जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचेतावनी ४३
नैन निरखि छबि रहि रस पागि ।
कर्म भर्म सब जैहैं भागि ॥ ३ ॥
जगजीवन अस रहि अनुराग ।
जानु आपने तब हीं भाग ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३० ॥
अरे मन जपहु मंत्र बिचारि ।
नाहिं कोइ थिर अहै यहि जग, जिवन है दिन चारि ॥ १ ॥
आवत है जग जात आहै, देखु नैन पसारि ।
जीव जंतु पसु पंछी तत्त, तैसेई नर नारि ॥ २ ॥
उठत बैठत रमत ठाढ़े, सोवत जगत सँभारि ।
डोरि ऐसी रहहु लाये, जीति लेहु सँवारि ॥ ३ ॥
त्यागि मैं तैं हठ बिबाद, रहौ नय चलि हारि ।
जगजीवन यहि जुक्ति तेनी१, चलहु आपुहि तारि ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३१ ॥
जो पै नाम रहै जप लाय ।
तेहि के भागत कुल्ल बलाय ॥ १ ॥
तेहि का बौरा कहै सब लोय ।
वहि का अंत न पावै कोय ॥ २ ॥
बिन बोले जौ रहा न जाय ।
तौ मन नहि अंतर ठहराय ॥ ३ ॥
रस रसना बिरले जन पाय ।
अपने अंतर रहै छिपाय ॥ ४ ॥
पंडित काहे क पढ़े पुरान ।
दुइ अच्छर आहै परमान ॥ ५ ॥
(१) से।