये ॥३॥
औ सब लंका सोनेकै रावण बनायो पै चलतवार संगमें न गई ॥ ४ ॥
कुरियाजासुअंतरिक्षछाई । सोहरिचन्द्रदेखिनहिंजाई ॥ ५ ॥
औ जाकी कुरिया अंतरिक्षमें छाईहै कहे स्वर्गमें महलबनोहै इन्द्रते अधिक
सिंहासनमें बैठतेंहैं ऐसेजैनैहैं हरिश्चन्द्र राजा तेऊनहीं देखिपरे हैं अर्थात् तेऊ न
रहिगये मरिगये भावयह है कि महा प्रलय भये त्रैलोकमें कोई नहीं रँहिजाईहै॥५॥
मूरखमानुषअधिक सजोवै । अपनामुवलऔरलगिरोवै॥६॥
इ न जानै अपनो मरिजबै । टका दशबढ़े औरलैखैवै ॥७॥
मूरख जो मनुष्यहै सो संजोवै कहे अधिक सम्यक् प्रकारते जोवै है अर्थात्
और को मरिबो कहे आजा मरिगयो बाप मरिगयो इत्यादिक सबको मरिबो
देखतई जायहैं औ रोवै हैं अपने मरनकी चिन्तानहीं करैहैं॥६॥ या नहीं जानैहैं
कि जेतेदिन बीतिगये जेतेने मारिगये और मरिही जायँगेय है बिचारै हैं कि
और दशतका बढ़ैं जाते बहुतदिन बैठेखायँ ॥ ७ ॥
साखी ॥ अपनी२ करिगेये, लागिनकाहुकेसाथ ॥
अपनीकरिगयो रावणा, अपनीदशरथनाथ ॥ ८ ॥
जीतिजीति पृथ्वी सबै अपनी अपनी करिकै गये यशी दशरथराजा ते अधिक
कोई न भयो जाकी सब प्रशंसा करैहैं उनके सुकृतको यश जगतही में रहिगयों
उनके साथ न गयो औ अयशीरावणते अधिक कोई न भयो जाकी सब निन्दाकरै
हैं जाके दुष्कृतको अयश जगतहीमें रहिगयो ॥ ८ ॥
इत पचपनवीं रमैनी समाप्त ।
रमैनी । ( १३९ )
अथ छप्पनवीं रमैनी ।
चौपाई ।
दिनदिन जरै जरलकेपाऊ । गाड़े जाइ न उमगै काऊ ॥१॥
कंध न देइ मसखरी करई । कहुधौंकौनिभांतिनिस्तरई ॥२॥
अकरमकरै करमको धावै । पढिगुणि वेद जगतसमुझावै ॥३॥
छूछेपरे अकारथ जाई । कह कबीर चितचेतहु भाई ॥ ३ ॥
दिन दिन जरैजरलकेपाऊ । गाड़ेजाइ न उबरै काऊ ॥१॥
कबीरजी कहैहैं कि जे रोजरोज ज्ञानाग्नि करिकै कर्मकोजारै हैं अपने
जीवत्वको जारैहैं किं हम ब्रह्म हैजायँ सो जरल के पाउ कहे न काहूके कर्मही
जरे न कोई ब्रह्मही भयो । अथवा जरलके पाऊ कहे जारिगये हैं कर्म जाकों
अर्थात् कर्मही नहीं है ऐसो जोब्रह्म ताकोको पायो है? अर्थात् कोई नहीं पायो है ।
जो कहौ जड़भरतादिक पायो है तौ वेजो ब्रह्मही है जाते तौ दूसरो मानिकै
[L
( १४० ) बीजक कबीरदास ।
न किये कि भलेलगेहैं तुम मसखरी किये कि जो तुमहूं अहंब्रह्मास्मि मानौ तौ
तुमको अनेक प्रकारकी ऋद्धिसिद्धि प्राप्त होइ है साहब को ज्ञान छोड़िदेहु या
भांति समुझाय नरक में डारिदिये ॥ २ ॥
अकरमकरैकरमकोधावै । पढिगुणवेद जगतसमुझावै ॥३॥
छूंछे परै अकारथ जाई । कह कबीर चितचेतहु भाई ॥४॥
कैसेहैं वे गुरुवा लोग करत तो अकरममतहैं किहमको करमत्यागहै हम संन्या-
सी हैं हम ज्ञानी हैं औ करम करिबेको धावै हैं औ वेदको पढ़ि गुनिकै जगतकों
समुझावै हैं कि, निष्कर्महोउ चाहैते सब विकारहै चाह छोड़िदेउ औ आप
भायाके लिये बजारमें झगरै हैं सो उनके कहे जीवनको कैसे समुझिपरै ॥ ३॥
उनको उपदेश अकारथई जायहै औ जो सुनै है सो छूंछई परैहै अर्थात् कछू-
वस्तु हाथ नहीं लगै है सो कबीरजी कहै हैं कि, हे भाई ! चित चेत करो
जेहिते कनककामिनी रूप मायाते औ धोखाब्रह्मते बचिजाउ ॥ ४ ॥
इति छप्पनवीं मैनी समाप्त ।
अथ सत्तावनवीं रमैनी ।
चोपाई ।
कृतियासूत्रलोक यकअहई।लाख पचासके आगे कहई॥१॥
विद्या वेद पढै पुनि सोई । वचन कहत परतक्षै होई ॥ २ ॥
पहुंचि बात विद्या के वेता।वाहु के भर्म भये संकेता ॥ ३ ॥
साखी ॥ खग खोजनको तुमपरे, पीछे अगम अपार ॥
विन परचै किमि जानिहौ, झूठाहै हंकार ॥ ४ ॥
कृतियासूत्रलोकयकअहई । लाखपचासकेआगेकहई ॥ १ ॥
कृतिया कहे यह कृत्रिम जो है कर्म अहंब्रह्म मानिबो सो यहलोक में
एक सूत्रके बरोबरहै कहेरस्सीकेबरोबरहै जीवनके बांधिबेको । मंगलमें कहि