जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचेतावनी ५३
हैं बल छीन ते बली कहावैं,
हम तें नहिं अधिका रा।
अहैं अदत्त कहावैं दाता,
बूड़ि मुए मँझ धारा ॥ ३ ॥
कुमति प्रसंग सुमति नहिं आवै,
गहैं न नाम अधारा।
जगजीवन अन्तर महँ सुमिरैं,
उतरैं भवजल पारा ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४६ ॥
कोउ काहुइ दोष न देई।
जो करतब्य अहै आपुनि माँ, सो तैसहि फल लेई ॥ १ ॥
जो दुख देय दुक्ख सो पावे, सुख दे सुख तेहि होई।
हाजिर राम अहैं सबहिन महँ, गर्ब न भूलै कोई ॥ २ ॥
रावन ऐसे छत्री ह्वै गे, तेहि सम भयो न कोई।
इन जब बैर कीन्ह भक्तन तें, डारयो छिन महँ खोई ॥ ३ ॥
लंका कनक सो खेह१ उड़ानी, जैसे मैल गधाई२।
पुत्रं लाख सवा लख नाती, तिन के रहा न कोई ॥ ४ ॥
नर केतानि कवनि गिनती महँ, कहत सब्द सत सोई।
जगजीवन अन्तर महँ सुमिरहु, सूरति बिलग न होई ॥ ५ ॥
॥ शब्द ५० ॥
मन तन खाक करि कै जान।
नीच तें ह्वै नीच तेहि तें, नीच आपुहि मान ॥ १ ॥
त्यागु मैं तैं दीन ह्वै रहु, तजहु गर्ब गुमान।
देतु हौं उपदेस याहै, निरखु सो निरखान ॥ २ ॥
(१) ख़ाक। (२) सोने की लंका की ख़ाक इस तरह उड़ी जैसे मिट्टी या
कूड़ा करकट गधे पर ढो कर ले जाने से उड़ता है।