जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचेतावनी ४५
नित उठि करहि दुष्टई सबकै, जिय महँ नाहिं डेराई।
करि बहु पाप कमाई नितहीं, सो पड़े नरक महँ जाई ॥ ३ ॥
कहैं कि हम समान को आहै, थोरे धन इतराई।
गुन त्यागिन औगुन हित लागे, डारिन सबै नसाई ॥ ४ ॥
दौलत दाम धाम सुख भले, वह सुधि गै बिसराई।
परचौ काम जब अंत न पायो, सब तजि चल पछिताई ॥ ५ ॥
समुझि बूझि हक¹ राह चलहु रे, कहत अहौं गोहराई।
जगजीवन सब झूठे आहैं, नाम भजहु चित लाई ॥ ६ ॥
॥ शब्द ३४ ॥
अरे मन लटकि अटकि रहु लागी।
तजु परपंच कुशब्वद कुसंगति, ह्वै सचेत उठि जागी ॥ १ ॥
दुनिया अंध धंध परि भूली, कठिन मोह कै आगी।
तेहि परि जरि गै खाक उड़ाइहि, जुक्तिते रँग रहुत्यागी ॥ २ ॥
नर नारी पसु पंछी जे जग, सब छेदा है साँगी।
बचा न कोई बचाये सोई, नाम सरन रहु भागी ॥ ३ ॥
दुइ कर जोरि यहै है अवसर, दरस लेहु बर माँगी।
जगजीवन दै सीस चरन तर, मस्त रहहु रस पागी ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३५ ॥
दुनियाँ धंध लागि अरुझानी।
हित मित चित लोभाइ रहत है, पाछिल सुद्धि हेरानी ॥ १ ॥
आयो जहाँ से घर सो भूला, यहु घर रुधिर क पानी।
ताही उद्र साज कियो करता, ताही म आनि समानी ॥ २ ॥
डोरी पोढ़ि लगाइ निरगुन ते, अगिन म भै अस्थानी।
तेहि बल गलै जरै तन नाहीं, राहि दस मास सुखानी ॥ ३ ॥
(१) सत्य।