जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 45, कुल 110 में से
संदर्भ में पढ़ें४२ जगजीवन साहब की बानी
यहि भाँति ते सुख पाइहौ, नाहिं होइ है तुकसान ।
देखु नैन पसारि कै, कोउ नहिं अहै अजान ॥ ३ ॥
रहु दीन लीनं चरन ते, तजि देहु गर्ब गुमान ।
दिन चारि का जग है बसेरा, अन्त खाक समान ॥ ४ ॥
मरहु जीवत जियहु कछु दिन, मौत अहै निदान ।
जगजीवन ते अमर भे, गुरु चरन मन लिपटान ॥ ५ ॥
॥ शब्द २८ ॥
सुन सखि तुम ते कहौं समुझाई ॥ टेक ॥
करु न गुमान बहुरि पछितैहै,
काहे क परसि भुलाई ।
तब तैं आइसि कौन कौल करि,
अब कस सुधि बिसराई ॥ १ ॥
जागि लागि लय नात नाह ते,
देहु त्यागि दुचिताई ।
एहु घर दिन दुइ चार का नैहर,
परिहौ पर घर जाई ॥ २ ॥
हँसि कहि बात घात तुम जनिहहु,
रहि मन महँ पछिताई ।
जगजीवन सत पिउ अंतर मिलु,
काहे क जीव डेराई ॥ ३ ॥
॥ शब्द २९ ॥
अरे मन रहहु चरन ते लागि ।
इत उत सकल देहु तुम त्यागि ॥ १ ॥
दुइ कर जोरि कै लीजै माँगि ।
सोवत उठेव मोह ते जागि ॥ २ ॥