जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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अंतर भजै मारि कै मैं तें, चरनन चित्त समोई ।
जगजीवन भजु और आस तजि, जस होई तस होई ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५४ ॥
बौरे नाम रटु मन लाय ।
खैंचि घट में आनिये कहुँ नाहिं देत बहाय ॥ १ ॥
कुसँग संगति कुटिल बौरे संग बैठु न धाय ।
ताहि पारस बेधि है तब होइ है गफिलाय ॥ २ ॥
तजहु गर्ब गुमान मैं तें हिये रहु दिनताय१ ।
त्यागि दे बकवाद बकना गहे रहु सितलाय२ ॥ ३ ॥
देत हौं उपदेस परगट कह्यो संतन गाय ।
जगजीवन बिस्वास करि कै रहु चरन लिपटाय ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५५ ॥
यहि जग महँ बंदे गरीब ह्वै रहना ।
साँईं तें चित लाउ रे बंदे ।
तजि दे गर्व गुमाना ॥ १ ॥
कनक कोट लंकापति रावन,
सोऊ खाक समाना ।
पाँच पचीस एक नहिं आवत,
ता तें फिरत भुलाना ॥ २ ॥
सुमति मती जे छिमा साधु हैं,
तिन हरि काँ पहिचाना ।
जगजीवन जीवत ते प्रानी,
जिन हरि चरनन ध्याना ॥ ३ ॥
(१) दीनता । (२) शीतलता ।