सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished110 पृष्ठ

पृष्ठ 56, कुल 110 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 56

चेतावनी ५३
हैं बल छीन ते बली कहावैं,
हम तें नहिं अधिका रा।
अहैं अदत्त कहावैं दाता,
बूड़ि मुए मँझ धारा ॥ ३ ॥
कुमति प्रसंग सुमति नहिं आवै,
गहैं न नाम अधारा।
जगजीवन अन्तर महँ सुमिरैं,
उतरैं भवजल पारा ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४६ ॥
कोउ काहुइ दोष न देई।
जो करतब्य अहै आपुनि माँ, सो तैसहि फल लेई ॥ १ ॥
जो दुख देय दुक्ख सो पावे, सुख दे सुख तेहि होई।
हाजिर राम अहैं सबहिन महँ, गर्ब न भूलै कोई ॥ २ ॥
रावन ऐसे छत्री ह्वै गे, तेहि सम भयो न कोई।
इन जब बैर कीन्ह भक्तन तें, डारयो छिन महँ खोई ॥ ३ ॥
लंका कनक सो खेह१ उड़ानी, जैसे मैल गधाई२।
पुत्रं लाख सवा लख नाती, तिन के रहा न कोई ॥ ४ ॥
नर केतानि कवनि गिनती महँ, कहत सब्द सत सोई।
जगजीवन अन्तर महँ सुमिरहु, सूरति बिलग न होई ॥ ५ ॥
॥ शब्द ५० ॥
मन तन खाक करि कै जान।
नीच तें ह्वै नीच तेहि तें, नीच आपुहि मान ॥ १ ॥
त्यागु मैं तैं दीन ह्वै रहु, तजहु गर्ब गुमान।
देतु हौं उपदेस याहै, निरखु सो निरखान ॥ २ ॥


(१) ख़ाक। (२) सोने की लंका की ख़ाक इस तरह उड़ी जैसे मिट्टी या
कूड़ा करकट गधे पर ढो कर ले जाने से उड़ता है।