जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचेतावनी ५५
जिन जिन काहू आपु क चीन्हा,
उठि तहँ कहँ पहुँचे जाई ॥ १ ॥
वह घर बिसरा जहाँ ते आयहु,
परपंचहिं हिताई१ ।
जामा मैल पहिरि मद माते,
मैं तैं पर बौराई ॥ २ ॥
कछु बिचार मनहिं नहिं आयो,
जहँ तहँ अरुझे जाई ।
झका झोरी ऐंचा तानी,
जहँ तहँ गये बिलाई ॥ ३ ॥
ऐसी कुगति अहै दुनिया की,
नाम सरन बिन रहे पछिताई ।
सतगुरु मते मंत्र जेहि दीन्ह्यो,
अम्बर भे चरनन सिर नाई ॥ ४ ॥
जगजीवन जुग जुग२ जुग३ बंधा,
निरखत है निरमल निरथाई४ ॥ ५ ॥
॥ शब्द ५३ ॥
साधो करै बिबाद नहिं कोई ।
अपने मते मंत्र महँ लागहु, भजत रहहु मन सोई ॥ १ ॥
कस्यप कंस रावना कौरौ, तिन के रहा न कोई ।
और कै कौन केतनि बपुरा है, कन प्रमान है सोई ॥ २ ॥
ज्ञानी पंडित जोगी भोगी, सिद्ध साध जो होई ।
सब निर्बाह नाम तें आहै, गर्ब किहे या खोई ॥ ३ ॥
(१) अच्छा लगता है। (२) जुगान जुग । (३) जोड़ा । (४) अथाह ।