जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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५२ जगजीवन साहब की बानी
जगजीवन अंते अंतर नहिं,
भवसागर तरि जाहीं ॥ ५ ॥
॥ शब्द ४७ ॥
साधो कहत अहौं गोहराई ।
दोष देइ अपने करमन का,
डारत अहै नसाई ॥ १ ॥
बेपरतीत भयो मनहीं महँ,
दुबिधा रह्यो समाई ।
बिसरि गयो जिन पाले उद्र महँ,
अगिन ते लियो बचाई ॥ २ ॥
अब तब सों आपुहि सब ब्याकुल,
बूझि न मन महँ आई ।
बंधे अहहिं अन्ध है डोलहिं,
निकटहिं दूरि बताई ॥ ३ ॥
सत मत गहै रहै कौनिहु बिधि,
बकु मीनहिं टक लाई ।
जगजीवन यह जुक्ति भक्त भे,
जोति में रह्यो समाई ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४८ ॥
साधो सुनु कल का ब्योहारा ।
अपने अपने आगी पानी,
जरत है सब संसारा ॥ १ ॥
नाहीं सुधि अपने तन की है,
औ क करहिं बिचारा ।
ज्ञानिन काहँ कहैं अज्ञानी,
आपु बुद्धि अधिकारा ॥ २ ॥