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जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished110 पृष्ठ

चेतावनी ३६
छूटि मैलं होय निर्मल, नूर नीर अन्हाव ।
जगजीवन निर्बान होवै, मिटै सब दुचिताव ॥ ४ ॥
॥ शब्द २१ ॥
आपु ते डारत आपु नसाई ।
कहूँ बिबाद कीन्ह भक्तन ते, पांछे मन पछिताई ॥ १ ॥
काहू क दोष देइ नहिं कोई, धाइ जरै जो जाई ।
साधु बिबेकी दाया राखत, रामहिं दरद न आई ॥ २ ॥
गर्व-प्रहारी गुमान न राखै, करै जानि जो जाई ।
रावन औ हरनाकुस मारा, कछू बिलम्ब न लाई ॥ ३ ॥
नर केतान कवनि गिनती यहँ, कीट कि नहिं समताई ।
जो भक्तन ते बैर कियो है, अंत रसातल जाई ॥ ४ ॥
नहिं मानै तौ बूझति ले मन, कहत अहौं गोहराई ।
जगजीवन जे दीन लीन मन, तिन पर सदा सहाई ॥ ५ ॥
॥ शब्द २२ ॥
दुनियाँ पार परिपंच न जानी ।
नहिं नय चलहि गुमान लादे, बोलहिं बिष रस बानी ॥ १ ॥
सिद्ध साध कै निंदा करि, नहिं

४० जगजीवन साहब की बानी
थिर ह्वै कोउ रहै न पाइहि,
इहाँ बसेरा है दिन चारि ।
अइहैं दूत बाँधि लै जैहैं,
कोऊ नाहीं लगहि गोहारि ॥ २ ॥
दौलत धाम छूटि सब जाइहि,
छुटिहैं मातु पिता सुत नारि ।
जगजीवन गुरु-चरन गहे रहु,
गाढ़ परिहि तौ लेहैं उबारि ॥ ३ ॥
॥ शब्द २४ ॥
यहि जियने का करु न गुमान ॥ टेक ॥
उतहि जन्म पाय नर देही,
भजन बिना को नहि पछितान ।
दौलत धाम देखि कै भूल्यो,
बिसरि गयो वह पाछिल ज्ञान ॥ १ ॥
ना थिर रहे नहीं थिर रहिहै,
जाइहि अंत करि सबै पयान ।
सेन समेत रावन गे छिन महँ,
तिनहूँ के कछु रह्यो न निसान ॥ २ ॥
अन्त काल सब कछु चलि जाइहिं,
चलि जैहे ससि-गन अरु भान ।
जगजीवन सब कछु चलि जाइहि,
रहिहै इक सत नाम निदान ॥ ३ ॥
॥ शब्द २५ ॥
मनुवाँ समुझि करहु तेवान१ ।
जब तुम आयहु साई पठवा, अब कस भयो हैवान ॥ १ ॥
(१) फिकूर ।

चेतावनी ४१
तब कोउ संग साथ नहिं कोऊ, जग आयहु निरबान ।
अब हित लागि चाखि बिषया फल, फिरत अहहु बौरान ॥ २ ॥
भरमत फिरत नहीं थिर बैठत, बिसरि गयो अस्थान ।
नाहीं सुद्धि पाछिली आवत, ता तें भयो गुमान ॥ ३ ॥
हो सचेत अब जागि उलटि कै, निर्गुन करु पहिचान ।
जगजीवन जुग जुग हहु संगी, सतगुरु चरन प्रमान ॥ ४ ॥
॥ शब्द २६ ॥
सत्त नाम बिना मन कैसे पार तरिहौ ॥ टेक ॥
महा कठिन भर्म जार सूझै नहिं वार पार,
कहौ काह करिहौ ।
जुक्ति करहु चरन सरन लागि पागि,
नहिं तौ फाँसि परिहौ ॥ १ ॥
जे जे जग आये कोऊ नाहिं बाचे,
धीरज कौन धरिहौ ।
जोगी जती सिद्ध साध,
कोऊ नाहिं रहिहौ ॥ २ ॥
मिलि गये अमर भये ते जगत आस,
चित्त ते सब दहिहौ ।
जगजीवन दास गुरू पास,
जुगन जुग संग रहिहौ ॥ ३ ॥
॥ शब्द २७ ॥
अरे मन समुझि बूझहु ज्ञान ।
भजहु अंतर मगन है कै, होउ नहिं हैरान ॥ १ ॥
नाहिं वार औ पार है, करि जात नाहिं बयान ।
रच्यो रचना जानि कै, अस अहैं कृपानिधान ॥ २ ॥
६

४२ जगजीवन साहब की बानी

यहि भाँति ते सुख पाइहौ, नाहिं होइ है तुकसान ।
देखु नैन पसारि कै, कोउ नहिं अहै अजान ॥ ३ ॥
रहु दीन लीनं चरन ते, तजि देहु गर्ब गुमान ।
दिन चारि का जग है बसेरा, अन्त खाक समान ॥ ४ ॥
मरहु जीवत जियहु कछु दिन, मौत अहै निदान ।
जगजीवन ते अमर भे, गुरु चरन मन लिपटान ॥ ५ ॥
॥ शब्द २८ ॥
सुन सखि तुम ते कहौं समुझाई ॥ टेक ॥
करु न गुमान बहुरि पछितैहै,
काहे क परसि भुलाई ।
तब तैं आइसि कौन कौल करि,
अब कस सुधि बिसराई ॥ १ ॥
जागि लागि लय नात नाह ते,
देहु त्यागि दुचिताई ।
एहु घर दिन दुइ चार का नैहर,
परिहौ पर घर जाई ॥ २ ॥
हँसि कहि बात घात तुम जनिहहु,
रहि मन महँ पछिताई ।
जगजीवन सत पिउ अंतर मिलु,
काहे क जीव डेराई ॥ ३ ॥
॥ शब्द २९ ॥
अरे मन रहहु चरन ते लागि ।
इत उत सकल देहु तुम त्यागि ॥ १ ॥
दुइ कर जोरि कै लीजै माँगि ।
सोवत उठेव मोह ते जागि ॥ २ ॥

चेतावनी ४३
नैन निरखि छबि रहि रस पागि ।
कर्म भर्म सब जैहैं भागि ॥ ३ ॥
जगजीवन अस रहि अनुराग ।
जानु आपने तब हीं भाग ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३० ॥
अरे मन जपहु मंत्र बिचारि ।
नाहिं कोइ थिर अहै यहि जग, जिवन है दिन चारि ॥ १ ॥
आवत है जग जात आहै, देखु नैन पसारि ।
जीव जंतु पसु पंछी तत्त, तैसेई नर नारि ॥ २ ॥
उठत बैठत रमत ठाढ़े, सोवत जगत सँभारि ।
डोरि ऐसी रहहु लाये, जीति लेहु सँवारि ॥ ३ ॥
त्यागि मैं तैं हठ बिबाद, रहौ नय चलि हारि ।
जगजीवन यहि जुक्ति तेनी१, चलहु आपुहि तारि ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३१ ॥
जो पै नाम रहै जप लाय ।
तेहि के भागत कुल्ल बलाय ॥ १ ॥
तेहि का बौरा कहै सब लोय ।
वहि का अंत न पावै कोय ॥ २ ॥
बिन बोले जौ रहा न जाय ।
तौ मन नहि अंतर ठहराय ॥ ३ ॥
रस रसना बिरले जन पाय ।
अपने अंतर रहै छिपाय ॥ ४ ॥
पंडित काहे क पढ़े पुरान ।
दुइ अच्छर आहै परमान ॥ ५ ॥
(१) से।

४४ जगजीवन साहब की बानी
राति दिवस लहि करै पुकार ।
सत मत मंत्र न करै बिचार ॥ ६ ॥
जेहि मत अंतर मिल्यो है धाई ।
कथा पुरान पढ़ब बिसराई ॥ ७ ॥
रटनि रसनि जेहि नाम की आई ।
तेहि का कछु जग नाहिं सधाई ॥ ८ ॥
नहीं तपस्या तिरथ अन्हाई ।
तेहि के दरस पाप कटि जाई ॥ ९ ॥
राम संत ते अंतर नाहीं ।
संत ते कबहूँ न्यारे नाहीं ॥१०॥
जगजीवन कहै प्रगट पुकारी ।
अपने मन महँ लेहु बिचारी ॥११॥
॥ शब्द ३२ ॥
साधो जब ते यह तन थाको ॥ टेक ॥
सुत जनमत सुख आस राखिकै, फिर नहिं कोउ काहू को ।
ऐंठि चलहि डरपहि नहिं मन ते, बचन सो मुँह से भाखो ॥ १ ॥
छूटी कानि लोक की मन ते, नारि नीच तन ताको ।
हँसै हँसावै जानि आप को, नहि बिबेक को आँको ॥ २ ॥
नीच प्रसंग रंग ते रातहि, भ्रमत फिरत है डाको१ ।
जो देख्यो सो कहत हौं परगट, नहीं गुप्त मैं राखो ॥ ३ ॥
॥ शब्द ३३ ॥
हम समान नहिं कोऊ भाई ।
ऐसा जग की रीति देखिये, कहौं तो कहा न जाई ॥ १ ॥
ऐसी मति संसार की आहै, बातन की अधिकाई ।
सपनेहु रामहि जानहि नाहीं, झगरा नितहि बढ़ाई ॥ २ ॥
( १ ) कूदता हुआ ।

चेतावनी ४५
नित उठि करहि दुष्टई सबकै, जिय महँ नाहिं डेराई।
करि बहु पाप कमाई नितहीं, सो पड़े नरक महँ जाई ॥ ३ ॥
कहैं कि हम समान को आहै, थोरे धन इतराई।
गुन त्यागिन औगुन हित लागे, डारिन सबै नसाई ॥ ४ ॥
दौलत दाम धाम सुख भले, वह सुधि गै बिसराई।
परचौ काम जब अंत न पायो, सब तजि चल पछिताई ॥ ५ ॥
समुझि बूझि हक¹ राह चलहु रे, कहत अहौं गोहराई।
जगजीवन सब झूठे आहैं, नाम भजहु चित लाई ॥ ६ ॥
॥ शब्द ३४ ॥
अरे मन लटकि अटकि रहु लागी।
तजु परपंच कुशब्वद कुसंगति, ह्वै सचेत उठि जागी ॥ १ ॥
दुनिया अंध धंध परि भूली, कठिन मोह कै आगी।
तेहि परि जरि गै खाक उड़ाइहि, जुक्तिते रँग रहुत्यागी ॥ २ ॥
नर नारी पसु पंछी जे जग, सब छेदा है साँगी।
बचा न कोई बचाये सोई, नाम सरन रहु भागी ॥ ३ ॥
दुइ कर जोरि यहै है अवसर, दरस लेहु बर माँगी।
जगजीवन दै सीस चरन तर, मस्त रहहु रस पागी ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३५ ॥
दुनियाँ धंध लागि अरुझानी।
हित मित चित लोभाइ रहत है, पाछिल सुद्धि हेरानी ॥ १ ॥
आयो जहाँ से घर सो भूला, यहु घर रुधिर क पानी।
ताही उद्र साज कियो करता, ताही म आनि समानी ॥ २ ॥
डोरी पोढ़ि लगाइ निरगुन ते, अगिन म भै अस्थानी।
तेहि बल गलै जरै तन नाहीं, राहि दस मास सुखानी ॥ ३ ॥
(१) सत्य।

४६ जगजीवन साहब की बानी
बाहर भयो गइ सुबुद्धि वह, भे अहंकार गुमानी ।
तीनिउ पन गे नाम बिहूने, अंत बूड़ि बिनु पानी ॥ ४ ॥
कैसेहु नहीं मुग्ध नर चेतत, कहै सब्द यह बानी ।
जगजीवन बचिहै पै सोई, चित्त चरन ठहरानी ॥ ५ ॥
॥ शब्द ३६ ॥
बौरे समुझि देखि मन माहीं ।
माया देखि कै भूल फूल नहिं, तोर नहीं कछु आहीं ॥ १ ॥
दिना चारि का अहै पेखना, कोउ काहू का नाहीं ।
सुधि बिसराय चेत नहिं कीन्ह्यो, अंत काल पछिताहीं ॥ २ ॥
देह धरे नर नाम न जान्यो, बृथा जियहि जग माहीं ।
जगजीवन भजु राम निर्भय ह्वै, रहिये चरनन माहीं ॥ ३ ॥
॥ शब्द ३७ ॥
साधो देखहु अपने मनहिं बिचारी ॥ टेक ॥
दिना चारि का यह है खाका,
सो तकि नहिं भूलहु संसारी ।
परि कै सुखद भरम नहिं भटकहु,
ह्वै सचेत रहु डोरि सँभारी ॥ १ ॥
नाम बिहून नीच सब हीं ते,
नीच ते नीच बहुत अधिकारी ।
जैसे खाँड़ मीठ सब हीं कहँ,
अनहित लागत खारी ॥ २ ॥
करि बिबेक सों ज्ञान आपने,
जुक्ति बास करि सब ते न्यारी ।
जगजीवन अमृत रस दरसन,
पीवत रहहु सो नैन निहारी ॥ ३ ॥

चेतावनी ४७
॥ शब्द ३८ ॥
रटहु रसना नाम अच्छर फूल भूलू न भाई ।
एक दिन दुख होइ है फिर रहैगा पछिताई ॥ १ ॥
कस न जीवत सुमिर मन महँ त्यागि दे गफिलाई ।
तजहु जग परपंच निन्दा करहु ना कुटिलाई ॥ २ ॥
यहि पाप ते जम दूत कसि हैं रहौगे खिसियाई ।
रहे नहिं कछु हाथ एकौ बाँधि लैकर जाई ॥ ३ ॥
लोग सबै कुटुंब सुत हित नारि भगनी भाई ।
पिता प्रीति लगाय रोइहै रहेगा अरुगाई१ ॥ ४ ॥
भाई बर्ग सँग उहौ त्यागहि देहै सब बिसराई ।
दौलत धन धाम काम काज नहिं आई ॥ ५ ॥
छत्र पति औ नर पती सब झूठि है प्रभुताई ।
जगजीवन दास नाम साँचा ताहि रहु लौ लाई ॥ ६ ॥
॥ शब्द ३९ ॥
जनम पाइ जग जान्यो नाहीं ।
भाग बड़े ते पाइ देहँ नर,
सुधि गै भूलि पर्यो भव माहीं ॥ १ ॥
देखत खात पियत गाफिल मन,
सुख आनंद बहुत हरषाहीं ।
डोलत बोलत चलत अपथ पथ,
भरे मद अंध चेत कछु नाहीं ॥ २ ॥
मैं तैं मारि सँभारि न आवे,
अघ क्रम हित करि बहुत कमाहीं ।
तेहि पर गई सुद्धि बुधि सब कर,
पग थाके जब फिरि पछिताहीं ॥ ३ ॥
(१) अलगाय।

४८ जगजीवन साहब की बानी
साधो साधि सुरति दृढ़ करिये,
रहि रसि बसि छबि अंतर माहीं ।
जगजीवन दास जगत ते न्यारे,
गुरु के चरन बिसरि नहि जाहीं ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४० ॥
अरे मन बौरे समुझि विचारु ।
को तैं अहसि कहाँ ते आयसि, अब हूँ डोरि संभारु ॥ १ ॥
बहसि न इत उत ह्वै थिर रहि कै, सुकिरत नाम पुकारु ।
नहिं कोइ अचल सबै चलि जाइ हि, कछु नहिं अहै करारु ॥ २ ॥
काया कनक देह नर पायो, करि ले कलुक सँवारु ।
समौ यही फिरि और न पैहौ, भजि कै अपुहि तारु ॥ ३ ॥
लाये प्रीति रीति ऐसी रहु, सूरति छबि न बिसारु ।
जगजीवन सतगुरु के चरनन, जानि सर्वसौ वारु ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४१ ॥
बौरे काहे का करत गुमान ।
तोरे नाहिं कछु समुझि देखु मन,
चेतहु होउ न हैवान ॥ १ ॥
दौलत धाम काम नहिं आइहि,
जब तजि है तन प्रान ।
सुत पितु नारि बंधु औ माता,
तजि हैं एउ निदान ॥ २ ॥
कस नहिं सब तजि भजु वहि नामहिं,
ये है सच्च प्रमान ।
जगजीवन दास जग से है न्यारा,
अन्तर धरि रहु ध्यान ॥ ३ ॥

चेतावनी ४६
॥ शब्द ४२ ॥
साधो मन मन रहहु बिचार ।
निरखत रहहु परखि छबि देखत,
दृढ़ करि सुरति सँवार ॥ १ ॥
सीतल ह्वै रहु धरु सँभारि पग,
तमा१ तुजुक२ तैं मार ।
पाँच बचाइ चलाइ लाइ रहु,
आपन चहसि सँभार ॥ २ ॥
मैं तैं ई तौ अहं मद गलती३ ,
एइ सब करत बिगार ।
तेहिं गरुवाई बोझ ते दाबे,
नाहीं होत सवार ॥ ३ ॥
कुमति प्रसंग पचीस एक सब,
जानि सर्बसौ वार ।
जगजीवन सब लै न्यारे रहु,
चरन औ रूप निहार ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४३ ॥
ए मन त्यागि देहु गुमान ।
वहाँ ते करि कौल आयहु, नाहिं समुझत ज्ञान ॥ १ ॥
छिया बिदु का पहिरि जामा, हितं भयो हैवान ।
सुद्धि सोइ बिसारि दीन्हेव, कर्म आइ समान ॥ २ ॥
भूलु नहिं तकि देखु सुख परि, अचल नहिं अस्थान ।
जाइगा चल रहहि ना कोइ, बाल बूढ़ जवान ॥ ३ ॥
सिद्ध साधं जती जोगी, करहिं एऊ पयान ।
अमर ते मरि जाइंगे, चलि जाहिंगे ससि भान ॥ ४ ॥
( १ ) लालच । ( २ ) शान । ( ३ ) फंद, जाल ।
७

५० जगजीवन साहब की वानी
जाइगा चल रहहि ना कछु, गहहु पद निर्बान ।
जगजीवन मति निर्मलं धरु, रहहु अंतरध्यान ॥ ५ ॥
॥ शब्द ४४ ॥
मनुवाँ सच नाम ले गाई ।
दुनिया चली जात पल छिन दिन,
कोऊ न थिर ठहराई ॥ १ ॥
नहिं करार दिन घरी बरस का,
केहु का जानि न जाई ।
मैं तैं करि अभिमान गुमानहिं,
सुख परि गे बौराई ॥ २ ॥
कोउ काहु क नहिं मातु पिता हितु,
नारि बन्धु कुटुंबाई ।
ये सब अपने काम स्वार्थ के,
अंत रहैं अरुगाई ॥ ३ ॥
ऐसे सूल काँट ते छेदे,
नहिं कोइ लेत बचाई ।
जगजीवन सब बृथा जानिकै,
रहे चरन सिर नाई ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४५ ॥
कलि जागत जे राम की कानि ।
नहि डरपत आहै मन माहीं भरम पड़े हैरानि ॥ १ ॥
देत हैं दुख जानि दुखियहिं दरद नहिं मन आनि ।
होयगी दरबार फजिहत मारि बूझहिं छानि ॥ २ ॥
मारि मुगरिन मूड़ फोरहिं मानिहै न हैवान ।
जन्म कर्म नसाइ जैहै होइ है सब हानि ॥ ३ ॥

चेतावनी ५१
डारि देहैं नरक महँ जहँ अगिन है अधिकानि ।
त्रास दुख अधिकार है कोउ नहिं उबारहि आनि ॥ ४ ॥
पछिताइ है मन समुझि करि है बड़ी दुख की खानि ।
देखि ज्ञान ते परत है तस कहत अहौं बखानि ॥ ५ ॥
दीन लीनं नाम गहि रहु भर्म तैं नहिं मानि ।
जगजीवन बिस्वास बसि गुरु चरन रहु लिपटानि ॥ ६ ॥
॥ शब्द ४६ ॥
साधो कठिन रीति कल माहीं ।
परपंचहिं माँ निसु दिन बीतत,
नामहिं सुमिरै नाहीं ॥ १ ॥
तब को हता गात नहिं काहू,
रह्यो उद्र जब माहीं ।
सूरति लाइ सत्त माँ राखिन,
जरे अगिन महँ नाहीं ॥ २ ॥
सो बिस्वास छाँड़ि सब दीन्हो,
पापै कर्म कमाहीं ।
सपनेहु समुझि बूझि नहिं आवै,
परि भव मोह बिलाहीं ॥ ३ ॥
जन्म देह उत्तम नर पायो,
सुधि बिहून कहँ जाहीं ।
गयो अकारथ नाम न जाना,
नहिं काहू महँ आहीं ॥ ४ ॥
साध का सब्द मानि जो लैहैं,
दाग न लागहि ताहीं ।

५२ जगजीवन साहब की बानी
जगजीवन अंते अंतर नहिं,
भवसागर तरि जाहीं ॥ ५ ॥
॥ शब्द ४७ ॥
साधो कहत अहौं गोहराई ।
दोष देइ अपने करमन का,
डारत अहै नसाई ॥ १ ॥
बेपरतीत भयो मनहीं महँ,
दुबिधा रह्यो समाई ।
बिसरि गयो जिन पाले उद्र महँ,
अगिन ते लियो बचाई ॥ २ ॥
अब तब सों आपुहि सब ब्याकुल,
बूझि न मन महँ आई ।
बंधे अहहिं अन्ध है डोलहिं,
निकटहिं दूरि बताई ॥ ३ ॥
सत मत गहै रहै कौनिहु बिधि,
बकु मीनहिं टक लाई ।
जगजीवन यह जुक्ति भक्त भे,
जोति में रह्यो समाई ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४८ ॥
साधो सुनु कल का ब्योहारा ।
अपने अपने आगी पानी,
जरत है सब संसारा ॥ १ ॥
नाहीं सुधि अपने तन की है,
औ क करहिं बिचारा ।
ज्ञानिन काहँ कहैं अज्ञानी,
आपु बुद्धि अधिकारा ॥ २ ॥

चेतावनी ५३
हैं बल छीन ते बली कहावैं,
हम तें नहिं अधिका रा।
अहैं अदत्त कहावैं दाता,
बूड़ि मुए मँझ धारा ॥ ३ ॥
कुमति प्रसंग सुमति नहिं आवै,
गहैं न नाम अधारा।
जगजीवन अन्तर महँ सुमिरैं,
उतरैं भवजल पारा ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४६ ॥
कोउ काहुइ दोष न देई।
जो करतब्य अहै आपुनि माँ, सो तैसहि फल लेई ॥ १ ॥
जो दुख देय दुक्ख सो पावे, सुख दे सुख तेहि होई।
हाजिर राम अहैं सबहिन महँ, गर्ब न भूलै कोई ॥ २ ॥
रावन ऐसे छत्री ह्वै गे, तेहि सम भयो न कोई।
इन जब बैर कीन्ह भक्तन तें, डारयो छिन महँ खोई ॥ ३ ॥
लंका कनक सो खेह१ उड़ानी, जैसे मैल गधाई२।
पुत्रं लाख सवा लख नाती, तिन के रहा न कोई ॥ ४ ॥
नर केतानि कवनि गिनती महँ, कहत सब्द सत सोई।
जगजीवन अन्तर महँ सुमिरहु, सूरति बिलग न होई ॥ ५ ॥
॥ शब्द ५० ॥
मन तन खाक करि कै जान।
नीच तें ह्वै नीच तेहि तें, नीच आपुहि मान ॥ १ ॥
त्यागु मैं तैं दीन ह्वै रहु, तजहु गर्ब गुमान।
देतु हौं उपदेस याहै, निरखु सो निरखान ॥ २ ॥


(१) ख़ाक। (२) सोने की लंका की ख़ाक इस तरह उड़ी जैसे मिट्टी या
कूड़ा करकट गधे पर ढो कर ले जाने से उड़ता है।

५४ जगजीवन साहब की बानी
कर्म धागा लाय बाँधा, हिंदु मूसलमान ।
खैंचि लीन्ह्यो तोरि धागा, निरल कोइ बिलगान ॥ ३ ॥
खाक है सब खाक होइहि, समुझि आपन ज्ञान ।
सब्द सत कहि प्रगट भाषैं, रहहि नाम निदान ॥ ४ ॥
काल को डर नाहिं तिन्ह कौं, चौथ१ रहि चौगान ।
जगजीवन दास सतगुरु के, चरन रहि लिपटान ॥ ५ ॥
॥ शब्द ५१ ॥
भाई रे कहा न मानै कोई ।
जिहिं समुझाय कै राह बतावों,
मन परतीत न होई ॥ १ ॥
कपट रीति कै करहिं बंदगी,
सुमति न व्यापै सोई ।
भये नर हीन कुमारग परि कै,
डारिन सर्बस खोई ॥ २ ॥
गे भरुहाय२ तनिक सुख पाये,
मैं तैं रहे समोई ।
फिरि पछिताने कष्ट भये पर,
रहे मनहिं मन रोई ॥ ३ ॥
देखि परत नैनन से वैसे,
कठिन जीव है वोई ।
जगजीवन अन्तर महँ सुमरै,
जस होई तस होई ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५२ ॥
आपु क चीन्हहु रे भाई,
बिन चीन्हे नहिं सुख पाई ।
(१) चौथे लोक में । (२) उबल पड़े ।

चेतावनी ५५
जिन जिन काहू आपु क चीन्हा,
उठि तहँ कहँ पहुँचे जाई ॥ १ ॥
वह घर बिसरा जहाँ ते आयहु,
परपंचहिं हिताई१ ।
जामा मैल पहिरि मद माते,
मैं तैं पर बौराई ॥ २ ॥
कछु बिचार मनहिं नहिं आयो,
जहँ तहँ अरुझे जाई ।
झका झोरी ऐंचा तानी,
जहँ तहँ गये बिलाई ॥ ३ ॥
ऐसी कुगति अहै दुनिया की,
नाम सरन बिन रहे पछिताई ।
सतगुरु मते मंत्र जेहि दीन्ह्यो,
अम्बर भे चरनन सिर नाई ॥ ४ ॥
जगजीवन जुग जुग२ जुग३ बंधा,
निरखत है निरमल निरथाई४ ॥ ५ ॥
॥ शब्द ५३ ॥
साधो करै बिबाद नहिं कोई ।
अपने मते मंत्र महँ लागहु, भजत रहहु मन सोई ॥ १ ॥
कस्यप कंस रावना कौरौ, तिन के रहा न कोई ।
और कै कौन केतनि बपुरा है, कन प्रमान है सोई ॥ २ ॥
ज्ञानी पंडित जोगी भोगी, सिद्ध साध जो होई ।
सब निर्बाह नाम तें आहै, गर्ब किहे या खोई ॥ ३ ॥
(१) अच्छा लगता है। (२) जुगान जुग । (३) जोड़ा । (४) अथाह ।

५६ जगजीवन साहब की बानी
अंतर भजै मारि कै मैं तें, चरनन चित्त समोई ।
जगजीवन भजु और आस तजि, जस होई तस होई ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५४ ॥
बौरे नाम रटु मन लाय ।
खैंचि घट में आनिये कहुँ नाहिं देत बहाय ॥ १ ॥
कुसँग संगति कुटिल बौरे संग बैठु न धाय ।
ताहि पारस बेधि है तब होइ है गफिलाय ॥ २ ॥
तजहु गर्ब गुमान मैं तें हिये रहु दिनताय१ ।
त्यागि दे बकवाद बकना गहे रहु सितलाय२ ॥ ३ ॥
देत हौं उपदेस परगट कह्यो संतन गाय ।
जगजीवन बिस्वास करि कै रहु चरन लिपटाय ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५५ ॥
यहि जग महँ बंदे गरीब ह्वै रहना ।
साँईं तें चित लाउ रे बंदे ।
तजि दे गर्व गुमाना ॥ १ ॥
कनक कोट लंकापति रावन,
सोऊ खाक समाना ।
पाँच पचीस एक नहिं आवत,
ता तें फिरत भुलाना ॥ २ ॥
सुमति मती जे छिमा साधु हैं,
तिन हरि काँ पहिचाना ।
जगजीवन जीवत ते प्रानी,
जिन हरि चरनन ध्याना ॥ ३ ॥
(१) दीनता । (२) शीतलता ।

३ ।
॥ शब्द ५६ ॥
संतो गहहु सुरति सँभारि ।
वहि समय जो किहिन है उन, सो सुधि दिह्यो बिसारि ॥ १ ॥
इहाँ तौ कोउ नाहिं थिर है, रहेगा दिन चारि ।
खाइ लैहै काल सब कहँ, जैसे मूस मजारि१ ॥ २ ॥
भाइ भगनी मातु पितु, परिवार हितु सुत नारि ।
अन्त कोउ ना काम अइहै, कोउ न लेहि उबारि ॥ ३ ॥
जानि बृथा मन नाम सुमिरौ, कहत सब्द पुकारि ।
जगजीवन गुरु चरन गहि रहु, सोई लेहि उबारि ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५७ ॥
साधो सत्त नाम जपु प्यारा ॥ टेक ॥
सत्तनाम अंतर धुनि लागी, बास किहे संसारा ।
ऐसे गुप्प चुप्प है सुमिरहु, बिरले लखै निहारा ॥ १ ॥
तजहु बिबाद कुसंगति सबकै, कठिन अहै यह धारा ।
सत्तनाम कै बेड़ा बाँधहु, उतरन कौं भव पारा ॥ २ ॥
जन्म पदारथ पाइ जक्त महँ, आपुन मरहु सँभारा ।
जगजीवन यह सत्त नाम है, पापी केतिक तारा ॥ ३ ॥
॥ शब्द ५८ ॥
मन तुम भजहु नामहि नाम ।
तारि लीन्ह्यो बहुत पतितन उत्तमं अस नाम ॥ १ ॥
गह्यो जिन परतीत करिकै भये तिन के काम ।
मिटे दुख संताप तिन के भयो सुख आराम ॥ २ ॥
देखि सुख परि भूल नाहीं दौलत औ धन धाम ।
अहै यह सब झूठ आसा नाहिं आवहि काम ॥ ३ ॥
(१) बिल्ली।
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द्वितीय भाग: शब्द एवं पद संग्रह (अघविनाश व उपसंहार)

५८ जगजीवन साहब की वानी
चढ़हु ऊंचे नीच ह्वै कै गगन है भल ग्राम ।
जगजिवन दास निहारि मूरति चरन करु बिस्राम ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५६ ॥
अरे मन करहु नाम तें प्रीति ।
सीतलं सूसील मारग चलहु ऐसी रीति ॥ १ ॥
त्यागि दे बकवाद निंदा आचलनि१ आनीति२ ।
पाइ काया कनक की यह नाम बिनु ज्यों भीति ॥ २ ॥
आइ यह मृतु लोक में पछितानि करि आनीति२ ।
मारि कालं खाइ लीन्ह्यो समुझि समय वितीति ॥ ३ ॥
जुक्ति यहि जग बास करु रहु जक्त वेपरतीति ।
जगजीवन बिस्वास करि गुरु चरन रहु सत सीति ॥ ४ ॥
॥ शब्द ६० ॥
बैठि रहहु मन चरनन पास ।
काहे क भरमत फिरहु उदास ॥ १ ॥
राखहु दुइ कर सीस लगाइ ।
सोवत जागत बिसरि न जाइ ॥ २ ॥
निरखहु निर्मल जोति निहारि ।
नहिं उनकी सम कोउ अनुहारि३ ॥ ३ ॥
रबि ससि रूप डारि तैं वारि ।
रहु सत मति गहि डोरि सँभारि ॥ ४ ॥
ब्रह्मा रहे बेद धुनि लाइ ।
संकर अंग में अस्म लगाइ ॥ ५ ॥
बिस्नु जाइ मन तहाँ मसानि ।
सो अब कहि नहि जात बखानि ॥ ६ ॥
( १ ) कुचलन । ( २ ) अनीति । ( ३ ) सूरत ।