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जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished110 पृष्ठ

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पृष्ठ 57

५४ जगजीवन साहब की बानी
कर्म धागा लाय बाँधा, हिंदु मूसलमान ।
खैंचि लीन्ह्यो तोरि धागा, निरल कोइ बिलगान ॥ ३ ॥
खाक है सब खाक होइहि, समुझि आपन ज्ञान ।
सब्द सत कहि प्रगट भाषैं, रहहि नाम निदान ॥ ४ ॥
काल को डर नाहिं तिन्ह कौं, चौथ१ रहि चौगान ।
जगजीवन दास सतगुरु के, चरन रहि लिपटान ॥ ५ ॥
॥ शब्द ५१ ॥
भाई रे कहा न मानै कोई ।
जिहिं समुझाय कै राह बतावों,
मन परतीत न होई ॥ १ ॥
कपट रीति कै करहिं बंदगी,
सुमति न व्यापै सोई ।
भये नर हीन कुमारग परि कै,
डारिन सर्बस खोई ॥ २ ॥
गे भरुहाय२ तनिक सुख पाये,
मैं तैं रहे समोई ।
फिरि पछिताने कष्ट भये पर,
रहे मनहिं मन रोई ॥ ३ ॥
देखि परत नैनन से वैसे,
कठिन जीव है वोई ।
जगजीवन अन्तर महँ सुमरै,
जस होई तस होई ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५२ ॥
आपु क चीन्हहु रे भाई,
बिन चीन्हे नहिं सुख पाई ।
(१) चौथे लोक में । (२) उबल पड़े ।