जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचेतावनी ५१
डारि देहैं नरक महँ जहँ अगिन है अधिकानि ।
त्रास दुख अधिकार है कोउ नहिं उबारहि आनि ॥ ४ ॥
पछिताइ है मन समुझि करि है बड़ी दुख की खानि ।
देखि ज्ञान ते परत है तस कहत अहौं बखानि ॥ ५ ॥
दीन लीनं नाम गहि रहु भर्म तैं नहिं मानि ।
जगजीवन बिस्वास बसि गुरु चरन रहु लिपटानि ॥ ६ ॥
॥ शब्द ४६ ॥
साधो कठिन रीति कल माहीं ।
परपंचहिं माँ निसु दिन बीतत,
नामहिं सुमिरै नाहीं ॥ १ ॥
तब को हता गात नहिं काहू,
रह्यो उद्र जब माहीं ।
सूरति लाइ सत्त माँ राखिन,
जरे अगिन महँ नाहीं ॥ २ ॥
सो बिस्वास छाँड़ि सब दीन्हो,
पापै कर्म कमाहीं ।
सपनेहु समुझि बूझि नहिं आवै,
परि भव मोह बिलाहीं ॥ ३ ॥
जन्म देह उत्तम नर पायो,
सुधि बिहून कहँ जाहीं ।
गयो अकारथ नाम न जाना,
नहिं काहू महँ आहीं ॥ ४ ॥
साध का सब्द मानि जो लैहैं,
दाग न लागहि ताहीं ।