जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 61, कुल 110 में से
संदर्भ में पढ़ें५८ जगजीवन साहब की वानी
चढ़हु ऊंचे नीच ह्वै कै गगन है भल ग्राम ।
जगजिवन दास निहारि मूरति चरन करु बिस्राम ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५६ ॥
अरे मन करहु नाम तें प्रीति ।
सीतलं सूसील मारग चलहु ऐसी रीति ॥ १ ॥
त्यागि दे बकवाद निंदा आचलनि१ आनीति२ ।
पाइ काया कनक की यह नाम बिनु ज्यों भीति ॥ २ ॥
आइ यह मृतु लोक में पछितानि करि आनीति२ ।
मारि कालं खाइ लीन्ह्यो समुझि समय वितीति ॥ ३ ॥
जुक्ति यहि जग बास करु रहु जक्त वेपरतीति ।
जगजीवन बिस्वास करि गुरु चरन रहु सत सीति ॥ ४ ॥
॥ शब्द ६० ॥
बैठि रहहु मन चरनन पास ।
काहे क भरमत फिरहु उदास ॥ १ ॥
राखहु दुइ कर सीस लगाइ ।
सोवत जागत बिसरि न जाइ ॥ २ ॥
निरखहु निर्मल जोति निहारि ।
नहिं उनकी सम कोउ अनुहारि३ ॥ ३ ॥
रबि ससि रूप डारि तैं वारि ।
रहु सत मति गहि डोरि सँभारि ॥ ४ ॥
ब्रह्मा रहे बेद धुनि लाइ ।
संकर अंग में अस्म लगाइ ॥ ५ ॥
बिस्नु जाइ मन तहाँ मसानि ।
सो अब कहि नहि जात बखानि ॥ ६ ॥
( १ ) कुचलन । ( २ ) अनीति । ( ३ ) सूरत ।