जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचेतावनी ४७
॥ शब्द ३८ ॥
रटहु रसना नाम अच्छर फूल भूलू न भाई ।
एक दिन दुख होइ है फिर रहैगा पछिताई ॥ १ ॥
कस न जीवत सुमिर मन महँ त्यागि दे गफिलाई ।
तजहु जग परपंच निन्दा करहु ना कुटिलाई ॥ २ ॥
यहि पाप ते जम दूत कसि हैं रहौगे खिसियाई ।
रहे नहिं कछु हाथ एकौ बाँधि लैकर जाई ॥ ३ ॥
लोग सबै कुटुंब सुत हित नारि भगनी भाई ।
पिता प्रीति लगाय रोइहै रहेगा अरुगाई१ ॥ ४ ॥
भाई बर्ग सँग उहौ त्यागहि देहै सब बिसराई ।
दौलत धन धाम काम काज नहिं आई ॥ ५ ॥
छत्र पति औ नर पती सब झूठि है प्रभुताई ।
जगजीवन दास नाम साँचा ताहि रहु लौ लाई ॥ ६ ॥
॥ शब्द ३९ ॥
जनम पाइ जग जान्यो नाहीं ।
भाग बड़े ते पाइ देहँ नर,
सुधि गै भूलि पर्यो भव माहीं ॥ १ ॥
देखत खात पियत गाफिल मन,
सुख आनंद बहुत हरषाहीं ।
डोलत बोलत चलत अपथ पथ,
भरे मद अंध चेत कछु नाहीं ॥ २ ॥
मैं तैं मारि सँभारि न आवे,
अघ क्रम हित करि बहुत कमाहीं ।
तेहि पर गई सुद्धि बुधि सब कर,
पग थाके जब फिरि पछिताहीं ॥ ३ ॥
(१) अलगाय।